The Mysterious Bell – Chapter 341
आवाज़ के साथ।
जैसे कोई घड़ी की सुई उलटी चल रही हो।
॥
पत्थर पर लोहे की पट्टी की आवाज़ रुकी नहीं। टक। टक। टक।
मैं अस्पताल के गेट के बाहर बेंच पर बैठा था। माँ का सिर मेरे कंधे पर था और उनकी साँस मेरे कान के पास चल रही थी — छोटी, फटी हुई, जैसे पुरानी साइकिल का ट्यूब जिसमें से हवा रिस रही हो। मैंने उनकी कलाई पर उँगली रखी और नस गिनने लगा। नस धीमी थी, पर थी। ज़िंदा थी। उस वक़्त मुझे इससे बड़ी कोई खबर नहीं चाहिए थी।
काजल सामने खड़ी थी, हाथ में पानी का गिलास, और गिलास काँप रहा था। पानी उसकी उँगलियों पर गिर रहा था और वो देख भी नहीं रही थी।
"काजल," मैंने कहा, "गिलास मेरे हाथ में दे।"
"भैया, मैंने डॉक्टर साहब को फ़ोन कर दिया है।" उसकी आवाज़ नाक से निकल रही थी। "वो आ रहे हैं। बोले कि माँ को सीधा लिटा दो।"
"यहाँ बेंच पर लिटाऊँ?"
"अंदर चलो। डिस्पेंसरी के पास वाला कमरा खुला है। चौकीदार ने बोला है।"
हमने माँ को उठाया। वो इतनी हल्की लग रही थीं कि मेरा हाथ अपने आप कस गया, जैसे कहीं उड़ न जाएँ। काजल ने उनका पल्लू सँभाला और मैंने उनके पैर धीरे-धीरे सीढ़ी के पहले पत्थर से हटाए। वो पत्थर, जिन्हें वो सफ़ेद कुर्ते वाला आदमी गिन रहा था।
पीछे पट्टी फिर टकराई।
अंदर के कमरे में एक पुराना लोहे का पलंग था, ऊपर ट्यूबलाइट जो बीच-बीच में झपक रही थी, और दीवार पर पीला पेंट जो उतर चुका था। कमरे में फ़िनायल और गीली चादर की गंध थी। हमने माँ को पलंग पर लिटाया। काजल ने उनका माथा पोंछा और उनके होठों पर पानी की दो बूँदें रखीं।
तभी बाहर पुराने स्कूटर की आवाज़ आई, फिर चप्पल की फटी आवाज़, फिर डॉक्टर निहाल इसरानी अंदर आए।
उनका सफ़ेद कोट घिसा हुआ था। कंधे पर एक पुरानी शॉल टँगी थी। हाथ में वही स्टेथोस्कोप, जिसकी रबर की नली पर टेप लिपटा था — इतनी बार लिपटा कि अब वो नली से ज़्यादा टेप लगती थी। वो सीधे पलंग के पास गए, मेरी तरफ़ देखा भी नहीं, और माँ की कलाई पकड़ ली।
"सुशीला जी," उन्होंने धीमे से कहा, "आँखें खोलिए। मैं हूँ। निहाल।"
माँ ने आँखें आधी खोलीं। उनके होठ हिले, पर आवाज़ नहीं निकली।
डॉक्टर ने स्टेथोस्कोप के ईयरपीस कानों में लगाए और माँ की छाती पर नली रखी। फिर पीठ पर, फिर कंधे के नीचे। कमरे में सिर्फ़ ट्यूबलाइट की भिनभिनाहट थी और बाहर से वो टक टक आ रही थी।
उन्होंने स्टेथोस्कोप उतारा, गले में लटकाया और कुछ देर माँ को देखते रहे।
"साँस की तकलीफ़ बढ़ी है," उन्होंने कहा।
मेरे अंदर कुछ ठंडा उतर गया।
"पर अभी खतरा टला हुआ है," उन्होंने आगे कहा। "अभी यहीं रहने दो। आज रात इन्हें ऊपर मत ले जाना। सीढ़ी की बात तो तुम जानते हो।"
"सीढ़ी बारह बजे से बंद है," मैंने कहा।
"मैंने देखा है उस काग़ज़ को।" डॉक्टर ने शॉल कसी। "मेरा कमरा ऊपर है। दवाइयाँ ऊपर हैं। फ़ाइल ऊपर है। और अब मरीज़ नीचे है। तो डॉक्टर भी नीचे रहेगा।" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। "मुझे सत्तर साल की उम्र में कोई नई आदत नहीं डालनी है, अंकुश। मैं जहाँ मरीज़, वहीं बैठता हूँ। यही मेरा अस्पताल है।"
काजल ने माँ का हाथ पकड़ लिया और बगल में रखी अपनी नर्सिंग की मोटी किताब खोल ली। उसने किताब सीने से लगाकर पकड़ी थी, जैसे ढाल। पन्ने पर नज़र थी, पर आँसू पन्ने पर गिर रहे थे और वो उन्हें हथेली से मिटा रही थी, बिना सिर उठाए। वो पन्ना पलटती गई, फिर से पलटती गई, और मुझे पता था कि उसने एक भी लाइन नहीं पढ़ी।
मैंने उसके सिर पर हाथ रखा। वो और झुक गई।
डॉक्टर ने अपनी जेब से एक पुरानी परची निकाली और उस पर कुछ लिखने लगे। परची पर पहले से ही कुछ लिखा था, काटा हुआ, फिर से लिखा हुआ।
