The Mysterious Bell – Chapter 333
“अगर तेरे घर का बंद दरवाज़ा टूटने लगे और कोई कहे कि तेरे पापा ने कोई ज़रूरी काग़ज़ छिपाया है, तो उसे मेरा नाम देना। उसे कहना कि इलियास कह गया था — शंकर यादव ने एक बार किसी की जान बचाई थी, और उस दिन के बाद उसने अपनी चुप्पी से उस जान की कीमत चुकाई है।”
मैंने थैली मुट्ठी में पकड़ी। छोटी थी, हल्की थी, और मुझे लगा जैसे मुट्ठी में किसी की आधी ज़िंदगी बंद कर दी हो।
“उस्ताद,” मैंने कहा। “अब आपका क्या?”
उस्ताद मेरे सामने आकर खड़े हो गए। उनके चश्मे पर धूप पड़ रही थी और उनकी सफ़ेद दाढ़ी इस बार पहले से थोड़ी हल्की लग रही थी।
“मेरा?” उन्होंने कहा। “मेरा अब वही है जो पचास साल पहले था। दुकान, मशीन, और एक भाई। बस भाई पहले दूर बैठता था, अब पास बैठेगा।”
वो मुस्कुराए।
और फिर वही हुआ जो मुझे डर था कि नहीं हो, पर जो होना ही था।
चाय के गिलास आधे खाली थे, बच्चे पत्थर के पुल पर बैठकर पुरानी तस्वीर देख रहे थे, शबनम आपा कप धो रही थीं, और गली में उस दिन पहली बार एक अजीब सी शांति थी — वो शांति जो किसी लड़ाई के बीच में मिलती है, पूरी जीत से पहले।
तभी गली के मुँह पर एक सफ़ेद गाड़ी रुकी।
हम सब अपने-आप चुप हो गए।
गाड़ी का दरवाज़ा खुला। पहले जूता उतरा — चमकदार, साफ़, काला। फिर सफ़ेद कुर्ता, फिर सफ़ेद बालों वाला सिर, और फिर आधी मुस्कान।
चंद्रेश सक्सेना।
उनके हाथ में एक पीला लिफ़ाफ़ा था। वो गाड़ी से उतरे, दरवाज़ा बंद किया, और गुमटी की तरफ़ चलने लगे — उस हुलिए में, उस आराम से, जैसे यहाँ आने का उनका रोज़ का रास्ता हो।
वो हमारे सामने आकर रुके। उन्होंने इलियास को देखा, फिर उस्ताद को, फिर बंसी और हाफ़िज़ को दोनों को एक साथ बैठा देखा, और उनका मुँह थोड़ा और फैल गया।
“अरे वाह,” उन्होंने कहा, आवाज़ में वो मिठास जो हमेशा किसी चीज़ को निगलने से पहले आती है। “आज यहाँ तो मेला लगा है। बंसी भाई, निसार भाई — एक बेंच पर! ये बात तो अख़बार में जानी चाहिए। मीरा बेटी, ये आज का सबसे बड़ा सुखद समाचार है, हाँ?”
मीरा ने अपना गिलास नीचे रखा।
“आप क्या चाहते हैं, सक्सेना जी?” मैंने कहा।
उन्होंने पीला लिफ़ाफ़ा ऊपर उठाया, और हवा में एक बार हिलाया, जैसे बच्चे को टॉफ़ी दिखाते हैं।
“मैं क्या चाहता हूँ, बेटा?” उन्होंने कहा। “मैं तो तुम्हारी भलाई चाहता हूँ। ये लिफ़ाफ़ा आज सुबह मेरे दफ़्तर की मेज़ पर पड़ा था। बिना नाम, बिना मोहर। मैंने खोला, तो अंदर एक काग़ज़ था — पुराना, पीला, नीली स्याही, और नीचे एक लाल अंगूठा।”
उन्होंने एक पल रुककर हम सबके चेहरे देखे।
“और उस काग़ज़ पर दो नाम हैं, बेटा,” उन्होंने कहा। “एक नाम जगदीश यादव का। और दूसरा नाम — तेरे पापा का।”
गली में हवा रुक गई।
मैंने पीछे देखा। उस्ताद के हाथ से चाय का गिलास ज़मीन पर नहीं गिरा, पर उनका हाथ मेज़ पर ऐसे बैठ गया जैसे कोई चीज़ उनकी हड्डी से बंध गई हो।
और गुमटी के पीछे, गली की तरफ़ से एक परछाई पड़ी — मैंने सिर उठाया तो देखा कि पापा खड़े थे। पता नहीं कब आए। पता नहीं कितनी देर से।
उनके हाथ में वही पुराना पेचकस था।
और उस पल मैंने जेब में घंटी को हिलते महसूस किया — एक बार, बहुत धीमे, जैसे कोई साँस भर रहा हो।
सक्सेना ने लिफ़ाफ़ा खोला और उसमें से पीला काग़ज़ निकालकर हवा में सीधा कर लिया।
“अब सुनो,” उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ अब भी मीठी थी। “ये काग़ज़ सिर्फ़ एक अंगूठे का है। और ये अंगूठा —” उन्होंने मेरी तरफ़ देखा, “— तेरे पापा ने लगाया था या नहीं, ये अब भी साबित होना बाकी है। पर एक बात साफ़ है, बेटा।”
