The Mysterious Bell – Chapter 332
मैंने कहीं पीछे शबनम आपा को देखा — वो अपनी साड़ी के पल्लू से मुँह पोंछ रही थीं और साथ ही साथ किसी को डाँट भी रही थीं कि रोना नहीं, धूल अंदर जाएगी।
मीरा ने कैमरा नीचे कर दिया था। मैंने देखा — उसकी आँखें भरी हुई थीं, और वो कैमरा इसलिए नीचे नहीं कर रही थी कि दृश्य अच्छा नहीं था। वो नीचे इसलिए कर रही थी कि कुछ चीज़ें कैमरे में नहीं आनी चाहिए।
तभी जेब में घंटी हिली।
उसकी आवाज़ साफ़ थी, गरम, जैसे किसी ने पुरानी तार खींचकर एक सुर निकाला हो।
“जुड़ गया,” घंटी ने कहा। “त्रीस अंक।”
“बस तीस?” मैंने मन ही मन कहा।
“बस तीस,” घंटी ने कहा। “बचा हुआ तो अभी तेरे सामने पड़ा है।”
मैंने आँखें खोलीं और संदूक की तरफ़ देखा।
और तभी मेरी नज़र संदूक के पीछे, शेल्फ के उस कोने पर पड़ी, जहाँ धूल नहीं थी।
धूल की मोटी परत में एक साफ़ चौकोर जगह थी — ठीक किसी काग़ज़ या लिफ़ाफ़े के बराबर।
मैंने उंगली उस पर फेरी। साफ़ थी। सबसे साफ़ चीज़ उस पूरे कमरे में।
“उस्ताद,” मैंने कहा। “यहाँ कुछ रखा था।”
उस्ताद आए, झुके, देखा। फिर मेरी तरफ़ देखकर बोले, आवाज़ बहुत धीमी थी।
“लिफ़ाफ़ा,” उन्होंने कहा। “वो यहीं रखा था।”
इलियास दरवाज़े के पास खड़ा था। उसने देखा, फिर बोला, बिना ज़्यादा भाव के, जैसे पचास साल से यही लाइन दबाकर रखी थी।
“तीसरी चीज़ मेरे पास नहीं है,” उसने कहा। “वो उसी रात कोई उठा ले गया था। मैंने ये ताले में बंद होते देखे थे, और मैंने सोचा — जो उठा ले गया, उसका इस्तेमाल वो करेगा जिसके पास काग़ज़ हों। मेरे पास काग़ज़ नहीं थे। मेरे पास सिर्फ़ रुकी हुई घड़ी थी।”
मैंने उसकी घड़ी देखी। काँटे अब भी दस बजकर कुछ मिनट पर रुके थे।
“और आज?” मैंने पूछा।
इलियास ने मेरी तरफ़ देखा।
“आज मैं ये लेकर आया हूँ,” उसने कहा, और हाथ उठाया जिसमें छोटी काली थैली थी। “इसके अंदर मेरी माँ की सिलाई की पेटी की चाबी है। और कुछ काग़ज़ हैं — बंसी बाबा के चार सौ का पुराना हिसाब, जो उनके पास से एक बार एक आदमी ने उठाया था और कभी लौटाया नहीं। मैंने उस आदमी की ज़ुबान से वो पचास साल बाद निकाले हैं।”
बंसी बाबा ने उसकी तरफ़ देखा।
“कौन आदमी?” सबने साथ पूछा, जैसे बाज़ार में एक ही सवाल पचास गले बोलते हैं।
इलियास ने गली की तरफ़ नहीं देखा। उसने सिर्फ़ कहा —
“वो नाम अभी बाहर नहीं आएगा। आज भंडार खुला, ये बहुत है। नाम खुलेगा तो गली में एक बात बंद हो जाएगी, और आज गली ने एक बात खोली है। आज इसे जीने दो।”
उस्ताद ने इलियास की तरफ़ देखा। दोनों भाइयों के बीच तीन कदम थे और पचास साल।
उस्ताद ने मुँह खोला, कुछ कहा नहीं। फिर उन्होंने वो कपड़े में लिपटी चीज़ आगे बढ़ाई।
“ये तेरे लिए सिलकर रखा था,” उन्होंने कहा। “पचास साल पहले। तेरा कुर्ता। तेरे नाप का ही है। तुझे अब भी वही नाप मिलता है कि नहीं, मुझे नहीं पता।”
इलियास ने कपड़ा नहीं छुआ।
फिर उसने हाथ बढ़ाया और कुर्ता पकड़ लिया।
“अंदर कुछ नहीं है ना?” उसने कहा, आवाज़ में कोई तान नहीं थी, बस थकान।
“सिर्फ़ कपड़ा है,” उस्ताद ने कहा। “आज के बाद सब कुछ सिर्फ़ कपड़ा होना चाहिए।”
इलियास ने कुर्ता सीने से लगाया। उसके हाथ काँप रहे थे, और वो इस बात को छिपाने के लिए कुर्ते को सीने से लगाए ही खड़ा रहा।
गुमटी पर वही हुआ जो आज तक उस गली में कभी नहीं हुआ था — पूरी गली एक साथ चाय पीने बैठी।
शबनम आपा ने गुमटी की बेंचें बाहर खींच दीं, दो और पुराने स्टूल मैंने दुकान से लाकर रखे, और भोला भाई ने अपनी दुकान से एक लंबी पटिया उठाकर लाकर पत्थर के पुल पर रख दी, जिस पर चार बच्चे बैठ गए।
“आज पैसे कोई नहीं देगा,” शबनम आपा ने ऐलान किया। “आज चाय मेरी। और कटोरी में जो पैसे डालेगा, उसका गिलास मैं उलटी करके रख दूँगी।”
