The Mysterious Bell319 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 319

7 min read November 5, 2026

किराने वाले काका ने अपनी लाठी बजाई। "मैंने तीन बजे देखा था," उन्होंने कहा। "जब मैं रात में उठकर चना खाने आया था, तब यहाँ कुछ नहीं था। और सुबह पाँच बजे मैंने आकर देखा — ये चिपका हुआ था।"

"मतलब तीन और पाँच के बीच।"

"हाँ।"

"जब पूरी गली सो रही थी।"

"हाँ।"

मैं उस दीवार से दो कदम पीछे हटा।

और तभी मेरे दिमाग़ में इलियास की आवाज़ बजी — "रणवीर का नक़्शा उसी दीवार से शुरू होता है जिसे ये गली अब तक अनदेखा कर रही है।"

वो जानता था।

वो जानता था कि आज सुबह इस दीवार पर कुछ चिपकेगा।

वो जानता था, इलियास।

और वो मुझे बताकर गया। सीधे बताकर नहीं — घुमाकर, पहेली की तरह, जैसे हमारा तंत्र बोलता है। जैसे उसने भी कभी यही भाषा सीखी हो। जैसे वो भी कभी इसी घंटी के साथ जिया हो।

मैंने जेब से घंटी निकाली। मेरे हाथ में काँप रही थी। उसने खुद को सँभाला — मैंने बजाया।

और घंटी ने, बहुत धीरे से, एक ही इंसान के लिए, कहा —

"दो डूबी हुई चीज़ें ऊपर आ गईं। एक इलियास, एक दीवार। पहली बात करेगी, दूसरी सबसे पहले चोट करेगी।"

मैंने घंटी को मुट्ठी में बंद किया।

मैंने पीछे मुड़कर देखा।

गली के मुँह पर सफ़ेद गाड़ी का धूल भरा निशान अभी भी सड़क पर था — पहिया की दो महीन लकीरें। और उन लकीरों के बीच, धूप में चमकती, कोई छोटी सी चीज़ पड़ी थी।

मैं गया। झुका। उठाया।

काग़ज़ का एक टुकड़ा था। बहुत छोटा। फटा हुआ। और उस पर सिर्फ़ दो शब्द लिखे थे, नीली स्याही में —

“अगली दीवार।”

बंसी बाबा अभी भी दीवार के सामने खड़े थे, लाठी हाथ में। हाफ़िज़ बाबा भी। दोनों के बीच अब कोई पुरानी दीवार नहीं थी — अब दोनों के बीच एक पीला काग़ज़ था। और पीला काग़ज़ किसी दीवार से कम नहीं होता।

मैंने हाफ़िज़ बाबा की तरफ़ देखा।

"आपने उस काग़ज़ को छुआ?"

"नहीं।"

"आपने उसे पढ़ा?"

"पढ़ा।"

"और आपने लाठी उठाई।"

"हाँ।"

"क्यों?"

हाफ़िज़ बाबा ने अपनी तस्बीह मुट्ठी में ली।

"क्योंकि मुझे लगा कि किसी ने मेरी दुकान छीन ली है," उन्होंने कहा। "और मैंने चालीस साल पहले एक बार ऐसा ही महसूस किया था। उस दिन भी लाठी उठी थी, और फिर पता चला कि मेरे अपने भाई ने मेरी दुकान बेचने की बात लिख दी थी। आज सुबह लाठी उठी तो पुराना ज़ख़्म खुल गया।"

बंसी बाबा ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी लाठी की नोक ज़मीन से टिकी थी।

"मुझे पता है मैं ग़लत कर रहा था," उन्होंने कहा। "पर जब काग़ज़ तेरी ज़मीन को ले जाए और तेरा नाम भी न पूछे, तो हाथ उठ जाता है।"

मैंने दोनों के बीच में खड़े होकर कहा — "काग़ज़ किसी की ज़मीन नहीं ले सकता, बाबा। काग़ज़ सिर्फ़ काग़ज़ होता है। ज़मीन तब जाती है जब हम आपस में लड़ पड़ें। और अभी हमने कर दिया, देखो — दो बुज़ुर्ग, दो लाठियाँ, एक दीवार और एक काग़ज़। रणवीर को इससे ज़्यादा और क्या चाहिए?"

दोनों चुप हो गए।

बंसी बाबा ने लाठी नीचे कर दी।

हाफ़िज़ बाबा ने अपनी तस्बीह अपनी जेब में डाल दी।

और मीरा ने तभी कैमरा चालू किया।

लाल बत्ती जली। और मैं जानता था कि अब वो कुछ देख रही है जो कल बहुत काम आएगा।

पर मैं उस पीले नोटिस से नज़र नहीं हटा पा रहा था।

आज की तारीख़।

आज।

और नीचे एक और लाइन थी, जो मैंने पहले नहीं पढ़ी थी, क्योंकि वो मोहर से ढकी हुई थी। मोहर के नीचे से सिर्फ़ आधे अक्षर निकल रहे थे।

"दोनों दुकानें एक मालिक के नाम पर आने के बाद, दीवार गिराने का काम आज ही शाम को शुरू होगा।"

मैंने अपनी मुट्ठी में घंटी दबाई।

"देखा?" मैंने फुसफुसाकर कहा। "इलियास ने कहा था — रणवीर का नक़्शा उसी दीवार से शुरू होता है। वो ये दीवार थी। और मैंने उसे पंद्रह साल से देखा, और आज पहली बार पढ़ा।"

