The Mysterious Bell307 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 307

7 min read November 5, 2026

“काका,” मैंने कहा, और मेरी आवाज़ अपने ही कानों में थोड़ी अजनबी लगी, “माफ़ी माँगने में कोई बुराई नहीं है। मैं माँग सकता हूँ, अगर मैंने कुछ बिगाड़ा हो। मैंने नहीं बिगाड़ा। मेरे पापा ने अंगूठा लगाया और उसके लिए वो पच्चीस साल से चुप हैं। मेरे दादा ने वो दुकान खड़ी की और उसके काग़ज़ में उनका नाम मिटा दिया गया। माँगना तो आसान है, काका। पर अगर आज मैं माफ़ी माँग लूँ, तो कल सुबह उस दुकान पर ताला नहीं लगेगा, और उसी दुकान के बगल में उन्नीस नंबर की दुकान है जिसमें सीमेंट के बोरे हैं और फावड़ा है। फिर उसके बाद क्या? फिर वो शबनम आपा की गुमटी देखेंगे। फिर अस्पताल। फिर स्कूल। इस देश में माफ़ी माँगने वाले हर आदमी के पीछे एक और काग़ज़ तैयार रहता है।”

मैंने रुककर सबको देखा। काका ने सिर नीचे कर लिया था। शबनम आपा ने चिमटी मेज़ पर रख दी।

“और एक बात,” मैंने कहा। “मेरे पास अभी एक ही दुकान नहीं है, काका। मेरे पास टिंकू है। यह बारह साल का है। इसने आज सुबह किसी का चश्मा ठीक किया, इसका नाम किसी काग़ज़ में नहीं है। अगर मैं आज झुक जाऊँगा, तो यह सीखेगा कि झुकना ही तरीक़ा है। और मुझे यह नहीं सिखाना। मुझे यह सिखाना है कि औज़ार से काम होता है। किसी की मेहरबानी से नहीं।”

टिंकू ने अपनी नज़र उठाई।

और फिर मुझे लगा कि कमरे में हवा वापस आ गई।

उस्ताद अली बक्श ने अपना मोटा चश्मा ठीक किया, कान पर रखी पेंसिल को छुआ, और बस इतना कहा, “हाँ।”

बंसी बाबा ने चबूतरी पर अपनी लाठी टिकाई। रहमत बाबा ने सिर हिलाया।

शबनम आपा ने सबसे आख़िर में कहा, “अगर अंकुश माफ़ी माँगता, तो मैं उसका सारा चाय का हिसाब माफ़ कर देती। पर मैं यह नहीं चाहती थी कि वो इतना अच्छा ग्राहक बने।”

कुछ लोग हँसे। पहली बार। हँसी छोटी थी, डरी हुई, पर थी।

मैं चाय की केतली उठाने ही वाला था कि गली के मुँह पर रोशनी आई।

गाड़ी की लाइट।

सब मुड़े।

सफ़ेद गाड़ी। उसने गली में अंदर आना नहीं चुना। वो मुँह पर ही रुकी। शीशा नीचे आया।

और सक्सेना की आवाज़ आई, बिल्कुल उसी मिठास में, जैसे किसी सभा में माइक पर बोल रहे हों।

“बेटा।”

मैं दुकान के बाहर आया। मेरे पीछे कोई खड़ा हो गया। शायद दुबे अंकल। शायद टिंकू। मैंने पीछे मुड़कर देखा नहीं।

“बोलिए,” मैंने कहा।

“सुन लो,” उन्होंने कहा। “कल सुबह के वक़्त एक औरत भी आएगी। वो औरत जो पाँच साल से पीला लिफ़ाफ़ा रखे हुए है। उस लिफ़ाफ़े में जो काग़ज़ है, उस पर तुम्हारा नाम भी है।”

मैं साँस नहीं ले रहा था।

“और बेटा,” उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ में वो मिठास अब भी थी, “उसके हाथ में तुम्हारा नाम होगा, यह सच है। पर यह भी सच है कि उस दिन से लेकर आज तक उस औरत को कोई नहीं पूछता। वो अकेली है। तुम्हारे पास लोग हैं। उसके पास सिर्फ़ एक लिफ़ाफ़ा है। सोच लो, तुम्हें गली चाहिए या ऐसे लोग जो कल तुम्हें छोड़कर अपने घर चले जाएँगे।”

शीशा ऊपर आया।

गाड़ी चली गई।

मैं वहीं खड़ा रहा।

और मेरी जेब में घंटी एक बार बजी। बहुत धीरे।

और उसने कुछ नहीं कहा। सिर्फ़ बजी।

मैंने पीछे मुड़कर देखा। गली मेरे पीछे खड़ी थी, हर उम्र, हर ज़ुबान, हर टूटा हुआ आदमी। और सबसे आगे टिंकू था, जिसके हाथ में अब भी वो टूटा चश्मा था।

मैंने उसकी तरफ़ देखा और बोला, “जल्दी कर। कल सुबह से पहले यह चश्मा गली में लौटना चाहिए।”

वो मुस्कुराया।

और मैं अंदर गया, पुराना रजिस्टर उठाया, और उस पहले खाली पन्ने को देखा जिस पर अभी तक कोई नाम नहीं था।

॥

पीछे वाले कमरे में लालटेन जल रही थी। उसकी लौ पीली थी और थोड़ी काँपती हुई, जैसे कोई बूढ़ा आदमी हाथ में दीया लेकर धीरे-धीरे चल रहा हो। ऊपर का पुराना बल्ब आज किसी ने नहीं छेड़ा, वो भी बस गुनगुनाता रहा, जैसे बातों में दखल न देना चाहता हो।

