The Mysterious Bell – Chapter 334
“यह आज सुबह भारद्वाज ट्रस्ट के दफ़्तर से आया है,” उन्होंने कहा। “ये अस्पताल जिस ज़मीन पर खड़ा है — वो ज़मीन काग़ज़ी रूप से ट्रस्ट की है। पिछले बीस साल से भारद्वाज कंस्ट्रक्शन आपके अस्पताल के किराये का हिसाब रख रही थी, और आप जानते हैं, किराये का हिसाब जब बढ़े, तो ज़मीन भी साथ बढ़ती है।”
“हमने बीस साल किराया दिया है,” डॉक्टर इसरानी ने कहा, और उनकी आवाज़ पहली बार ज़रा ऊँची हुई। “हर महीने, बिना एक दिन देर किए।”
“दिया है, डॉक्टर साहब,” सक्सेना ने कहा। “और हम उसके लिए आपको धन्यवाद भी देते हैं। पर अब ये काग़ज़ कुछ और कह रहा है।”
उन्होंने काग़ज़ पर उँगली रखी।
“पंद्रह दिन के अंदर कब्ज़ा सौंपना होगा,” उन्होंने कहा। “बाकी औपचारिकताएँ — मुआवज़ा, काग़ज़ी कार्रवाई — वो सब भारद्वाज जी खुद शाम को आपसे बात करके तय कर लेंगे। मैं तो बस संदेश लाया हूँ।”
डॉक्टर इसरानी का हाथ काँपा।
मैंने देखा — उनकी उँगलियाँ, जो अभी स्टेथोस्कोप पकड़ रही थीं, काग़ज़ को छूने के लिए बढ़ीं और रुक गईं, काँप रही थीं। बूढ़ी उँगलियाँ, जो हर दिन कितने बच्चों के माथे छूती हैं, काग़ज़ के किनारे तक पहुँचते-पहुँचते ऐसे हिल रही थीं जैसे हवा में कोई डोर काँप रही हो।
पर वो पीछे नहीं हटे।
उन्होंने काग़ज़ पढ़ा। पूरा पढ़ा — ऊपर से नीचे। फिर उन्होंने सिर उठाया और उनकी आवाज़ ऐसी साफ़ निकली, जैसी पिछले कई सालों में कभी नहीं निकली थी।
“यहाँ रोज़ सुबह छह बजे से मरीज़ आते हैं,” उन्होंने कहा। “बाहर से गाँव से आते हैं। झुग्गी से आते हैं। पैदल आते हैं। कुछ तो ऐसे आते हैं कि पैसे नहीं होते, फिर भी आते हैं — क्योंकि यहाँ कोई उन्हें मना नहीं करता।”
उन्होंने काग़ज़ सक्सेना की तरफ़ वापस बढ़ाया।
“काग़ज़ से इलाज नहीं होता, सक्सेना जी,” उन्होंने कहा। “मरीज़ को दवा चाहिए। उसकी औरत को जच्चा-बच्चा चाहिए। उसके बूढ़े बाप को साँस की दवा चाहिए। ये काग़ज़ उनके बदले कुछ नहीं देता।”
सक्सेना ने काग़ज़ लिया, तह किया, और अपनी जेब में रखा।
“मैं तो मुश्किल का काम करने वाला आदमी नहीं हूँ, डॉक्टर साहब,” उन्होंने कहा। “मैं तो बस एक लिफ़ाफ़ा लेकर आया हूँ। असली बात शाम को खुद भारद्वाज जी करेंगे।”
वो धीरे से मुड़े और मेरी तरफ़ देखा।
“और अंकुश बेटा,” उन्होंने कहा, “बुरा मत मानना, पर मैं तुम्हारे पापा के लिए काग़ज़ नहीं लाया। यह अस्पताल का काग़ज़ है।”
मैंने उन्हें घूरा।
“आप किसी के लिए कुछ नहीं लाते, सक्सेना जी,” मैंने कहा। “आप सिर्फ़ काग़ज़ लाते हैं, और काग़ज़ के पीछे छुपते हैं।”
वो हँसे। ज़ोर से, दिल से, ऐसे जैसे किसी बच्चे ने कोई बहुत प्यारी बात कह दी हो।
“तुम होशियार हो, बेटा,” उन्होंने कहा। “इसीलिए भारद्वाज जी तुम्हें इतना याद करते हैं।”
वो मुड़े और चलने लगे। और मैंने उस काग़ज़ को पढ़ने के लिए हाथ बढ़ाया, जो उनकी जेब में जा रहा था — मेरा इरादा नहीं था, बस इच्छा थी।
पर उससे पहले मीरा आगे बढ़ी।
“सक्सेना जी,” उसने कहा, आवाज़ में वो कड़कपन जो उसके काम में ही आ जाता है। “आपने काग़ज़ दिखाया, पढ़ने नहीं दिया। हमें पढ़ने दीजिए।”
सक्सेना एक पल रुके।
फिर वो मुड़े, काग़ज़ निकाला, और मीरा की तरफ़ बढ़ा दिया — ऐसे, जैसे कोई ताश का पत्ता दिखा रहा हो।
“पढ़ो, बेटी,” उन्होंने कहा। “पढ़ने से किसी की ज़मीन नहीं जाती। काग़ज़ पढ़ने में कोई नुकसान नहीं है।”
मीरा ने काग़ज़ लिया। मैंने साथ में झुककर पढ़ा।
काग़ज़ पर अस्पताल की ज़मीन का पुराना नक़्शा था, ऊपर बड़ी मोहर, और नीचे दो हस्ताक्षर।
मेरी आँखें उस पहली मोहर पर अटकी। पुरानी, धुँधली, नीले घेरे वाली मोहर — जिसे मैंने पहले पीली फाइल के पहले काग़ज़ पर देखा था। वही मोहर। वही नीली गोल।
“ये मोहर किसकी है?” मैंने पूछा।
सक्सेना ने मुस्कुराकर कहा, “ट्रस्ट की नहीं।”
“तो?”