घंटी चुप थी।

पर इस बार उसकी चुप्पी में कोई बात थी।

जैसे कोई कहे — अब समय नहीं है, अंकुश। अब देखने का।

मैंने पीछे देखा। उस्ताद की दुकान का शटर अब भी बंद था। सिलाई मशीन की आवाज़ आ रही थी। टिक-टिक। टिक-टिक। पर उस आवाज़ में अब कुछ और था — मुझे लगा जैसे उस मशीन के साथ कोई धीरे-धीरे कुछ गुनगुना रहा हो।

और मुझे समझ आया कि उस्ताद अभी भी मुझे देख रहे हैं, शटर के पीछे से, टाँके में उँगली रखे हुए, यह सोचते हुए कि अगला ताला किस दुकान पर लगेगा।

मैंने उस पीले नोटिस को दीवार से नहीं उतारा।

मैंने उसे लगा रहने दिया।

क्योंकि इस गली में जो काग़ज़ लगता है, वो देखा ज़रूरी है। और आज की तारीख़ वाला काग़ज़ तो सबसे ज़्यादा।

मैंने सानिया की तरफ़ देखा।

"गिनती कर," मैंने कहा। "आज इस गली में कितनी दीवारें काग़ज़ी होने वाली हैं?"

सानिया ने अपनी लाल कवर वाली कॉपी खोली।

और मैंने अपनी गली की दीवारों को देखना शुरू किया — पहली बार, असली में।

॥

"एक…"

सानिया ने पेंसिल कॉपी पर रखी।

"दो…"

"तीन…"

"चार…"

मैं उसके पीछे खड़ा था और वो गिनती कर रही थी, पर उसकी गिनती में रुक-रुक कर एक बात आ रही थी जो मेरे पेट में ठंडी सुई की तरह चुभ रही थी।

"पीपल के पीछे की गली — उस्ताद की दुकान और इलियास के घर के बीच की दीवार," उसने कहा। "यहाँ पर कोई नोटिस नहीं है।"

"अगली।"

"अस्पताल की पिछली दीवार। वहाँ पर काग़ज़ नहीं, एक लोहे का बोर्ड है।"

"अगली।"

सानिया ने पेंसिल चबाई।

"बंसी बाबा की किराने की दुकान और हाफ़िज़ बाबा की इत्र-चूड़ी की दुकान। इनके बीच की दीवार।" उसने काग़ज़ की तरफ़ देखा। "यही वो दीवार है, भैया जिस पर आज का पीला नोटिस लगा है।"

मैंने घंटी को जेब में दबाया और वहीं से दौड़ पड़ा। टिंकू मेरे पीछे-पीछे भागा, उसकी चप्पलें गली की मिट्टी पर चट-चट कर रही थीं।

मीरा कैमरा उठाए पीछे आ रही थी और शबनम आपा अपनी चिमटी हाथ में लिए गुमटी से बाहर निकल रही थीं, जैसे किसी को मारना हो।

और जैसे ही हम पीपल के पीछे वाली गली के मोड़ पर पहुँचे, मुझे आवाज़ सुनाई दी।

दो बूढ़े आवाज़ें।

दोनों एक-दूसरे पर चिल्ला रहे थे।

"तूने बेची!"

"मैंने नहीं बेची, तूने बेची!"

"मेरी दुकान की आधी ज़मीन तेरे नाम कब से हो गई, हाफ़िज़?"

"मेरी आधी दुकान तेरे नाम कब से लिखी है, बंसी? बता! बता ना!"

मैंने देखा।

बंसी बाबा — सफ़ेद कुर्ता, माथे पर चंदन, हाथ में लाठी — दुकान के बाहर खड़े थे और उनकी लाठी हवा में थी। उनके पीछे दालों की बोरियाँ थीं, जिन पर धूल की एक मोटी परत जमी थी, और एक बोरी का मुँह खुला था, जिसमें से थोड़ी दाल ज़मीन पर फैल गई थी।

हाफ़िज़ निसार अहमद — सफ़ेद टोपी, तस्बीह हाथ में — अपनी दुकान के दरवाज़े के सहारे खड़े थे। उनकी दुकान के शीशे में छोटी-छोटी शीशियाँ थीं, हर शीशी के ऊपर एक काग़ज़ का टुकड़ा चिपका था, और दरवाज़े पर तीन-चार चूड़ियाँ टँगी थीं, जो हवा में धीरे-धीरे घूम रही थीं।

और बीच में वो दीवार थी।

मैंने उसे पहले कभी इतना करीब से नहीं देखा था। पुरानी दीवार। ऊपर का पलस्तर फूल की तरह उखड़ रहा था, बीच में एक लंबी दरार थी जिसमें काई जमी थी, और नीचे की तरफ़ ईंटें ऐसी लगी थीं जैसे कोई बूढ़ा दाँत बचाकर हँस रहा हो।

उसी दीवार पर वो पीला काग़ज़ चिपका था।

और उसी दीवार के सामने एक आदमी खड़ा था।

दुबला, सफ़ेद कमीज़, पतली गर्दन, हाथ में पीली धातु का फीता और काग़ज़ों का एक छोटा बंडल। वो दीवार से फीता लगाकर नाप रहा था और साथ-साथ अपनी कलम से कुछ लिख रहा था, इत्मीनान से, जैसे कोई डॉक्टर नब्ज़ देख रहा हो।

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