The Mysterious Bell – Chapter 340
मैंने चाबी ली। वो छोटी थी और उसका धातु मेरी हथेली में ठंडा था। मैंने उसे गले की चाबी के साथ जेब में डाला और दौड़ा।
गली पार करते वक़्त मुझे कुछ चीज़ें अलग रफ़्तार में दिखीं।
शबनम आपा गुमटी का चूल्हा बुझा रही थीं, और जब मैं भागा, उन्होंने चिमटी नीचे रखी और पूछा, “क्या हुआ?”
किसी ने नहीं बताया, पर वो खुद पीछे आ गईं।
भोला भाई अपनी दुकान का आधा शटर गिरा रहे थे, और जब मैंने उन्हें “अस्पताल” कहते हुए देखा, उन्होंने शटर वैसे ही छोड़ दिया।
सीढ़ी पर बैठे बच्चे उठ खड़े हुए। टिंकू मेरे पीछे भागा, और सानिया ने चिंटू का हाथ पकड़कर कहा, “हम नहीं जाएँगे, हम यहीं रहेंगे। कुछ पता चले तो आकर बताऊँगा।”
यही तो गली है, तुम समझ रहे हो न। जब सब डरते हैं और सब चुप होते हैं, तब भी एक-एक आदमी उठकर पीछे चला आता है। यह चुप्पी का शहर नहीं है, यह थका हुआ शहर है। और थका हुआ शहर भी उठता है, जब उसे ठीक वक़्त पर हाथ थमाने वाला मिले।
मैं अस्पताल के गेट पर पहुँचा। मेरे फेफड़े जल रहे थे।
अस्पताल की बड़ी पीली इमारत के बाहर दो सफ़ेद बल्ब जल रहे थे और उस रोशनी में धूल नाच रही थी। गेट का पुराना लोहे का दरवाज़ा खुला था, और उसके अंदर सीढ़ियाँ थीं — पुरानी, घिसी हुई पत्थर की सीढ़ियाँ, जिन पर चढ़ते वक़्त जूते चरमराते हैं।
और सीढ़ी के नीचे, आख़िरी छोटी सीढ़ी पर, मेरी माँ बैठी थीं।
काजल उनके पीछे खड़ी थी, उनका कंधा पकड़े हुए। माँ का सिर झुका हुआ था, साड़ी का पल्लू कमर में खोंसा हुआ था और उनका एक हाथ सीढ़ी के पत्थर पर टिका हुआ था जैसे वो खुद को सहारा दे रही हों। वो खाँस रही थीं। छोटी-छोटी खाँसियाँ नहीं — गहरी, अंदर से आती हुई खाँसी, जैसे कोई लंबे समय से बंद कमरे की हवा बाहर निकाल रहा हो।
मैंने उनकी तरफ़ पहला कदम बढ़ाया, और मेरा पैर हवा में ही रुक गया।
क्योंकि सीढ़ी के दूसरी तरफ़, माँ के ठीक नीचे वाली सीढ़ी के पास, एक आदमी खड़ा था।
उसके एक हाथ में लोहे की पट्टी थी — लंबी, चपटी, जैसी पुराने मकानों की सीढ़ी नापने या उखाड़ने के लिए होती है। और दूसरे हाथ में एक पीला काग़ज़। काग़ज़ मुड़ा हुआ था, पर उसके कोने पर वो नीली गोल मोहर साफ़ दिख रही थी।
वो आदमी मेरी तरफ़ नहीं देख रहा था। वो सीढ़ी देख रहा था। ऊपर से नीचे तक, ध्यान से, जैसे कोई मिस्त्री काम शुरू करने से पहले देखता है — कहाँ से पहला हथौड़ा लगेगा।
मैंने उसके जूते देखे। चमकते हुए। इतने साफ़ कि उन पर अस्पताल की धूल भी नहीं लगी थी।
मैंने चार कदम में सीढ़ी पार की।
“माँ।”
उन्होंने सिर उठाया। आँखें लाल थीं, होंठ सूखे। उन्होंने मुझे देखा और पहली बात जो कही, वो यह थी —
“मैं ठीक हूँ, बेटा। तू बैठ जा। तेरे जूते खुले हैं।”
यही हैं माँ। आधी साँस में भी पहले बच्चे के जूते दिखते हैं।
मैं उनके पास बैठा और उनकी पीठ सहलाई।
“साँस लो,” मैंने कहा। “धीरे। जैसे मैंने सिखाया था — खाँसी आए तो पहले रुको, फिर लंबी साँस।”
वो मेरी तरफ़ देखकर मुस्कुराने की कोशिश करने लगीं और मुझे यह सबसे ज़्यादा डरा गया। माँ जब मुस्कुराकर कहे कि कुछ नहीं हुआ, तो सच में कुछ हुआ होता है।
तभी मेरे पीछे के पत्थर पर लोहे की पट्टी रखने की आवाज़ आई।
टक।
मैं मुड़ा।
वो आदमी मेरे बगल में था। उम्र चालीस के आसपास, दुबला, सफ़ेद कुर्ता, और गले में कुछ नहीं — न माला, न धागा, न कुछ। जैसे उसका कोई नाम नहीं, बस काम है।
“तुम कौन हो?” मैंने पूछा।
“यही अस्पताल,” उसने कहा, और अपनी पट्टी से सीढ़ी की तरफ़ इशारा किया। “अब खतरनाक सीढ़ी। शाम को जाँच हुई। काग़ज़ पढ़ लो — कल सुबह से इस सीढ़ी पर चढ़ना मना।”
