The Mysterious Bell – Chapter 322
झूठ है।
पहला कदम उठाने वाला जीतता है।
बस उसे यह पता होना चाहिए कि कदम किस दिशा में उठाना है।
उस्ताद की दुकान का शटर आधा उठा था।
अंदर से टिक-टिक की आवाज़ आ रही थी।
वो आवाज़ जो पचास साल पुरानी है, और जो आज बिना सुई के भी चल रही थी, जैसे मशीन को कुछ याद आया हो।
मैंने शटर के नीचे से झाँका।
उस्ताद लकड़ी की छोटी स्टूल पर बैठे थे, चश्मा कान पर टेप से बँधा, मोटा काँटा हाथ में, और सामने कपड़े का एक टुकड़ा — कोई फटा हुआ कुर्ता शायद, जिसे वो बार-बार सीधा कर रहे थे, और जो हर बार फिर सिकुड़ जाता था।
“उस्ताद,” मैंने कहा।
उन्होंने सिर नहीं उठाया।
“अंदर आ जा।”
मैं अंदर गया।
दुकान में सिलाई की गंध थी — धागे की, इस्तरी के कोयले की, और पुराने कपड़े की। छोटी जगह, कपड़ों के ढेर, एक टेढ़ा दराज़, दीवार पर टँगी पुरानी कैंचियाँ।
मैं सामने रखी पुरानी लकड़ी की स्टूल पर बैठ गया।
उस्ताद ने मशीन की गति धीमी की, फिर बंद की।
चुप्पी में सिर्फ़ मशीन की आख़िरी टिक रह गई, जैसे किसी ने साँस लेकर रोक दी हो।
“दोनों चाबियाँ?” उन्होंने पूछा, बिना सिर उठाए।
“हाँ।”
“दिखा।”
मैंने दोनों चाबियाँ मशीन की सिल्ली पर रख दीं।
उस्ताद ने लाल धागे वाली चाबी उठाई। उँगली से सिरे पर खुदे अक्षर टटोले।
“हाफ़िज़,”उन्होंने धीरे से पढ़ा।
फिर दूसरी उठाई।
“बंसी।”
उन्होंने दोनों चाबियों को एक-दूसरे के ऊपर रख दिया, जैसे तराज़ू पर तोल रहे हों।
“इक्कीस साल,” उन्होंने कहा। “हल्की चीज़ है, अंकुश। चाबी के दो टुकड़े हैं — पर जो इसके साथ बंद है, वो मज़दूरों के ढेर से भारी है।”
“इसीलिए मैं आपके पास आया, उस्ताद। मुझे ये नहीं पता कि इक्कीस साल पहले क्या हुआ था। मुझे सिर्फ़ इतना पता है कि उस रात दोनों ने चाबी उठाई और चुप हो गए।”
उस्ताद ने चश्मा उतारा।
आँखें ज़्यादा बड़ी और थोड़ी धुँधली दिखीं, जैसे अंदर से कोई पुराना दृश्य चल रहा हो।
“इक्कीस साल नहीं, अंकुश,” उन्होंने कहा। “बत्तीस साल। चाबी उन्होंने इक्कीस साल पहले उठाई थी, पर आग लगी थी बत्तीस साल पहले।”
“आग?”
“आग।” उस्ताद ने मशीन के पीछे टँगी एक पुरानी तस्वीर की तरफ़ सिर हिलाया, जो धूल से ढकी थी। “यहाँ एक ही दुकान थी। दो नहीं। और उसका नाम था — बंसी-निसार भंडार।”
मैंने वो नाम दोहराया, धीरे से।
“बंसी… निसार…”
“हाफ़िज़ का असली नाम निसार है,” उस्ताद ने कहा। “बुज़ुर्गों ने हाफ़िज़ निसार अहमद कहकर पुकारा, इसलिए सब भूल गए कि उसका पहला नाम निसार था। और बंसी — उसका पूरा नाम बंसीधर था। दोनों की दुकान का बोर्ड लकड़ी का था, ऊपर काली स्याही में — बंसी-निसार भंडार। नीचे छोटे अक्षरों में — अनाज और सामान।”
“एक ही दुकान?”
“एक ही दुकान।” मशीन की टिक-टिक अब कहीं दूर से आ रही थी। “दोनों परिवार एक ही चूल्हे पर खाते थे, अंकुश। बंसी की बीवी रोटी बनाती थी, निसार की बीवी सब्ज़ी। कोई भेद नहीं, कोई हिसाब नहीं। बच्चे एक ही आँगन में खेलते थे। बंसी का बेटा और निसार का बेटा — दोनों साथ खाते, साथ सोते। एक टिफ़िन में दोनों की रोटी जाती थी स्कूल।”
“क्या हुआ उस साल?”
“आग लगी।” उस्ताद ने कपड़ा ज़मीन पर रख दिया। “रात का वक़्त था। भंडार के अंदर अनाज, तेल, कपड़े के टोकरे, ऊपर बंसी के परिवार का कमरा, नीचे निसार का। पुरानी लकड़ी की दुकान थी। बिजली की गड़बड़ी थी। और सब कुछ इतनी जल्दी हुआ कि लोगों को समझ ही नहीं आया।”
“कोई मरा?”