तभी दरवाज़े पर कोई खड़ा हुआ।
मुझे पता चल गया, बिना देखे। कुछ लोगों की मौजूदगी हवा में बदल जाती है। मैंने सिर घुमाया।
पापा खड़े थे।
उनकी कमीज़ पर धूल थी। चश्मा कान पर टेप से बँधा हुआ था, पर आज टेप की एक तरफ़ छूटी हुई थी और चश्मा थोड़ा टेढ़ा लटक रहा था। हाथ में कुछ नहीं था। और यही सबसे डरावनी बात थी, क्योंकि पापा के हाथ में हमेशा कोई औज़ार होता था — पेचकस, रिंच, हथौड़ा। आज हाथ खाली थे।
वो दरवाज़े पर खड़े रहे। मुझे देखते रहे। बहुत देर।
काजल ने भी देखा, पर कुछ नहीं बोली। डॉक्टर ने लिखना रोका और पीछे मुड़कर देखा, फिर चुपचाप परची लिखने लगे, जैसे उन्हें किसी और की बात में दख़ल नहीं देना।
फिर पापा अंदर आए। उन्होंने दरवाज़ा धीरे से बंद किया। पलंग के पास आए, माँ को देखा, और उनका हाथ जैसे माँ की चादर को छूने के लिए उठा, फिर रुक गया, फिर वापस नीचे आ गया।
"अंकुश," उन्होंने कहा।
बस मेरा नाम। इतना ही।
"हाँ," मैंने कहा।
वो कुछ देर चुप रहे। उनका गला सूख रहा था, मैं देख सकता था — गला ऊपर-नीचे हो रहा था।
"पाँच साल पहले," उन्होंने कहा, "अंगूठा मैंने लगाया था।"
कमरे में हवा जैसे रुक गई।
"मैंने," वो फिर बोले, आवाज़ टूट रही थी, "उस काग़ज़ पर अपना अंगूठा लगाया था। डर के मारे। तेरी माँ अस्पताल में थीं। डॉक्टर ने कहा था कि इलाज लंबा चलेगा। उस वक़्त जेब में जो था, वो खत्म हो रहा था। और वो आदमी…"
वो रुके। मैंने उन्हें रोका नहीं। मैंने कुछ नहीं कहा।
"…वो आदमी बड़ी मुस्कान लेकर आया था। कहा कि यह सिर्फ़ काग़ज़ है, दुकान का हिसाब साफ़ करने के लिए। मैंने पढ़ा भी नहीं। मैंने सिर्फ़ यह सोचा कि मेरी औरत ठीक हो जाए। और उँगली स्याही में डुबोकर रख दी।"
फिर उन्होंने मेरी तरफ़ देखा, सीधा, पहली बार शायद सालों में सीधा।
"पाँच साल," उन्होंने कहा, "पाँच साल से मैं उस अंगूठे को सीने में लिए घूम रहा हूँ। तुझे देखता हूँ तो लगता है कि तू मेरे अंदर का सच पढ़ लेगा। इसलिए मैं कम बोलता हूँ। इसलिए मैं दुकान पर देर तक बैठता हूँ। इसलिए…"
उनका गला रुक गया।
मैं बैठा रहा। मेरे अंदर कई आवाज़ें थीं। एक आवाज़ कह रही थी कि उठ और चिल्ला — कि तुमने मुझे पाँच साल झूठ में रखा, कि मैं सब ठीक करने में लगा रहा और तुम्हारे अंदर यह चल रहा था, कि मेरे पास भी कोई हक़ था जानने का।
दूसरी आवाज़ कह रही थी कि देख, वो खड़ा है, हाथ खाली हैं, और उसने खुद आकर कहा है।
मैंने पहली आवाज़ को दबाया और दूसरी को सुना।
"इतना बड़ा सच," मैंने धीरे से कहा, "मुझसे छुपाया क्यों?"
पापा ने मुँह खोला, फिर बंद कर दिया। फिर बोले, बहुत धीमे।
"डर था कि तू मुझे कमज़ोर समझेगा।"
मैंने उन्हें देखा।
"बाप के लिए यह सबसे बड़ा डर होता है, अंकुश। कि बेटा उसे कमज़ोर समझे। तू चौबीस का है और तेरे अंदर इतनी ज़िद है कि तू पूरी गली ठीक करने निकल पड़ा है। मैं डरता था कि तू एक दिन मुझे देखेगा और सोचेगा — यही आदमी था जिसने मेरा घर बेच दिया।"
मैंने आँखें नीची कर लीं। मेरे हाथ काँप रहे थे। मैंने उन्हें जाँघों पर रखकर दबाया।
"पापा," मैंने कहा। मेरी आवाज़ पहली बार पतली निकली। "मैंने तुमसे कभी पूछा ही नहीं।"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
"पाँच साल में एक बार भी नहीं पूछा कि तुम दुकान से देर क्यों लौटते हो, कि तुम चुप क्यों रहते हो, कि वो काग़ज़ क्या था। मैंने सिर्फ़ यह मान लिया कि तुम्हारे अंदर कुछ नहीं है। और मैं सब ठीक करने में लगा रहा। मैंने तुम्हें अजनबी मान लिया, पापा। इतना बड़ा काम कर दिया मैंने — बिना पूछे।"
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