The Mysterious Bell – Chapter 318
"तो तुम आओ ना।"
"मैं नहीं आऊँगा।"
"क्यों?"
"क्योंकि आज मैंने अपने भाई का नाम सुना," उसने कहा। "और मैं खुद को नहीं बता पा रहा कि मुझे गुस्सा आया या कुछ और आया। जब तक मैं खुद को नहीं बता पाता, मैं किसी और को नहीं बता सकता।"
वो खिड़की से पीछे हटा। फिर रुका। फिर आगे आया।
"एक बात सुन ले," उसने कहा। उसकी आवाज़ बदल गई थी — अब वो धीमी नहीं थी, अब उसमें कुछ था जो पचास साल से जमा हो रहा था और अब रिस रहा था।
"कहो।"
"रणवीर का नक़्शा उस दीवार से शुरू होता है," उसने कहा, "जिसे ये गली अब तक अनदेखा कर रही है। सब उसके नीचे से रोज़ गुज़रते हैं। कोई उसे देखता नहीं। मैं उसे देखता हूँ, क्योंकि मैं पचास साल से उसी दीवार के पास बैठा हूँ।"
"कौन सी दीवार?"
पर गाड़ी की खिड़की ऊपर जा रही थी।
"कौन सी दीवार?" मैंने ज़ोर से कहा।
शीशा पूरा बंद हो गया। गाड़ी हिली। धीरे-धीरे आगे बढ़ी। गली छोटी है, ड्राइवर सँभालकर चला। वो गली के मुँह पर मुड़ी और गायब हो गई।
धूल उड़ी। हल्की, सुनहरी। वो धीरे-धीरे बैठ गई।
उस्ताद अभी भी शटर के सहारे खड़े थे। उन्होंने गाड़ी जाते हुए देखी। फिर उनका हाथ शटर से हटा।
और उन्होंने धीरे से कहा, "इलियास।"
इस बार कोई सुनने वाला नहीं था।
इस बार वो सिर्फ़ खुद के लिए कह रहे थे।
मैं उनकी तरफ़ चला। पर पाँच कदम चलकर रुक गया, क्योंकि उन्होंने हाथ उठाकर मुझे रोक दिया। वो नहीं चाहते थे कि कोई उनके पास आए। वो चाहते थे कि कोई उन्हें वैसे ही देखे। जैसे वो हैं। बिना मदद, बिना झुकने, बिना टेक।
उन्होंने शटर उठाया। अंदर गए। शटर वापस नीचे आया। और फिर उस दुकान से एक आवाज़ आई — सिलाई मशीन की। पहली बार मैंने उस आवाज़ को तेज़ सुना। टिक-टिक। टिक-टिक। जैसे कोई अपना ही दिल जोड़ रहा हो।
मैं खड़ा रहा।
फिर मैंने अपनी जेब से घंटी निकाली। चुप थी। बिल्कुल चुप।
"कुछ बोल," मैंने कहा। "कुछ तो बोल।"
घंटी चुप।
"तूने कहा था आज उस्ताद बोलेंगे," मैंने फुसफुसाकर कहा। "उन्होंने बोला भी। सिर्फ़ एक नाम। और वो चला गया। ये क्या है?"
घंटी चुप।
मैंने उसे जेब में रखा। और उस वक़्त मुझे पहली बार लगा कि घंटी चुप इसलिए है कि वो भी इंतज़ार कर रही है। जैसे वो भी जानती है कि अगली बात उसकी नहीं, इंसानों की है।
तभी गली में खुरदुरी आवाज़ें आईं। पैरों की। बहुत तेज़।
मैं मुड़ा।
सानिया और रफ़ीक़ दौड़ते हुए आ रहे थे। सानिया के हाथ में उसकी लाल कवर वाली कॉपी थी और उसका चेहरा लाल था — पूरा लाल, जैसे दौड़ के साथ डर भी आ रहा हो। रफ़ीक़ उसके पीछे था, उसकी चप्पल फिसल रही थी और वो सँभल नहीं रहा था।
वो मेरे सामने रुके। सानिया ने घुटने पर हाथ रखा और साँस खींची।
"क्या हुआ?" मैंने पूछा।
"उस्ताद, उस्ताद," रफ़ीक़ ने कहा। वो जल्दी में था और उसकी साँस उसका साथ नहीं दे रही थी।
"साँस ले," मैंने कहा। "जल्दी में जवाब गलत हो जाता है।"
सानिया ने सीधा मुझे देखा। बच्चों की आँखें अजीब होती हैं — जब वो डरती हैं, तो उनकी आँखों में कोई बड़ा सवाल होता है, जो वो पूछ नहीं पाते।
"बंसी बाबा और हाफ़िज़ निसार अहमद," उसने कहा, "दोनों अपनी दुकानों के बीच खड़े हैं। दोनों ने लाठी उठा रखी है।"
मैं कुछ सेकंड चुप रहा।
"कौन सी दुकानें?"