उन्होंने एक पल सोचा, फिर वो मीठी आवाज़ में बोले — “अगर तुम इतने ही उत्सुक हो, तो हस्ताक्षर पढ़ लो।”
और मैंने पढ़ा।
काग़ज़ के नीचे, दो हस्ताक्षरों में से दूसरे पर मेरी आँखें ठहर गईं।
शुक्ला।
लाइसेंस बाबू शुक्ला। वही शुक्ला, जिसने कल ताज़ा रजिस्टर में अपना हस्ताक्षर माना था, वही शुक्ला, जिसने एक घंटे पहले अपनी पीली फाइल में रखा अधूरा नाम मुझे नहीं पढ़ने दिया था।
मेरा हाथ काँपा।
“ये क्या है?” मैंने सक्सेना से कहा। “ये क्या है, सक्सेना जी?”
सक्सेना ने हाथ जोड़े, उसी नमस्ते की मुद्रा में।
“यह कानून है, बेटा,” उन्होंने कहा। “कानून किसी को नहीं बताता कि कौन सही है, कौन ग़लत। कानून सिर्फ़ यह बताता है कि काग़ज़ पर क्या लिखा है। और यहाँ काग़ज़ पर लिखा है — अस्पताल की ज़मीन ट्रस्ट की। और ट्रस्ट के पीछे खड़ा आदमी भारद्वाज है।”
वो एक कदम पीछे हटे।
“और जहाँ तक शुक्ला बाबू का सवाल है —” उन्होंने हल्की हँसी दी, “— वो इतने बड़े मामले में अकेले हस्ताक्षर नहीं करते। उनके ऊपर भी कोई है।”
वो मुड़े और चलने लगे।
तभी मेरी नज़र गुमटी के पास हुई।
इलियास अली बक्श पीपल के पीछे से निकले थे — चुपचाप, अपनी फटी जेब में हाथ, सफ़ेद कुर्ता, रुकी घड़ी गले में। वो अकेले नहीं थे। गुमटी की मेज़ पर उन्होंने एक छोटी चाबी रखी — काली, लोहे की, पुरानी, ठीक उसी आकार की जैसी बंसी बाबा और हाफ़िज़ बाबा की जेब में थी।
मैंने देखा, सबने देखा।
शबनम आपा ने आगे बढ़कर चाबी उठानी चाही, पर इलियास ने हाथ से रोका।
“नहीं,” उन्होंने कहा। “ये उस्ताद को दे देना।”
“आप खुद क्यों नहीं देते?” शबनम आपा ने कहा, और उनकी आवाज़ में आम की तेज़ी नहीं थी, कुछ और था — करुणा।
इलियास ने उनकी तरफ़ देखा, और उनकी आँखों में कुछ ऐसा चमका जो पचास साल से छुपा था।
“क्योंकि,” उन्होंने कहा, “अगर मैं देने लगा, तो पूछेगा — किसने भेजा? और मैं झूठ नहीं बोलूँगा। पर अभी सच बोलने का वक़्त नहीं है।”
वो पीछे मुड़े, मुझे देखा, और चले गए — गली के मुँह की तरफ़ नहीं, उल्टी तरफ़, पीपल के पीछे वाली गली में। रास्ते में उन्होंने पापा को देखा। एक पल के लिए उनके कदम रुके। और फिर चल दिए।
उस्ताद चुपचाप गुमटी की मेज़ तक गए, छोटी चाबी उठाई, और अपनी हथेली पर रखकर देर तक देखते रहे।
मैं उनके पास गया।
“उस्ताद?”
वो नहीं बोले।
“उस्ताद, ये चाबी किसकी है?”
वो चाबी की तरफ़ देखते रहे, और उनकी आँखों में पानी इकट्ठा हो गया — हल्का, धुँधला, जैसे बरसात से पहले आसमान।
“ये चाबी,” उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ इतनी धीमी थी कि मुझे पास जाना पड़ा, “माँ की सिलाई की पेटी की है। जिस पेटी पर पचास साल से ताला लगा है। जिसकी चाबी इलियास के पास है।”
उन्होंने चाबी मुठ्ठी में बंद कर ली।
“और ये,” उन्होंने कहा, “मुझे आज दे रहा है, पर कह रहा है — मत कहना कि मैंने भेजी।”
वो मेरी तरफ़ देखा।
“समझ रहे हो, अंकुश? ये चाबी देने का मतलब ये नहीं है कि वो पेटी खोलना चाहता है। ये चाबी देने का मतलब ये है कि वो मुझसे कह रहा है — तू खोल। और मैं खोल दूँ, तो मैं उसके सामने झुक जाऊँगा।”
“तो खोलिए,” मैंने कहा।
उस्ताद ने मेरी तरफ़ देखा, और उनकी आँखों में वो गुस्सा आया जो बुज़ुर्गों की आँखों में तब आता है जब बच्चे पुरानी चोट पर हाथ रख देते हैं।
“तू नहीं जानता,” उन्होंने कहा। “तू नहीं जानता कि उस पेटी में क्या है।”
“तो बताइए।”
वो चुप हो गए।
काफ़ी देर चुप।
और फिर उन्होंने चाबी जेब में रखी, और उसी ट्रंक की तरफ़ नहीं देखा जिसमें कपड़े में लिपटी पेटी रखी थी। वो अपनी लकड़ी की स्टूल पर बैठ गए, और सामने की तरफ़ देखने लगे — जहाँ सक्सेना की सफ़ेद गाड़ी खड़ी थी।
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