उन्होंने काग़ज़ को हल्का सा झटका दिया।
“जिस दिन ये अंगूठा साबित हो जाएगा,” उन्होंने कहा, “उस दिन ये पूरी गली काग़ज़ पर उनका है जिसका नाम इसमें लिखा है। और तुम —” उन्होंने मेरी तरफ़ उँगली उठाई, “— तुम उस दिन यहीं खड़े होकर देखोगे।”
गली में कोई नहीं बोला।
पर मैंने पीछे मुड़कर पापा को देखा — और उन्होंने पहली बार, पच्चीस साल बाद, सक्सेना की तरफ़ नहीं, मेरी तरफ़ देखा।
और उनके हाथ से पेचकस धीरे से ज़मीन पर रख दिया गया।
॥
मैंने सक्सेना की तरफ़ देखा, फिर पापा की तरफ़ बढ़ते कदम रोक नहीं पाया।
पर सक्सेना रुके नहीं। वो मुस्कुराए, लिफ़ाफ़ा जेब में रखा, और गुमटी से आगे बढ़ गए — गली के मुँह की तरफ़ नहीं, उल्टी तरफ़, नूर अस्पताल की तरफ़।
मैं हैरानी से उनका पीछा करता रह गया।
गली में हर आदमी सोच में था कि सक्सेना पापा से भिड़ेंगे, काग़ज़ दिखाएँगे, धमकी देंगे, और हम सब वहीं उनकी आवाज़ में फँस जाएँगे। पर वो अस्पताल की तरफ़ चले। सीधे चले, उसी आराम से, उसी हल्की गर्दन हिलाते हुए, जैसे घर से निकलकर बाज़ार पहुँच गए हों।
गुमटी पर सब जगह से उठ गए।
बंसी बाबा ने लाठी उठाई, हाफ़िज़ बाबा ने टोपी सीधी की, इलियास ने चाय का गिलास मेज़ पर रखा। उस्ताद वहीं बैठे रहे, पर उनकी आँखें सक्सेना की पीठ पर चिपक गई थीं।
मीरा ने कैमरा उठाया।
“अंकुश,” उसने धीरे से कहा, “ये आदमी अब क्या करने जा रहा है?”
“पता नहीं,” मैंने कहा। “पर जो भी है, अभी होगा। चल।”
मैंने पीछे मुड़कर देखा। पापा अपनी जगह पर खड़े थे, पेचकस ज़मीन पर, हाथ खाली, आँखें मुझ पर। मैंने उन्हें इशारा किया — चलिए। वो पहले हिचके, फिर धीरे-धीरे आए, और उनके जूते की आवाज़ गली की ईंटों पर सबको साफ़ सुनाई दी।
हम सब अस्पताल की तरफ़ चले।
गली से अस्पताल का गेट केवल सौ कदम है। पर उस दिन वो सौ कदम ऐसे लगे जैसे पूरा मोहल्ला पार कर रहे हों। रास्ते में भोला भाई की दुकान से उनका बेटा सनी निकला, उसके हाथ में एक पेचकस था, मुँह खुला। शबनम आपा गुमटी पर नहीं रुकीं — वो भी हमारे साथ आईं, हाथ में साड़ी का पल्लू दबाए।
अस्पताल के बाहर पीली दीवार थी, टूटी खिड़कियाँ, और गेट पर खड़ा एक सफ़ेद कोट वाला बूढ़ा आदमी।
डॉक्टर निहाल इसरानी।
वो हमेशा की तरह गेट पर खड़े थे, हाथ में पुराना स्टेथोस्कोप, टेप लिपटी रबर की नली उनकी उँगलियों के बीच चुपचाप लटक रही थी। उन्होंने सक्सेना को आते देखा और उनके चेहरे पर जो भाव आया, वो गुस्से का नहीं था — थकान का था। ऐसी थकान जो पहले से जानती है कि क्या आने वाला है।
सक्सेना गेट पर पहुँचे और दोनों हाथ जोड़कर नमस्ते की मुद्रा में खड़े हो गए।
“डॉक्टर साहब,” उन्होंने कहा, आवाज़ में वो मिठास जो फ़ाइल खोलने से पहले आती है। “बहुत दिनों से आपकी मेहनत देख रहा हूँ। सच में, बस इतना कहने आया था कि शहर में अगर दो लोग अपने काम से ईमानदार हैं, तो एक आप हैं, दूसरे आपके यहाँ की नर्सें।”
डॉक्टर इसरानी ने स्टेथोस्कोप अपनी जेब में रखा और सीधे उनकी आँखों में देखा।
“बोलिए,” उन्होंने कहा। “दोनों की तारीफ़ करनी होती तो फ़ोन कर देते। असली बात क्या है?”
सक्सेना का मुँह और फैल गया।
“आप भी न, डॉक्टर साहब,” उन्होंने कहा। “बात पर आने में आपको ज़रा भी देर नहीं लगती।”
उन्होंने जेब से वही पीला लिफ़ाफ़ा निकाला।
यह वही पंगा काग़ज़ नहीं था, जिसे उन्होंने गुमटी पर खोला था। यह अलग था — नीली मोहर के साथ, मोटा, बना-बनाया। उन्होंने उसे खोला और डॉक्टर इसरानी की तरफ़ कर दिया।
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