“घायल हुए। दोनों बेटे बाल-बाल बचे। पर बचे कैसे — यहीं सारी बात है।” उस्ताद ने आँखें मूँद लीं। “निसार ने बंसी के बेटे को आग के बीच से बाहर निकाला। अपनी बाँह जलाई, अपना दुपट्टा… अपना दुपट्टा उस लड़के के मुँह पर लपेटकर साँस बचाई। फिर दोबारा अंदर घुसा। और अपने बेटे को नहीं निकाल पाया। आग ऐसी थी कि लौटते ही छत गिर गई। बड़ी मुश्किल से बाहर वाले ने लड़के को खींचा। पर उसकी पीठ जल गई थी, साँस अंदर जम गई थी… और तीन दिन बाद वो लड़का चल बसा।”
दुकान में चुप्पी छा गई।
मशीन चुप थी।
धागे, कैंचियाँ, टोकरे — सब चुप।
“और बंसी का बेटा?” मैंने पूछा।
“बच गया। आज भी ज़िंदा है। बाहर कहीं काम करता है। पचास का हो चुका होगा।”
“तो फिर झगड़ा कहाँ से आया?”
उस्ताद ने मेरी तरफ़ सीधा देखा।
“बाज़ार ने झगड़ा बनाया,” उन्होंने कहा। “आग की रात लोग जमा थे। किसी ने किसी को कुछ कहा। किसी ने किसी से कुछ सुना। गली की बात है, अंकुश — जितनी जल्दी आग बढ़ती है, उससे जल्दी बदनामी बढ़ती है। और आग से भी तेज़ बढ़ती है एक औरत की बदनामी।”
“क्या कहा गया?”
उस्ताद ने सिर नीचे झुकाया।
“कहा गया कि उस रात बंसी की बीवी गहने बचाने में लगी थी। कहा गया कि उसने निसार के बेटे को देखकर भी नहीं देखा। कहा गया कि… कि अगर वो एक पल को रुक जाती, तो लड़का बच जाता।”
मेरा हाथ अपने आप मुट्ठी में बंद हो गया।
“झूठ,” मैंने कहा।
“हाँ।” उस्ताद ने धीरे से सिर हिलाया। “पूरा झूठ। बंसी की बीवी उस रात बाहर ही थी — अपने बीमार भाई के घर गई थी। घर पर मौजूद ही नहीं थी। पर बात यह नहीं थी कि सच क्या था। बात यह थी कि सच किसके कान में पहले पहुँचा। और बात बंसी के कान तक पहुँची।”
“उसने निसार से पूछा?”
“नहीं।” उस्ताद ने कड़वी हँसी हँसी। “कभी नहीं पूछा। यही सबसे बड़ा झूठ है, अंकुश — की इंसान सबसे कम उस आदमी से पूछता है जिससे सबसे ज़्यादा प्रेम करता है। क्योंकि अगर उससे पूछ लिया और सच कड़वा निकला, तो दिल टूटेगा। तो आदमी पूछता ही नहीं। वो बाहर वालों की बात सुन लेता है, और अंदर से तड़पता रहता है।”
“और हाफ़िज़ बाबा ने?”
“निसार ने भी कुछ कहा था।” उस्ताद ने काँटा उठाया, उँगली से उसकी नोक जाँची। “गुस्से में, ज़ख्म के समय, बेटे को खोकर। उसने एक बार बंसी से कह दिया — ‘तेरे घर का हिसाब साफ़ नहीं है, तो मेरे बच्चे ने क्या कसूर किया था?’ बस यही एक वाक्य। पर जो वाक्य तब कहा जाए जब दिल खून रहा हो, वो सिर्फ़ वाक्य नहीं रह जाता। वो दीवार बन जाता है।”
“और दीवार खड़ी हो गई।”
“दीवार खड़ी हो गई।” उस्ताद ने काँटा मशीन के पास रख दिया। “दोनों ने सुलह की बात सोची होगी। पर हर बार जब सोचा होगा, तब लोगों की एक नई बात सुन ली होगी। शादी-ब्याह में अलग-अलग बुलाए गए, अलग-अलग बैठाए गए। वो शादी बंद हो गई, दोनों ने अपनी दुकान अलग कर ली — यही दो दुकानें बन गईं। दीवार बीच में ईंटों से नहीं, चुप्पी से बनी।”
“और इक्कीस साल पहले वो रात क्या थी?”
उस्ताद एक पल चुप रहे।
“मुझे पूरा नहीं पता,” उन्होंने कहा। “पर मैं इतना जानता हूँ कि उस रात किसी की बीवी बहुत बीमार थी।”
“किसकी?”
“यही तो… यही तो काग़ज़ और दुपट्टा वाली बात है।” उस्ताद ने दीवार पर हाथ रखा। “शटर पर चाबी किसने रखी, यही मुझे भी नहीं पता। पर उस रात कुछ हुआ था — दोनों के घर की कोई औरत बीमार पड़ी थी, किसी को दवा चाहिए थी, और दोनों ने एक-दूसरे की मदद नहीं की, क्योंकि दोनों यह मानकर बैठे थे कि दूसरा मेरी सुनेगा ही नहीं। फिर सुबह दोनों ने शटर पर पड़ी वो चाबी देखी — दोनों की चाबी, उलटी। एक-दूसरे के नाम। और दोनों ने सोचा कि दूसरे ने मदद देने के बजाय चाबी बदलने की कोशिश की है।”
“तो असल में किसी ने कुछ बदला ही नहीं था?”
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