मैंने काग़ज़ उसके हाथ से खींचा।
पीला काग़ज़। ऊपर भारद्वाज कंस्ट्रक्शन की नीली गोल मोहर। नीचे पंक्ति — “सीढ़ी असुरक्षित। आज रात बारह बजे से इसे बंद रखा जाएगा। मरम्मत तब तक, जब तक नई इमारत का काम तय न हो। हस्ताक्षर —” और नीचे बस एक लाल निशान।
मेरी उँगलियाँ ठंडी हो गईं।
सीढ़ी।
यह अस्पताल की एकमात्र सीढ़ी है। इक्कीस सीढ़ियाँ। और जानते हो, पहली मंज़िल पर डॉक्टर इसरानी का कमरा है, दूसरी मंज़िल पर मरीज़ों का वार्ड, और सीढ़ी के पास ही फार्मेसी है जहाँ माँ की दवा रखी है — जो कल खत्म हो रही है।
अगर यह सीढ़ी बंद हो गई, तो न डॉक्टर ऊपर जा सकेंगे, न मरीज़, न दवा। सीढ़ी नहीं बंद हो रही थी। साँस बंद हो रही थी।
“तुम रणवीर का आदमी हो,” मैंने कहा, आवाज़ धीमी, हर शब्द ज़मीन पर रखता हुआ।
“मैं सिर्फ़ काम करने आया हूँ,” उसने कहा। “काग़ज़ लिखने वाले ऊपर बैठते हैं। मैं सीढ़ी पर काम करता हूँ।”
“मेरी माँ इसी सीढ़ी पर बैठी हैं।”
वो एक पल मेरी माँ की तरफ़ देखता रहा। बस एक पल। फिर उसने आँखें नीची कर लीं और पट्टी उठाई।
“मैं तुम्हारी माँ का इलाज नहीं करता,” उसने कहा। “तुम उससे कराओ, जो करता हो।”
और वो मुड़ा और सीढ़ी सीढ़ी तीन पत्थर गिनने लगा — आवाज़ के साथ।
मैं वहीं बैठा रहा, और मेरे अंदर एक आवाज़ ज़ोर से चीख रही थी कि उठ, उसकी पट्टी छीन, ये काग़ज़ फाड़। पर माँ मेरे बगल में बैठी थी, साँस ले रही थी, और उनका हाथ मेरी कमीज़ पर जमा हुआ था।
तभी मेरी जेब में घंटी हिली।
एक बार।
और उसकी आवाज़ साफ़ थी, ठंडी, छोटी।
“काग़ज़ फाड़ने से सीढ़ी नहीं जुड़ेगी।”
मैंने आँखें बंद नहीं कीं। मैंने माँ का हाथ पकड़ा और धीरे से कहा —
“माँ, सीढ़ी पर मत बैठो। नीचे आओ। अब से तुम दवा लेने ऊपर मत चढ़ो। मैं लाऊँगा। रोज़ लाऊँगा।”
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा, और उनकी आँखों में वो चीज़ थी जो मैं बचपन में बहुत डर के देखता था — यह चीज़ कि माँ मुझे कमज़ोर पा रही है।
“बेटा,” वो धीमे से कहीं, “कल तक तो सीढ़ी भी रहेगी या नहीं…?”
और मैंने उनका हाथ कसकर पकड़ लिया।
“सीढ़ी रहेगी,” मैंने कहा। “अगर रेलिंग बननी पड़े, तो रेलिंग बनाऊँगा। अगर ईंट बदलनी पड़े, तो ईंट बदलूँगा। पर आज रात ये आदमी ऊँची सीढ़ी पर पहले मुझ पर मिलेगा, फिर रेलिंग पर।”
पीछे लोहे की पट्टी फिर पत्थर पर टकराई।
और मैंने उसकी तरफ़ देखा, बिल्कुल सीधा, और मुस्कुराया। जानते हो, कभी-कभी मुस्कुराना सबसे सच्चा डर होता है। मैंने वही मुस्कान दी।
“भाई साहब,” मैंने कहा, “सीढ़ी अब खाली होगी। काग़ज़ में लिखा है — आज रात बारह बजे से। अभी दस भी नहीं बजे होंगे।”
उसने घड़ी की तरफ़ हाथ बढ़ाया, फिर रोककर, मेरी तरफ़ देखा।
“तुम कौन हो?” उसने पहली बार मेरे बारे में पूछा।
“मैं इस सीढ़ी की बेटी का बेटा हूँ,” मैंने कहा। “और कल सुबह से सीढ़ी बंद हो, उससे पहले गली के चालीस आदमी इसी सीढ़ी पर आकर माँ का हाल पूछेंगे। चालीस। तुम गिन लेना।”
वो हँसा नहीं। पर उसकी पकड़ पट्टी पर ढीली हो गई।
मैंने अपनी जेब में हाथ डाला, उस्ताद की दी हुई चाबी को टटोला, फिर माँ को सहारा देकर उन्हें सीढ़ी से नीचे उतारा, एक-एक पत्थर।
और जब मैं उन्हें अस्पताल के गेट के बाहर बेंच तक ले आया, तब जाकर मैंने साँस ली।
पर साँस पूरी नहीं हुई, क्योंकि मन में एक बात अटक गई थी। काग़ज़ पर लिखा था — “मरम्मत तब तक, जब तक नई इमारत का काम तय न हो।”
यानी सीढ़ी की मरम्मत का कोई फ़ैसला नहीं। सिर्फ़ नई इमारत का इंतज़ार।
और पीछे, सीढ़ी के नीचे बल्ब की रोशनी में, वो आदमी अब भी पत्थर गिन रहा था।
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