The Mysterious Bell – Chapter 321
बंसी बाबा की चाबी के ऊपर, जहाँ लोहे पर खुरचने की जगह थी, वहाँ कोई पुराने औज़ार से कुछ लिखा हुआ था — बहुत छोटा, बहुत खुरदुरा, एक आदमी की हाथ से लिखी लकीर।
वहाँ लिखा था — हाफ़िज़।
मैंने हाफ़िज़ बाबा की चाबी देखी।
उस पर भी खुरदुरे अक्षर थे।
बंसी।
मैं एक पल के लिए हिल गया।
मैंने देखा, फिर हाफ़िज़ बाबा की तरफ़ देखा, फिर बंसी बाबा की तरफ़।
दोनों की उँगलियाँ चाबी पर सख़्त हो गई थीं।
"बाबा," मैंने धीरे से कहा, "आपकी जेब में जो चाबी है, वो आपकी नहीं है।"
बंसी बाबा ने चाबी पकड़ी रही।
"और हाफ़िज़ बाबा," मैंने कहा, "आपकी जेब में जो चाबी है, वो भी आपकी नहीं है।"
हाफ़िज़ बाबा ने होंठ खोले, पर कुछ नहीं कहा।
"आपकी चाबी बंसी बाबा की जेब में है," मैंने हाफ़िज़ बाबा से कहा। "और बंसी बाबा की चाबी आपकी जेब में। दोनों ने अपने-अपने धागे बाँध रखे हैं, पर चाबी दूसरे की है। ये आपने पचास साल पहले किया था क्या?"
दोनों के हाथ काँपने लगे।
मैंने देखा — बंसी बाबा की लाठी की ऊपर वाली उँगली काँप रही थी, जैसे हवा में कोई तार खींचा गया हो। हाफ़िज़ बाबा की तस्बीह उनकी हथेली से फिसलकर ज़मीन पर गिर गई और दाने-दाने में बिखर गई, और वो झुककर उसे उठाने की कोशिश भी नहीं कर पाए।
"इक्कीस साल," बंसी बाबा ने धीरे से कहा।
"क्या?"
"इक्कीस साल पहले," उन्होंने कहा, "उस रात दुकान के शटर पर एक चाबी लटकी थी। मुझे लगा मेरी है। मैंने उठाकर जेब में डाल दी। सुबह देखा, मेरी चाबी गायब थी।"
"और आपने किसी को नहीं बताया," मैंने कहा।
"किसको बताता?" उन्होंने कहा। "उससे बोलना बंद हो गया था।"
"मैंने भी उस रात चाबी उठाई थी," हाफ़िज़ बाबा ने कहा। उनकी आवाज़ सूखी थी, जैसे कोई पुरानी लकड़ी चटके। "मुझे लगा मेरी है। पर मेरी चाबी जेब में थी, ये तो…" उन्होंने चाबी देखा। "ये तो उसकी है।"
"आपने चाबी पर नाम खुरचा," मैंने कहा। "आपने खुद नहीं खुरचा, किसी और ने किया। किसी ने चाबी देखी और कहा — ये बंसी की है, फिर उस पर नाम खुरच दिया।"
हाफ़िज़ बाबा की आँखें भर आईं।
"मैंने खुरचने वाले से कहा था कि खुरच दे ताकि पता रहे कि चाबी किसकी है," उन्होंने कहा। "पर मैंने कभी उसे वापस नहीं दी।"
"क्यों?"
"क्योंकि वो दुकान का शटर खोलती थी," उन्होंने कहा। "और मुझे लगा कि अगर मैं चाबी लौटाने जाऊँगा तो मुझे बोलना पड़ेगा। और मुझे उससे बोलना नहीं था।"
मैंने देखा, मीरा का कैमरा अब भी चल रहा था।
मैंने मनोज की तरफ़ देखा।
"देखा, मनोज भाई?" मैंने कहा। "अब बताइए — अगर दोनों दुकानें एक मालिक के नाम पर आ गई हैं, तो किस मालिक ने इन दोनों की चाबियाँ बदल दीं? क्योंकि चाबी बदलने वाला कोई एक ही हो सकता है — जो दोनों शटर खोल सके।"
मनोज ने फीता जेब में रखा।
"मैंने कहा था ना, बेटा, ये मेरा काम नहीं है।"
"तो ये किसका काम है?"
वो मुस्कुराया, पर इस बार मुस्कुराहट थोड़ी देर लगी।
"ये इन दोनों का काम है," उसने कहा। "इक्कीस साल तक एक-दूसरे से नहीं बोले, अब रो रहे हैं।" उसने काग़ज़ समेटे। "मैं शाम पाँच बजे आऊँगा। मज़दूर लेकर।"
"दीवार गिराने?"
"दीवार गिराने।"
"दीवार किसकी है, ये पता चलने से पहले?"
मनोज मुस्कुराया और चल पड़ा।
"अंकुश भाई," उसने जाते हुए कहा, "अब दीवार की ज़मीन पर पहले से चूना लगा हुआ है। चूना दिख नहीं रहा, पर है।"
वो चला गया।
मैं वहीं खड़ा रहा।
मैंने दोनों चाबियों को हथेली पर रखा।
एक पर लाल धागा।
एक पर हरा धागा।
और दोनों पर एक-दूसरे के नाम।
टिंकू ने मेरी कोहनी पकड़ी।
"भैया, अब क्या करना है?"
