The Mysterious Bell316 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 316

7 min read November 5, 2026

उस्ताद ने मेरी तरफ़ देखा। उनके चश्मे पर दोपहर की रोशनी पड़ रही थी, और उनकी आँखें फिर भी मुझे साफ़ दिख रही थीं।

फिर उन्होंने कहा, "तू मुझसे भी ज़्यादा ज़िद्दी है।"

"ये तो पापा भी कहते हैं," मैंने कहा।

वो हँसे — छोटी सी हँसी, अधूरी, जैसे कोई पुरानी दीवार से एक ईंट निकली हो।

मैं बाहर आया। दुबे अंकल मेरे पीछे आए। उन्होंने अपनी कॉपी बंद की और मेरी तरफ़ देखा।

"उसने मना कर दिया," उन्होंने कहा। "यह तो पता था।"

"हाँ," मैंने कहा।

"फिर?"

"फिर कुछ नहीं," मैंने कहा। "मैंने अपना काम किया।"

दुबे अंकल मुस्कुराए। फिर वो कुछ सोचकर बोले, "अंकुश, एक बात सोच-समझकर सुन।"

"कहिए।"

"आज सुबह थाने में जो काग़ज़ आया, उसमें एक और बात लिखी थी। लिखा था कि ताले के साथ एक आदमी आएगा — इलियास। और ताले को काग़ज़ी हिसाब से पूरा 'सही' करने के बाद, इलियास वो कुंडी मुहर लगाकर बंद करेगा। यानी कल तेरी दुकान का ताला खोलने और बंद करने — दोनों की चाबी इलियास के पास होगी।"

मैं रुक गया।

"मतलब," मैंने कहा, "कल मेरी दुकान उसके हाथ में होगी।"

"हाँ," दुबे अंकल ने कहा। "पर एक बात याद रखना — चाबी उसके पास होगी, पर घंटी तेरे पास है।"

मैंने अपनी जेब में हाथ डाला। घंटी वहीं थी। छोटी, ठंडी, सपाट।

"ठीक है," मैंने कहा। "कल सात बजे।"

"कल सात बजे," दुबे अंकल ने कहा, और थाने की तरफ़ चल दिए।

रात को मैं दुकान के पीछे वाले कमरे में बैठा था।

बल्ब गुनगुना रहा था — पुराना, हर दो मिनट में हल्का-सा झपकता हुआ। मैंने मेज़ पर मीरा का कैमरा रखा था। वो काम के बाद मेरे पास ही छोड़ गई थी — कह गई थी कि तू कल टिंकू को देना, उसे फोटो देखनी है। पर मैंने उसे दुकान पर नहीं दिया था। मैंने उसे अपने पास रख लिया था।

मैंने कैमरा खोला।

पिछली तस्वीर — जो सुनीता दीदी के क्वार्टर के बाहर खींची गई थी — स्क्रीन पर खुली।

मैंने उसे बड़ा किया।

सुनीता दीदी सामने खड़ी थीं, साड़ी का पल्लू संभाले, आँखों में वो डर जो सच बोलने वाले आदमी की आँखों में आता है।

और उनके पीछे, गली की दीवार से सटकर, एक आदमी खड़ा था। काली कमीज़। दुबला शरीर। ऊँचा कद। चेहरा आधा छाया में। उसका एक हाथ जेब में था, दूसरा हाथ शर्ट की कॉलर के पास।

मैंने और ज़ूम किया।

उसकी बाईं कलाई पर एक घड़ी थी। पुरानी, चमड़े के पट्टे वाली, धातु के चौकोर डिब्बे वाली। घड़ी का रंग थोड़ा धुँधला था — पीली रोशनी में भी साफ़ दिख रहा था कि वो पुरानी है।

मेरा हाथ रुक गया।

मैं उठा। मैंने बल्ब छोड़ा और अंधेरे कमरे में खड़ा रहा। फिर मैंने अपनी जेब से घंटी निकाली और उसे हिलाया। कुछ नहीं बोली।

मैंने उसे वापस जेब में रखा और सीधा उस्ताद की दुकान की तरफ़ देखा। उनकी दुकान पर बत्ती बुझ चुकी थी, पर खिड़की से हल्की-सी रोशनी दिख रही थी — कोई अंदर जाग रहा था।

मैंने अपना सामान समेटा। फिर मैंने एक बार कैमरे की स्क्रीन फिर खोली। उस आदमी की कलाई पर टिकी घड़ी को देखा।

और मुझे याद आया।

उस्ताद अली बक्श की मशीन के पास, दीवार पर एक पुरानी सफ़ेद-काली तस्वीर टँगी थी। पचास साल पुरानी। उसमें दो जवान लड़के खड़े थे — एक पतला, एक चौड़े चेहरे वाला। दोनों हँस रहे थे। और उन दोनों की बीच में, मेज़ पर, उस्ताद की मशीन रखी थी, और चौड़े चेहरे वाले लड़के की कलाई पर वही घड़ी बँधी थी। वही चौकोर डिब्बा, वही चमड़े का पट्टा।

वो घड़ी इलियास की थी।

मैंने कैमरा बंद किया और अपने घर की तरफ़ चल दिया। रास्ते में मेरे कदम तेज़ थे। पीपल के नीचे से गुज़रते वक़्त मुझे लगा कि किसी ने मेरा नाम पुकारा, पर कोई नहीं था। सिर्फ़ पत्ते थे, हवा में हिलते हुए।

घर पहुँचा। माँ सो रही थीं। पापा की चारपाई खाली थी — वो छत पर थे, या कहीं बाहर। काजल अपनी किताबों के ढेर के बीच सो रही थी, चश्मा पहने हुए, जैसे पढ़ते-पढ़ते सो गई हो।

मैं अपने कमरे में आया। औज़ारों का ट्रंक खोला। उसमें से मैंने एक छोटी टॉर्च निकाली और उसे साथ रख लिया। फिर बैठ गया।

रात भर मैं सो नहींया।

कभी मैं कैमरा खोलता, कभी बंद करता। कभी घंटी हिलाता। कभी जेब में रखता। कभी खिड़की से बाहर देखता — पीपल, चबूतरी, गुमटी — सब अंधेरे में डूबे हुए।

चार बजे मैंने अपनी आँखें मींच लीं। बस दो मिनट के लिए, ऐसा मुझे लगा।

और तभी —

घंटी बजी।

अपने आप।

मैंने उसे जेब से निकाला। वो मेरे हाथ में काँप रही थी, जैसे कोई उसे ज़ोर से हिला रहा हो। फिर बजना बंद हुआ, और उसकी आवाज़ आई — नरम, धीमी, पर साफ़।

"आज मैं नहीं बोलूँगी," उसने कहा। "आज उस्ताद बोलेंगे।"

मैं उठ बैठा।

"क्या मतलब?" मैंने पूछा।

घंटी चुप रही।

"उस्ताद नहीं आएँगे," मैंने कहा। "कल उन्होंने मना कर दिया था।"

"आज वो नहीं आएँगे," घंटी ने कहा। "आज वो बोलेंगे।"

"कहाँ?"

"जहाँ वो पचास साल से नहीं बोले।"

मैंने घंटी देखी। फिर मैंने उसे जेब में रखा और खिड़की के पास जाकर बाहर देखा।

सुबह पाँच बजे थी। आसमान हल्का हो रहा था — वो धुँधला, स्लेटी रंग जो सुबह से पहले आता है। गली में कोई नहीं था। पीपल की छाया लंबी पड़ रही थी।

मैं नीचे आया। दरवाज़ा खोला। चप्पल पहनी और दुकान की तरफ़ चला।

शटर उठाया। आवाज़ हुई — चरचराती, पुरानी, परिचित।

मैं अंदर गया। बत्ती जलाई। मेज़ पर औज़ार रखे थे। मैंने उन्हें छुआ, फिर छोड़ दिया।

फिर मैंने शटर के नीचे स्टूल रखा और बैठ गया।

छह बजे गली में पहली आवाज़ आई — मोहाने वाला नल। पानी की धार पत्थर के टैंक में गिरी। फिर किसी ने पेपर फेंका। चिड़िया बोलीं।

साढ़े छह बजे शबनम आपा ने गुमटी खोली और एक गिलास चाय लेकर मेरी तरफ़ आईं। उन्होंने मेरे सामने रख दी — बिना कुछ कहे। मैंने सिर हिलाया। वो चली गईं।

छह बजकर पचास मिनट पर पीपल के नीचे बच्चों की टोली इकट्ठी हो गई। सानिया, गुड्डू, रफ़ीक़, चिंटू। वो दूर खड़े थे — देख रहे थे, पर आगे नहीं आ रहे थे। जैसे उन्हें भी पता था कि आज कुछ और होने वाला है।

सात बजे कुछ नहीं हुआ।

सात बजकर दस मिनट — कुछ नहीं।

सात बजकर पंद्रह — मैंने अपनी घंटी निकाली। चुप।

फिर सात बजकर अठारह मिनट पर, दूर गली के मुँह से एक गाड़ी की आवाज़ आई।

सफ़ेद गाड़ी।

मैं स्टूल से उठा। मैं शटर के नीचे खड़ा हुआ।

गाड़ी गली में घुसी। धीरे-धीरे। गली छोटी है — ड्राइवर बहुत सँभालकर चला रहा था। गाड़ी मेरी दुकान से कुछ दूर रुकी।

दरवाज़ा खुला।

एक आदमी उतरा।

लंबा। दुबला। काली कमीज़। बाल छोटे, कुछ सफ़ेद। उम्र पैंसठ के आस-पास — चेहरे पर झुर्रियाँ, आँखों में एक अजीब सी शांति, जो बहुत सालों की चुप्पी से आती है। उसकी बाईं कलाई पर वो पुरानी घड़ी बँधी थी — वही चमड़े के पट्टे वाली, वही चौकोर डिब्बे वाली।

मैंने कदम आगे बढ़ाया।

उसने अपनी जेब से एक चाबी निकाली। फिर उसने मेरी तरफ़ देखा।

दूर, उस्ताद की दुकान का शटर आधा खुला था। उस्ताद वहाँ खड़े थे — बिना चश्मा, बिना टोपी। सिर्फ़ एक पुराने कुर्ते में, दरवाज़े के सहारे। वो देख रहे थे।

इलियास ने भी देखा। एक पल के लिए। फिर उसकी नज़र हट गई और वो मेरी तरफ़ आ गई।

वो मेरे सामने आकर रुका। बस एक कदम की दूरी पर। उसने चाबी मेरी तरफ़ बढ़ाई — नहीं, चाबी नहीं, चाबी हवा में लहराई और फिर वापस जेब में चली गई।

फिर उसने धीरे से कहा, इतनी धीरे कि सिर्फ़ मैं सुन सकूँ,

"मैं इलियास हूँ, और आज मैं अपने भाई का नाम नहीं सुनना चाहता।"

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