"वही," सानिया ने कहा। "पीपल के पीछे वाली गली में। बंसी बाबा की पुरानी पीतल की दुकान और हाफ़िज़ बाबा की अत्तर की दुकान। दोनों के बीच में एक पुरानी दीवार है।"
मेरे पैर अपने आप हिले।
"दीवार," मैंने कहा।
"और उस दीवार पर," रफ़ीक़ ने कहा, अब साँस पकड़कर, "पीला नोटिस चिपका है।"
मैं दौड़ा।
गली में सुबह की धूप अब तेज़ हो रही थी। मैं पीपल के पीछे वाली गली में मुड़ा। वहाँ पाँच-छह लोग खड़े थे। शबनम आपा हाथ में चिमटी लिए, गुमटी से आई हुई और पसीने से चिपकी हुई। किराने वाले बूढ़े काका अपनी लाठी के सहारे खड़े थे। मीरा दूर, तिपाई पर कैमरा लगाए, पर कैमरा अभी बंद था, वो सिर्फ़ देख रही थी।
और बीच में — दो बुज़ुर्ग।
बंसी बाबा। सफ़ेद कुर्ता, माथे पर चंदन। एक हाथ में लाठी, दूसरा हवा में। उनकी आँखें छोटी हो गई थीं। वो काँप रहे थे — नहीं, काँप नहीं रहे थे, उनका शरीर काँप रहा था, पर उनकी पकड़ मज़बूत थी।
दूसरी तरफ़ हाफ़िज़ निसार अहमद। सफ़ेद टोपी, हाथ में तस्बीह — जो अब लाठी की तरह उठी हुई थी। उनके होंठ कुछ बड़बड़ा रहे थे।
दोनों के बीच — एक दीवार।
अब मैंने उस दीवार को देखा।
मैं यहाँ पंद्रह साल से आता-जाता हूँ। मैंने यह दीवार हज़ार बार देखी होगी। पर आज पहली बार मैंने उसे देखा।
वो पुरानी थी। बहुत पुरानी। दोनों दुकानों को जोड़ने वाली — नहीं, दोनों दुकानों को अलग करने वाली। उस पर पुराना प्लास्टर चढ़ा था, जो जगह-जगह उखड़ रहा था। नीचे से ईंटें दिख रही थीं। चूने की सफ़ेदी पीली पड़ गई थी, और काई ने उस पर अपनी हरी स्याही फैला दी थी।
उस दीवार पर किसी ने एक पीला काग़ज़ चिपका दिया था।
और वो काग़ज़ — मैंने दूर से देखा — नया था। बिल्कुल नया। सुबह की ओस में भी उसका रंग चटक था। उसका किनारा हवा में हिल रहा था, जैसे वो अभी-अभी चिपका हो और गोंद सूख रहा हो।
मैं दोनों बुज़ुर्गों के बीच में चला गया।
"बाबा," मैंने कहा। "लाठी नीचे करो।"
बंसी बाबा ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में वो चीज़ थी जो मैंने उस्ताद की आँखों में आज सुबह देखी थी — कोई पुरानी चीज़ जो अचानक हिल गई।
"ये मेरी दुकान है," उन्होंने कहा। आवाज़ टूटी हुई थी। "मैं इसे किसी को नहीं दूँगा। मैंने इसे अपने हाथों से बनाया है।"
"मुझे पता है, बाबा।"
"तू नहीं जानता," उन्होंने कहा। "तू नहीं जानता कि जब आदमी अपनी उम्र का सबसे ज़्यादा वक़्त किसी एक कमरे में बिता देता है, तो वो कमरा उसका घर नहीं रहता — वो उसका शरीर बन जाता है। और आज कोई मेरे शरीर के बीच से दीवार गिराना चाहता है।"
मैंने हाफ़िज़ बाबा की तरफ़ देखा।
"आपने लाठी क्यों उठाई?" मैंने पूछा।
"मैंने नहीं उठाई," उन्होंने कहा। "मेरा हाथ उठ गया।"
"मतलब?"
"मैं सुबह नमाज़ पढ़कर आया," उन्होंने कहा, आवाज़ में लरजती हुई सच्चाई। "और मैंने देखा कि मेरी दुकान के बोर्ड पर सफ़ेद काग़ज़ चिपका है। जिस पर लिखा है कि मेरी दुकान अब उसकी दुकान का हिस्सा है। उसकी दुकान का हिस्सा! चालीस साल से हम दोनों के बीच एक दीवार है, और आज कोई काग़ज़ कह रहा है कि दीवार नहीं है?"
"कौन सा काग़ज़?"
"दीवार पर वाला," उन्होंने कहा। "पीला है।"
मैंने अपना हाथ उस काग़ज़ पर रखा। पहले मैंने उसे सिर्फ़ देखा — संख्याएँ, लकीरें, मुहर।
फिर मैंने उसे पढ़ा।
नीचे दाईं तरफ़ — रणवीर भारद्वाज की नीली गोल मोहर। भारद्वाज कंस्ट्रक्शन।
और उस मोहर के ऊपर, साफ़ स्याही में, जो लिखा था, वो मेरे हाथ को काँपने पर मजबूर कर रहा था।
"दुकानें काग़ज़ी रूप से एक मानी जाएँगी। दीवार संयुक्त है। दोनों दुकानों की ज़मीन एक क्रम में दर्ज है। नई लेआउट के लिए ज़रूरी है कि दोनों दुकानें एक मालिक के नाम पर आएँ।"
और नीचे, तारीख़।
आज की तारीख़।
आज।
मैंने काग़ज़ को दोबारा पढ़ा। फिर तीसरी बार। हर बार मुझे वही मिला। मेरे पीछे शबनम आपा ने कुछ कहा, पर मैंने नहीं सुना।
"ये कब चिपका?" मैंने पूछा। मेरी आवाज़ अपनी नहीं लग रही थी।
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