मैंने पुराना रजिस्टर खोला। वो पन्ना, जिस पर अभी तक कोई नाम नहीं लिखा था। काग़ज़ पीला पड़ गया था, किनारे मुड़े हुए थे, और बीच में पेंसिल से एक पतली लकीर खिंची थी। किसी ने लिखना शुरू किया होगा, फिर सोचकर रख दिया होगा। मैं उसे देखता रहा और मुझे लगा कि यह खाली पन्ना मेरी ही तरह है। ऊपर से साफ़, अंदर से डरी हुई लकीर।

फ़र्श पर लोग बैठे थे। दुबे अंकल चारपाई के किनारे, नीली शर्ट में, घुटनों पर हाथ रखे। शबनम आपा दरवाज़े के पास, दीवार से टिकी हुई, चिमटी उनके हाथ में नहीं थी, वो आज मेज़ पर रखी थी। भोला भाई कोने में बैठे थे और अपने ही रूमाल को बार-बार मोड़ रहे थे। टिंकू मेरे पैर के पास बैठा था, उसके हाथ में अब भी वो टूटा चश्मा था, जिसे उसने ठीक भी नहीं किया था और छोड़ा भी नहीं था।

दरवाज़े की आड़ में सानिया खड़ी थी। उसके पीछे गुड्डू, रफ़ीक़ और चिंटू, तीनों बरामदे में चुपचाप बैठे थे। आज किसी ने एक भी सवाल नहीं पूछा। यही सबसे डरावनी बात थी। जिस गली में बच्चे भी चुप हो जाएँ, समझ लो कि हवा भी कुछ सोच रही है।

मैंने सामने रखी फाइलें बंद कीं। पीली जिल्द वाली फाइल, शुक्ला बाबू का दिया काग़ज़, सनी का आधा काग़ज़, रज्जो बाई का बैग, सब एक-एक करके ऊपर-नीचे रख दिए। फिर उनके ऊपर रजिस्टर रखा और रजिस्टर के ऊपर अपनी हथेली।

“आज रात काग़ज़ नहीं बोलेंगे,” मैंने कहा। “आज रात लोग बोलेंगे।”

कोई नहीं बोला।

मैंने चारों तरफ़ देखा। शबनम आपा ने आँखें दूसरी तरफ़ कर लीं। भोला भाई ने रूमाल को फिर मोड़ा। दुबे अंकल ने अपनी घड़ी की तरफ़ देखा, जो उनकी कलाई पर नहीं थी।

“अच्छा,” मैंने कहा। “कोई नहीं बोलेगा तो मैं सो जाऊँगा। और सुबह सात बजे कोई मुझे उठाने आएगा, तो मैं कह दूँगा कि जो लोग रात में चुप थे, वो सुबह खुद अपना ताला खोलें।”

टिंकू ने हल्का-सा सिर उठाया।

“उस्ताद,” वो धीरे से बोला, “आप मज़ाक कर रहे हो या डर रहे हो?”

“दोनों,” मैंने कहा। “यही तो मेरी सबसे बड़ी कला है।”

तभी बाहर बरामदे में लाठी की आवाज़ आई। ठक। ठक। ठक। धीमी, पर सीधी ज़मीन पर टिकती हुई, जैसे कोई हर कदम सोचकर रख रहा हो।

सबने दरवाज़े की तरफ़ देखा।

उस्ताद अली बक़्श अंदर आए। उनका मोटा चश्मा आज कान पर टेप से बँधा नहीं था, वो सीधा टिका था। सफ़ेद दाढ़ी लालटेन की रोशनी में और भी सफ़ेद लग रही थी। उन्होंने लाठी दीवार के साथ टिकाई और मेरे सामने वाली चारपाई पर बैठ गए। बैठने में उन्हें थोड़ी देर लगी, जैसे घुटने आज कुछ ज़्यादा ही वज़न उठा रहे हों।

“टिंकू,” उन्होंने कहा, आवाज़ सूखी थी, “ज़रा पानी।”

टिंकू उठकर गया। स्टील का गिलास भरकर लाया। उस्ताद ने दो घूँट पिए, गिलास अपने घुटने के पास रख दिया और फिर मेरी तरफ़ देखा।

“अंकुश,” उन्होंने कहा, “अब मुझसे ज़्यादा देर नहीं होगी।”

मेरे हाथ से रजिस्टर अलग रखते वक़्त उँगली फिसल गई। काग़ज़ चरमराया।

“क्या बोल रहे हो, उस्ताद,” मैंने हँसने की कोशिश की। “आप तो मेरे से भी ज़्यादा ज़िंदा हो। पचास साल से यही दुकान, यही मशीन, यही चश्मा। अब कहाँ जाओगे?”

“मशीन ज़िंदा है,” उन्होंने कहा। “मैं नहीं।”

शबनम आपा ने कुछ कहना चाहा। उस्ताद ने हाथ उठाकर रोक दिया। वो हाथ हवा में एक पल रुका, फिर मेरी तरफ़ बढ़ गया।

“घंटी दे।”

मैं एक पल रुका।

“उस्ताद, आप जानते हो…”

“जानता हूँ,” उन्होंने कहा। “सिर्फ़ तेरी आवाज़ पहचानती है। मुझे पता है। फिर भी दे।”

मैंने जेब से घंटी निकाली। पीतल, ठंडा, फूल खुदा हुआ। मैंने उनकी हथेली पर रख दी।

उस्ताद ने उसे दोनों हाथों में लिया। उलटा-पुलटा। अँगूठे से फूल को सहलाया। फिर हिलाया। एक बार हल्का, एक बार ज़ोर से।

कुछ नहीं हुआ।

न आवाज़ आई, न बजी, न कोई बात। बस पीतल, और एक बूढ़े आदमी की हथेली।

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