मैंने घंटी को जेब में दबाया।
मैंने वो बात कही जो अंदर हो रही थी, और जो मैं किसी से नहीं कह रहा था।
"अब चाबी अदला-बदली करनी है," मैंने कहा। "बस अदला-बदली नहीं। अब चाबी देनी है। और शर्त सिर्फ़ एक है — जो देगा, वो अपनी दुकान का शटर खुद नहीं खोल पाएगा, जब तक दूसरा खोलने न आए।"
बंसी बाबा ने मेरी तरफ़ देखा।
"यानी हमें एक-दूसरे पर भरोसा करना पड़ेगा।"
"जी," मैंने कहा। "पचास साल बाद, इक्कीस साल बाद, ग्यारह मिनट बाद… जो भी हो। पर सिर्फ़ भरोसा करने से काम नहीं चलेगा। आपको एक सच बात कहनी पड़ेगी। ऐसी बात जो आज तक जेब में बंद थी।"
हाफ़िज़ बाबा हिले।
"कैसी बात?"
मैंने दोनों चाबियाँ उनकी तरफ़ बढ़ाईं।
"ये चाबियाँ आज दोनों की जेब से निकली हैं। इन्हें लौटाने के लिए ज़ुबान खुलनी पड़ेगी। और बाबा, अगर ज़ुबान नहीं खुलेगी, तो शाम पाँच बजे जब मज़दूर आएँगे, तब दीवार के साथ ये चाबियाँ भी गिरेंगी — और फिर किसी को पता नहीं चलेगा कि कौन किसका था।"
बंसी बाबा ने चाबी देखी।
फिर हाफ़िज़ बाबा ने।
और दोनों ने एक ही समय पर हाथ आगे बढ़ाया।
पर लिया नहीं।
शबनम आपा ने बीच में प्लेट रखी।
"पहले समोसा," उन्होंने कहा, "फिर चाबी। मेरे यहाँ ये नियम है — जो झगड़ा सुलह से खत्म हो, उसका पहला कौर गरम होना चाहिए।"
टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा।
"भैया, अब क्या होगा?"
मैंने दोनों बुज़ुर्गों को देखा, दोनों के हाथ देखे, और मुझे लगा कि घंटी जेब में धीरे से हिली, बिना आवाज़ के, जैसे कोई साँस भरकर रुक गया हो।
मैंने मुट्ठी खोली।
घंटी चुप थी, पर उसकी चुप्पी में इस बार कुछ और था — जैसे वो कह रही हो कि आज इस गली में एक दीवार गिरेगी, पर वो दीवार ईंट की नहीं होगी।
और मैं जानता था कि शाम बहुत दूर नहीं थी।
॥
मैंने चाबियाँ जेब में रखीं और शबनम आपा की तरफ़ देखा।
“आपा, समोसा ठंडा मत होने दीजिए। मैं पाँच मिनट में आता हूँ।”
“पाँच मिनट?” शबनम आपा ने आँखें तरेर दीं। “तू कहाँ जा रहा है बीच सुलह के?”
“उस्ताद के पास।”
“क्यों?”
“क्योंकि ये चाबियाँ इक्कीस साल पुरानी हैं,” मैंने कहा, “और मुझे अभी भी नहीं पता कि इक्कीस साल पहले उस रात इन दोनों ने शटर पर पड़ी चाबी उठाई क्यों थी। सिर्फ़ झगड़े से कोई चाबी नहीं उठाता, आपा। चाबी उठाने के लिए कुछ और होता है।”
शबनम आपा एक पल चुप रहीं।
फिर उन्होंने पीतल की थाली टिंकू के हाथ में पकड़ाई।
“देख, टिंकू,” उन्होंने कहा, “दोनों बाबा को यहीं बैठा रख। जो मैंने कहा — पहले समोसा, फिर चाबी। अगर ये उठे, तो मुझे बताना।”
“और अगर वो उठें?” टिंकू ने पूछा।
“तो उठने देना। बैठे-बैठे रोने से अच्छा है उठकर कुछ करें।”
मैं हँसा।
पर हँसी अंदर तक नहीं गई।
मैं पीपल के पीछे वाली गली से मुड़ा।
मुझे उस्ताद अली बक्श की दुकान तक जाना था, पीछे की गली से होकर, बिजलीघर से पहले वाला मोड़ — वो गली जहाँ उस्ताद की पुरानी दुकान थी, और जहाँ अब उनकी सिलाई मशीन चलती थी।
चलते-चलते मेरे हाथ जेब में चाबियों से टकरा रहे थे।
दो धातुएँ, दो धागे।
एक लाल, एक हरा।
और दोनों पर एक-दूसरे के नाम, खुरदुरे, जैसे किसी ने गुस्से में खुदे हों।
मैंने रास्ते में एक बार पीछे मुड़कर देखा।
बंसी बाबा अपनी लाठी के सहारे पीपल के तने के पास खड़े थे, और हाफ़िज़ बाबा दूसरी तरफ़, अपनी तस्बीह को उँगलियों पर घुमाते हुए।
दोनों के बीच में थाली रखी थी।
दोनों में से कोई भी पहले हाथ नहीं बढ़ा रहा था।
मुझे लगा जैसे दो आदमी किसी पुल पर खड़े हों, और पुल की दोनों तरफ़ से रस्सियाँ कटी हुई हों, और कोई उनसे कहे — “चलो, पहला कदम कोई एक उठाए।”
और दोनों सोच रहे हों कि पहला कदम उठाने वाला हारता है।
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