The Mysterious Bell – Chapter 306
मैं कुछ नहीं बोला।
वो बाहर निकले। गलियारे में उनके कदम वैसे ही सधे हुए थे, जैसे आते वक़्त थे।
मैं शुक्ला बाबू की तरफ़ मुड़ा। वो कुर्सी पर बैठे थे और उनका हाथ मेज़ पर काँप रहा था। पर पहले जैसा नहीं। पहले वो काँपते थे तो हाथ नीचे छिपा लेते थे। अब वो हाथ मेज़ पर रखे हुए थे, जैसे किसी को दिखाना चाहते हों कि देखो, काँप रहा है, और फिर भी है।
“शुक्ला बाबू,” मैंने कहा। “कल सुबह आप आएँगे?”
“आऊँगा,” उन्होंने कहा। “वो जो कह गए — काग़ज़ों की गलती। मैं उन्हें बताऊँगा कि गलती काग़ज़ की नहीं थी। हाथ की थी।”
दफ़्तार की सीढ़ियाँ उतरकर मैं नीचे आया। टिंकू बाहर बेंच पर बैठा था, घुटने पर पट्टी, हाथ में एक टूटा हुआ चश्मा पकड़े, जिसे उसने रास्ते में किसी बूढ़े का ठीक करने को लिया था। मुझे देखकर उसका चेहरा ज़िंदा हुआ।
“उस्ताद,” वो दौड़कर आया। “क्या हुआ? कुछ मिला?”
“मिला,” मैंने कहा। “कुछ नहीं मिला। दोनों एक साथ।”
वो समझा नहीं।
“बाद में समझाऊँगा,” मैंने कहा। “अभी तेरा पेट भरना ज़रूरी है, वरना तेरा दिमाग़ मेरे सवालों से पहले मेरे कामों पर सवाल पूछेगा।”
दफ़्तार के बाहर गली में धूप तेज़ हो गई थी। और सामने, पत्थर के पुल की तरफ़ मुड़ने वाली गली के मोड़ पर, हरी साड़ी में शबनम आपा खड़ी थीं। हाथ में काग़ज़ की पुड़िया। मुझे देखकर वो आगे आईं और सीधे मेरे हाथ में वो पुड़िया थमा दी।
“क्या है?” मैंने खोलते हुए पूछा।
“समोसा है,” उन्होंने कहा। “सुबह से कुछ खाया होगा तो बताओ।”
“आपा, आपने भेजा किसने कहा था इसे?”
“किसी ने नहीं भेजा। मैं इसे अपने हाथ से लाई हूँ। फ़र्क़ है दोनों में।”
मैंने पुड़िया खोली। समोसा गरम था। भाप निकल रही थी।
तभी सक्सेना बाहर आए। उनकी सफ़ेद गाड़ी गली के मुँह पर रुकी थी और ड्राइवर दरवाज़ा खोलकर खड़ा था। वो नीचे उतरे और सीधे उस तरफ़ बढ़े।
शबनम आपा ने उन्हें देखा।
और फिर उन्होंने अपने हाथ में रखा दूसरा समोसा निकाला, उनकी तरफ़ बढ़ाया, और बिल्कुल वैसे ही कहा जैसे मुझसे कहा था, “लो।”
सक्सेना रुक गए।
“मैंने समोसा नहीं माँगा,” उन्होंने कहा, और आवाज़ में पहली बार तेज़ी आई थी। बहुत हल्की। एक इंच जितनी।
शबनम आपा ने हाथ नहीं हटाया।
“मैंने भी लाइसेंस नहीं माँगा था,” उन्होंने कहा, “फिर भी आप ले आए।”
वहाँ पाँच सेकंड ऐसे बीते जैसे कोई रोड सूनी हो और सामने से ट्रक आ रहा हो।
मैंने समोसे का कौर मुँह में रखा और मैं जानता हूँ यह सुनने में बहुत आसान लगता है, पर सच में, मेरे हाथ में भी हल्की कँपकँपी थी।
सक्सेना ने मुस्कुराकर सिर हिलाया। फिर उन्होंने समोसा नहीं लिया, न उस पुड़िया को छुआ। वो गाड़ी की तरफ़ बढ़े।
“आपा,” मैंने धीरे से कहा, “आपने कड़वी बात कर दी।”
“कड़वी नहीं,” उन्होंने कहा, पुड़िया समेटते हुए। “जगह सही थी, वक़्त सही था। बात थोड़ी कड़वी निकली। अब जा, मेरा समोसा ठंडा हो रहा है।”
मैंने जेब में हाथ डालकर घंटी दबाई।
और घंटी ने कहा।
“अभी कुछ जोड़ने की जल्दी मत कर।”
बस इतना। फिर चुप।
मैं घंटी को हाथ में लेकर खड़ा रह गया। यह बात मुझे समझ नहीं आई। मैं हर बार उल्टा सोचता हूँ — कि तंत्र बोले तो कोई जोड़ आने वाला है। पर आज वो धीरे बोली, और वो भी ऐसे जैसे मना कर रही हो। जैसे कोई बड़ा बूढ़ा मेरे कंधे पर हाथ रखकर कहता है — बेटा, रुक जा।
मैंने वापस दफ़्तार की सीढ़ियों से ऊपर देखा। खिड़की पर शुक्ला बाबू खड़े थे। उन्होंने हाथ हिलाया। उनका हाथ अब भी काँप रहा था।
टिंकू को लेकर मैं गली की तरफ़ चला। रास्ते में वो बार-बार मेरी तरफ़ देखता रहा। फिर बोला, “उस्ताद, वो आदमी क्या काग़ज़ ले गया?”
“कुछ नहीं ले गया,” मैंने कहा। “मेरे पास जो था वो चला गया। उनके पास जो था वो पहले से था।”
फिर शाम हो गई।
और शाम होते-होते पूरी गली मेरी दुकान के बाहर इकट्ठी हो गई।
न कोई बुलावा हुआ, न कोई ढोल बजा। गली का पुराना नियम है — जब किसी के घर पर उल्लू बैठता है तो चुप्पी रहती है, और जब किसी के दरवाज़े पर ताला आने वाला होता है तो पूरी गली को पता चल जाता है, बहुत पहले।
पीपल के नीचे चबूतरी पर बंसी बाबा और रहमत बाबा बैठे थे। उस्ताद अली बक्श अपनी दुकान के बाहर कुर्सी निकालकर बैठे थे, और उनका मोटा चश्मा उनकी नाक पर फिसला हुआ था। शबनम आपा गुमटी की तरफ़ जाने की जगह मेरी दुकान के सामने खड़ी थीं, हाथ में चिमटी, जैसे कुछ बचा रखा हो। भोला भाई दुकान का शटर आधा गिराकर खड़े थे। दुबे अंकल अपनी कुर्सी उठाकर वहीं ले आए थे, जो उनका नियम नहीं है। वो कुर्सी थाने के बाहर रहती है। पर आज वो मेरी दुकान के सामने रखी थी और वो उस पर बैठे थे, और उनकी नीली शर्ट की आस्तीन हवा में हिल रही थी।
बच्चे किनारे पर खड़े थे। सानिया के हाथ में उसकी लाल कवर कॉपी थी। रफ़ीक़ और गुड्डू पत्थर की चबूतरी के पीछे बैठे थे। चिंटू घुटने पकड़कर बैठा था।
मैंने दुकान का शटर पूरा उठाया। पीछे वाले कमरे से एक अधूरी चाय की केतली और कुछ गिलास ले आया। घंटी मेरी जेब में थी।
“बैठिए,” मैंने कहा। “सब खड़े क्यों हैं? यह दुकान है, अदालत नहीं।”
कोई हँसा नहीं। एक आधा हँसा।
फिर शबनम आपा ने कहा, “अंकुश, सच बता। कल सुबह ताला आने वाला है?”
“आने वाला है,” मैंने कहा। “यह छुपाने की बात नहीं है।”
गली में एक लंबी साँस चली। किसी ने साँस छोड़ी, किसी ने पकड़ी।
और फिर वो बात आई जो मुझे पता थी कि आएगी, और जिसे सुनने के लिए मैंने खुद को तैयार नहीं किया था।
किराने की दुकान वाले बूढ़े काका ने कहा। अपनी जगह से, बेंच से। उनकी आवाज़ धीमी थी, थकी हुई।
“बेटा, तू एक बार जाकर उनसे माफ़ी माँग ले।”
मैं चुप हो गया।
“बात छोटी नहीं है,” काका ने कहा। “मैंने तेरे पापा को देखा है। जब उन्होंने अंगूठा लगाया था, उसके बाद वो तीन महीने बोले नहीं। तेरी माँ अस्पताल में थी, तेरी बहन छोटी थी। तू तब छोटा था। अब तू बड़ा है, इसलिए तुझे लगता है कि तू सब सह सकता है। पर सहना और लड़ना दोनों अलग चीज़ें हैं। जो सह लेता है, वो अक्सर बच नहीं पाता। और तेरे पास समय नहीं है, बेटा। एक रात है।”
कोई नहीं बोला। गली में बस पंखे की आवाज़ आ रही थी, भोला भाई की दुकान से, जो वहाँ लगा था और हवा में धीरे-धीरे घूम रहा था।
मैंने उसकी बात का जवाब देने से पहले टिंकू की तरफ़ देखा।
और मेरा दिल बैठ गया।
टिंकू का चेहरा उतर गया था।
वो कुछ नहीं बोला। पर मैं जानता हूँ वो चेहरा। मैंने वो चेहरा कई बार देखा है — तब भी देखा था जब उसकी माँ उसे गली में डाँटती थी, तब भी जब उसने अपनी पिछली क्लास का नाम किसी को नहीं बताया। वो चेहरा ऐसा होता है जैसे किसी ने उसके हाथ से कोई चीज़ नहीं छीनी हो, बल्कि उस चीज़ को उसने खुद बनाया हो और अब पता चले कि वो चीज़ किसी काम की नहीं थी।
वो कुछ सोच रहा था। और मैंने उसकी आँखों में देखकर समझ लिया कि वो खुद से पूछ रहा है — क्या उस्ताद माफ़ी माँग लेंगे? और अगर माँग लेंगे तो बाकी सब क्या रह जाएगा? वो अपनी दुकान पर बैठे इंसान को देख रहा था, और उसे वो अभी से छोटा लगने लगा था।
मैंने वो पल नहीं जाने दिया।
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