बंसी बाबा और हाफ़िज़ बाबा एक ही बेंच पर बैठे थे — दोनों के बीच में सिर्फ़ एक कटोरी थी। दोनों के हाथ में गरम चाय, और दोनों की आँखें लाल।
दुबे अंकल अपनी कुर्सी उठाकर गुमटी के पास लाए और उस पर बैठ गए। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
“अंकुश,” उन्होंने कहा।
“जी, अंकल।”
“काग़ज़ ग़लत हो तो सील नहीं लगती,” उन्होंने कहा। “पर काग़ज़ ग़लत करने वाला भी कोई बैठा है। वो दोबारा काग़ज़ बनवाएगा। और अगली बार नंबर सही होगा।”
“मुझे पता है, अंकल,” मैंने कहा। “इसीलिए आज रात को हमें ये नंबर अपनी तरफ़ से लिखने होंगे — लाइसेंस दफ़्तार के रजिस्टर में।”
दुबे अंकल ने चाय की चुस्की ली और कुछ देर मेरी तरफ़ देखते रहे।
“तू अपने बाप का बेटा है,” उन्होंने कहा। “पर बात करने में बाप से तेज़ है। बाप सिर्फ़ काम करता है।”
मैं हँसा। मेरे पीछे टिंकू अपना गिलास दोनों हाथों से पकड़े खड़ा था और चाय को फूँक रहा था, जैसे कोई बड़ा काम कर रहा हो।
“उस्ताद,” उसने कहा, “क्या मैं भी अब काग़ज़ पढ़ सकता हूँ?”
“तू क्यों नहीं?” मैंने कहा। “कल से छत पर नहीं चढ़ेगा, और पढ़ाई में जो पीछे रह गया, वो पूरा करेगा। मैंने तेरे मास्टर जी से बात कर ली है। शाम की पाठशाला में तेरा नाम लिखवा दिया है।”
टिंकू ने एक पल मेरी तरफ़ देखा, फिर अपनी चाय में।
“और दुकान?” उसने धीमे से पूछा।
“दुकान तेरी है,” मैंने कहा। “कल तू उसे खोलेगा। मैं तेरे पीछे खड़ा रहूँगा।”
टिंकू ने चाय पी और उसका चेहरा गिलास के पीछे छिप गया, पर मैंने देख लिया कि उसकी आँखें भर गई थीं, और मैंने भी कुछ नहीं कहा — क्योंकि कुछ बातें कहने से बिगड़ जाती हैं।
फिर रेडियो वाला बूढ़ा आया। वो अपनी घिसी लाठी पर झुका, हाथ में चाय का गिलास पकड़े खड़ा था, और मुझे देखकर मुस्कुराया।
“बेटा,” उन्होंने कहा, “आज मैं अपने बेटे को फोन करूँगा। और आज मैं सिर्फ़ उसकी बात नहीं सुनूँगा। आज मैं अपनी बात भी कहूँगा।”
“कहिएगा,” मैंने कहा। “और कहिएगा कि दुकान चल रही है।”
“चल रही है,” उन्होंने कहा, और आज पहली बार जब उन्होंने ये कहा, तो उनकी आवाज़ में झूठ नहीं था।
मीरा मेरे पास आकर बैठी। उसने अपना कैमरा बगल में रखा और चाय का गिलास दोनों हाथों से पकड़ लिया।
“भंडार में मैंने कैमरा नहीं चलाया,” उसने कहा।
“मैंने देखा,” मैंने कहा।
“पर मैंने काग़ज़ पढ़ लिया,” उसने कहा। “और मैंने दुपट्टा देख लिया। और अगर आज से दो दिन बाद कोई कहे कि इन दोनों ने कभी एक-दूसरे की इज़्ज़त नहीं बचाई, तो मेरे पास अपनी आँखें होंगी।”
“अपनी आँखें रखना,” मैंने कहा। “काग़ज़ से ज़्यादा काम की चीज़ है।”
वो हँसी। फिर उसका चेहरा गंभीर हो गया।
“अंकुश,” उसने धीमे से कहा, “तीसरी चीज़। वो लिफ़ाफ़ा। मुझे लगता है वो किसी के पास बहुत सँभालकर रखा है। जैसे कोई चीज़ सँभालकर रखी जाती है — इस्तेमाल के लिए नहीं, दिखाने के लिए।”
“और ऐसी चीज़ें कहाँ रखी जाती हैं?” मैंने पूछा।
“उन दफ़्तरों में,” उसने कहा, “जहाँ दीवार पर तस्वीरें टँगी हों।”
मैंने गिलास नीचे रखा।
क्योंकि मुझे याद आ गया — साहब के कमरे में सीढ़ी के पास, काले फ़्रेम में टँगा वो पुराना काग़ज़, जिस पर घंटी बनी थी और जिसे बबलू ने एक बार देखकर मुँह फेर लिया था।
मैं कुछ कहता, उससे पहले इलियास ने मेरी तरफ़ आकर अपनी काली थैली मेरी हथेली पर रख दी।
“ये तेरे पास रहेगी,” उसने कहा। “माँ की पेटी की चाबी है इसमें। अगर मैं खुद न खोल सका, तो तू खोलेगा। और अंकुश —”
उसने एक पल रुककर गली की तरफ़ देखा, फिर मेरी तरफ़।
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno