The Mysterious Bell315 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 315

7 min read November 5, 2026

"ये बताता है कि मैं अकेला आया था," उसने कहा। "अगली बार मैं अकेला नहीं आऊँगा।"

वो मुड़ा और चलने लगा।

"रुकिए," मैंने कहा।

वो रुका, पर पलटा नहीं।

"आपने मेरे पापा से काग़ज़ पढ़वाया था," मैंने कहा। "क्या आप उस वक़्त जानते थे कि वो क्या पढ़ रहे हैं?"

कुछ देर वो खड़ा रहा। गली में जो लोग दुकानों के अंदर थे, उनकी साँसें भी रुकी हुई लगीं।

"मुझे इस बात से फ़र्क़ नहीं पड़ता कि लोग क्या पढ़ते हैं," उसने कहा। "मुझे इससे फ़र्क़ पड़ता है कि लोग कहाँ अंगूठा लगाते हैं।"

फिर वो चला गया।

सफ़ेद गाड़ी गली के मुँह पर खड़ी थी। ड्राइवर ने दरवाज़ा खोला। रणवीर बैठा। गाड़ी चली।

और जैसे ही गाड़ी गली से बाहर निकली, शबनम आपा की गुमटी का दरवाज़ा खुला और उन्होंने बाहर आकर चिमटी हवा में पटक दी।

"अब आज कोई चाय नहीं पीएगा!" उन्होंने कहा। "आज चाय नहीं बिकेगी। सब मेरे यहाँ आओ — चाय मेरी तरफ़ से।"

गली ज़िंदा हो गई। एक-एक करके दुकानों के शटर आधे होकर पूरे खुले। लोग बाहर निकले। किसी ने कुछ नहीं कहा, पर सबके चेहरों पर वही बात थी — आज किसी ने आकर बुलाया था और किसी ने झाँका तक नहीं।

भोला भाई मेरी दुकान की तरफ़ आए। उनके पीछे दुबे अंकल थे — रिटायर सिपाही, नीली शर्ट, हाथ में एक मुड़ी हुई कॉपी।

"दस बजे वाली सभा नहीं हुई," दुबे अंकल ने कहा। "अब तेरे को मेरे साथ थाने चलना पड़ेगा।"

"क्यों?" मैंने पूछा।

"क्योंकि आज रात तेरी दुकान पर ताला लग सकता है," उन्होंने कहा। "और ताले के साथ एक आदमी आएगा। उसका नाम मुझे मालूम हो गया।"

मैंने उनकी तरफ़ देखा।

"इलियास," दुबे अंकल ने कहा।

मेरे हाथ से स्पैनर गिर गया।

भोला भाई ने मेरी तरफ़ देखा, फिर दुबे अंकल की तरफ़। उनके चेहरे पर वो भाव आया जो आदमी के चेहरे पर तब आता है जब वो किसी ऐसी चीज़ को जानता हो जिसे वो जानना नहीं चाहता था।

"इलियास," भोला भाई ने धीरे से दोहराया। "उस्ताद का भाई?"

"हाँ," दुबे अंकल ने कहा। "आज सुबह थाने में एक काग़ज़ आया — ताले की सूची। ताले के साथ जो आदमी आएगा, उसका नाम उसमें लिखा है। इलियास अली बक्श।"

कमरे में सन्नाटा छा गया।

मैं, दुबे अंकल और भोला भाई — तीनों जानते थे कि इलियास कौन है। वो आदमी जिसके पास दूसरी घंटी है। वो आदमी जो उस्ताद का छोटा भाई है। वो आदमी जिसे मैंने गुमटी पर रुकी घड़ी और लाल अंगूठे वाला पीला काग़ज़ लिए देखा था। वो आदमी जो रणवीर भारद्वाज के भवन से निकलता देखा गया था — सानिया ने कल रात की तस्वीर में उसे पहचान लिया था।

तीनों जानते थे।

"उस्ताद को पता है?" भोला भाई ने पूछा।

"नहीं," मैंने कहा। "मैंने उनसे यह बात नहीं कही।"

"तो अब कहनी पड़ेगी," दुबे अंकल ने कहा। "क्योंकि कल सुबह उनका भाई उनकी दुकान के सामने खड़ा होगा। और उस्ताद को उसके सामने जाना पड़ेगा।"

मैंने स्पैनर उठाया और अपने ट्रंक पर रख दिया। फिर मैंने अपनी जेब से घंटी निकाली। चुप थी।

"चलो," मैंने कहा। "उस्ताद की दुकान।"

उस्ताद की दुकान पर सिलाई मशीन टिक-टिक कर रही थी। वो कुर्सी पर बैठे थे और किसी पुराने कुर्ते में बटन लगा रहे थे। उनकी उँगलियाँ सुई पर सधी हुई थीं — ऐसी सधी हुई कि लगता था ये हाथ पचास साल से इसी काम में लगे हैं और बीच में कुछ नहीं हुआ।

हम तीनों अंदर आए। उन्होंने सिर उठाकर देखा और फिर सुई पर लौट गए।

"बटन लगाकर सुनता हूँ," उन्होंने कहा।

कोई नहीं बोला।

फिर उन्होंने सुई रख दी और चश्मा उतारकर मेज़ पर रखा।

"बोलो," उन्होंने कहा।

मैंने सीधी बात की। मेरे पास और कोई तरीक़ा नहीं था।

"उस्ताद," मैंने कहा, "इलियास शहर में ही है।"

कमरे में जो आवाज़ें थीं — मशीन की, गली की, दूर किसी रेडियो की — वो सब एक साथ बंद हो गईं। या मुझे ऐसा लगा।

"पीपल के पूरब वाली गली में रहता है," मैंने कहा। "कल रात मेरी दुकान पर जो पीली जीप आई थी, उसमें से उतरने वाला आदमी वही था। और अब वो रणवीर के लिए काम करता है — उसके भवन से निकलता देखा गया है। आज सात… मतलब कल सुबह जो ताले की चाबी लेकर आएगा, वो इलियास है।"

उस्ताद एक पल के लिए अपनी मशीन पर झुक गए। उनकी हथेली मशीन के पहिये पर टिकी रही। उन्होंने आँखें बंद कर लीं। मैंने सोचा कि वो कुछ कहेंगे, पर वो बस वैसे ही झुके रहे — जैसे कोई आदमी पचास साल पुरानी किसी चीज़ को अंदर से धकेल रहा हो और वो निकलने को तैयार न हो रही हो।

फिर वो सीधे हुए।

"मुझे पता था," उन्होंने कहा।

भोला भाई ने कुछ कहना चाहा, पर दुबे अंकल ने हाथ से रोका।

"मुझे पता था," उस्ताद ने दोहराया। "पता था कि वो शहर में है। दस साल पहले एक आदमी ने मुझे बताया था कि इलियास को नए बाज़ार में देखा गया है। मैंने उस आदमी को डाँट दिया। कहा कि तू झूठ बोलता है। फिर मैंने खुद से कह दिया कि वो शहर छोड़ गया।"

उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। उनके चश्मे के पीछे आँखें सूखी थीं — पर सूखी इस तरह कि उन्होंने खुद को सुखा रखा था, कई साल से।

"मैंने खुद को झूठ बोलकर बचाया," उन्होंने कहा। "क्योंकि सच यह था कि मैं उसके सामने जाने से डरता था। माँ की तस्वीर उसके ताले में बंद है, और मैंने कभी उस ताले के सामने खड़े होकर यह नहीं कहा कि भाई, तेरी गलती नहीं थी। सिर्फ़ मेरी ज़िद थी कि दुकान बट जाए।"

"दुकान बट जाए?" मैंने पूछा।

"उस वक़्त दुकान बड़ी थी," उस्ताद ने कहा। "दो हिस्से होने थे। इलियास कहता था कि दुकान एक रहेगी, पर मेरे नाम पर। मैं कहता था कि सब कुछ आधा-आधा। माँ की दवा के पैसे उसने घंटी से कमाए — मैंने उसे वही ज़िद जता दी। फिर माँ चली गई। तस्वीर ताले में बंद हो गई। पेटी बंद हो गई। और मैंने अपने भाई से बोलना बंद कर दिया।"

दुबे अंकल ने कॉपी खोली।

"उस्ताद," वो बोले, "मैं जानता हूँ यह कहना आसान नहीं है। पर कल सुबह तुम्हें उसके सामने खड़ा होना पड़ेगा। क्योंकि वो आएगा — चाबी लेकर, काग़ज़ लेकर, और शायद रणवीर का हुक्म लेकर। जब वो आएगा, तो वो सिर्फ़ चाबी वाला आदमी नहीं होगा। वो तेरा भाई होगा। और तेरे सामने खड़ा होगा।"

उस्ताद ने गर्दन हिलाई, जैसे कोई सिर्फ़ हामी भर रहा हो। फिर उन्होंने अपना चश्मा उठाया और पोंछा।

"मैं उसके सामने नहीं जाऊँगा," उन्होंने कहा।

"उस्ताद —" भोला भाई ने कहा।

"नहीं।"

"आप सुनिए तो —"

"मैं उसके सामने नहीं जाऊँगा," उस्ताद ने कहा। इस बार आवाज़ तेज़ थी। "पचास साल से मैंने खुद को यह कहकर बचाया कि वो शहर में नहीं है। अब जब वो है, तो मैं उसके सामने नहीं जाऊँगा। मुझे नहीं पता कि जब वो मेरी तरफ़ देखेगा तो मैं क्या कहूँगा। मुझे नहीं पता कि मेरी आवाज़ निकलेगी या नहीं। मुझे नहीं पता —"

उनकी आवाज़ टूटी। उन्होंने मुँह फेर लिया।

मैं खड़ा हुआ। मैंने उनका कंधा नहीं पकड़ा, क्योंकि मुझे पता था कि उन्हें छूने से वो और टूट जाएंगे। मैंने बस दुबे अंकल और भोला भाई की तरफ़ देखा और फिर उस्ताद की तरफ़।

"उस्ताद," मैंने कहा, "मैं आपसे कल कुछ नहीं कहूँगा।"

उन्होंने पलटकर देखा।

"मैं आपसे यह नहीं कहूँगा कि आपको आना चाहिए। किसी को भूलना नहीं चाहिए। किसी से सुलह करनी चाहिए। ये सब जो बड़े लोग कहते हैं, न। मैं कुछ नहीं कहूँगा।"

"तो तू क्या करेगा?" उन्होंने पूछा।

"मैं सुबह सात बजे अपनी दुकान खोलूँगा," मैंने कहा। "ताला लगेगा या नहीं, मुझे नहीं पता। आपका भाई आएगा या नहीं, मुझे नहीं पता। पर मैं वहाँ रहूँगा। और आप जब तैयार हों, खुद आ जाइए। नहीं आए, तो भी मैं कुछ नहीं कहूँगा।"

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