The Mysterious Bell304 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 304

7 min read November 5, 2026

“उन बत्तीस आदमियों के सामने नहीं,” उन्होंने कहा। “मैं उनके सामने नहीं…”

“नहीं,” मैंने कहा। “गली के लोगों के सामने। चबूतरी पर। जहाँ मैंने आपको पहली बार देखा था।”

वो कुछ देर मुझे देखते रहे। फिर उन्होंने मेज़ पर अपनी उँगली से एक लकीर खींची, जैसे मन में कोई हिसाब कर रहे हों।

“तुम्हें पता है,” उन्होंने कहा, “मैं इतने साल इन काग़ज़ों के बीच बैठा रहा, पर मैंने कभी यह नहीं सोचा कि मेरी गवाही किसी काम आएगी।”

“अब आएगी।”

“क्यों?”

मैंने अपनी जेब से घंटी निकालकर मेज़ पर रखी। वो बजी नहीं। बस पड़ी रही, और उसका पीतल पीले बल्ब की रोशनी में एक छोटा सा सूरज लग रहा था।

“क्योंकि अब सिर्फ़ काग़ज़ नहीं है,” मैंने कहा। “अब आपका हाथ है। और हाथ से लिखी बात काग़ज़ से बड़ी होती है।”

शुक्ला बाबू ने घंटी की तरफ़ देखा।

“यह क्या है?”

“यह मेरी साइकिल की घंटी है,” मैंने कहा। “और सच कहूँ तो यह मेरी नहीं है। यह मेरे दादा की है। आपके रजिस्टर वाले दादा की।”

वो एक पल चुप रहे।

“अच्छा,” उन्होंने धीरे से कहा। “तो यह वही घर है।”

“कौन सा घर?”

पर वो कुछ नहीं बोले। उन्होंने उठकर अपनी अलमारी खोली और उसमें से एक काग़ज़ निकाला — सादा, बिना लिखा, बिना मोहर।

“मैं लिखूँगा,” उन्होंने कहा। “मगर अंकुश, एक बात मान लो।”

“कहिए।”

“अगर कल मैं बोलना भूल जाऊँ,” उन्होंने कहा, “अगर कल मैं डर जाऊँ और काग़ज़ फाड़ दूँ, तो तुम मुझे बूढ़ा नहीं कहना। मुझे कायर कहना। कायर कहना, पर सच कहना।”

मैंने उन्हें देखा। उनके सफ़ेद कुर्ते की जेब फटी हुई थी और उनके चश्मे का एक काँटा टेप से बँधा था। इस आदमी ने बारह दुकानें एक रात में मिटा दी थीं। और यही आदमी अब मेरे सामने बैठा था, अपने ही हाथ से डर रहा था।

“नहीं,” मैंने कहा। “मैं आपको कायर नहीं कहूँगा।”

“क्यों?”

“क्योंकि मैंने भी एक बार अपने पापा से बोलना बंद कर दिया था,” मैंने कहा। “और उस वक़्त मैं भी डरा हुआ था। डर को कायर कहना आसान होता है, पर डर के पीछे जो आदमी होता है, वो अक्सर सिर्फ़ थका हुआ होता है।”

शुक्ला बाबू ने कुछ नहीं कहा। उन्होंने बस काग़ज़ को सीधा किया और अपनी कलम उठाई। उनकी उँगलियाँ स्याही के ऊपर काँप रही थीं।

और उसी वक़्त मेरी जेब में घंटी बजी।

धीरे। एक बार। किसी ने बाहर से उँगली से छुआ हो जैसे।

मैंने घंटी हाथ में ली और मेरे कान में आवाज़ आई।

“हाथ काँपे तो अक्षर टेढ़ा होता है। अक्षर टेढ़ा हो तो सच सीधा रहता है।”

मैं बोल नहीं सका। मैंने बस घंटी को मुट्ठी में दबा लिया।

“अंकुश?”

“कुछ नहीं,” मैंने कहा। “काग़ज़ रखिए, कलम रखिए। आप लिखिए। मैं बाहर हूँ। टिंकू नीचे अकेला है, वो सोच रहा होगा कि मैं डर के मारे भाग गया।”

मैं उठा। फिर रुका। मैंने मेज़ पर रखी उस फोटो को देखा।

“शुक्ला बाबू,” मैंने कहा।

“हाँ।”

“आपके बेटे का नाम क्या है?”

वो एक पल चुप रहे, जैसे किसी ने उनसे बहुत बड़ी चीज़ माँग ली हो। फिर उन्होंने कहा, “अमित।”

“अमित को मैं आपके साथ लाऊँगा,” मैंने कहा।

“वो नहीं आएगा।”

“तो मैं उसके दरवाज़े पर खड़ा रहूँगा,” मैंने कहा। “और आप जानते हैं, मैं खड़े रहना जानता हूँ। मेरी पूरी ज़िंदगी उसी में गई है।”

मैंने फाइल उठाई। पर जैसे ही मैंने दरवाज़े की तरफ़ कदम बढ़ाया, बाहर गलियारे से एक आवाज़ आई।

गाड़ी का दरवाज़ा बंद होने की आवाज़।

वो आवाज़ मुझे पहचानी थी। इस शहर में गाड़ियाँ बहुत होती हैं, पर हर गाड़ी का दरवाज़ा अलग आवाज़ करता है। बड़ी सफ़ेद गाड़ी का दरवाज़ा लकड़ी से ज़्यादा धातु जैसा सुनाई देता है। गहरा। जैसे कोई पीतल का ढक्कन बंद हो।

शुक्ला बाबू ने भी सुना। उनका हाथ कलम पर जम गया।

“यह कौन है?” मैंने धीरे से पूछा।

“नहीं पता,” उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ में वो डर लौट आया जो अभी-अभी टूटा था।

हम दोनों सुनने लगे। गलियारे में किसी के जूतों की आवाज़ आई। बहुत शांत कदम। कोई फ़ौजी नहीं जो कदम ऊँचा करके चले। कोई मज़दूर नहीं जो एड़ी घसीटे। ऐसे कदम थे जो फर्श पर बोझ डालने से बचने के लिए सधे हुए थे।

और फिर दरवाज़े पर खटखटाहट हुई।

तीन बार। नरम। जैसे कोई डॉक्टर कमरे में आने से पहले खटखटाता है।

और फिर मीठी सी आवाज़ आई — इतनी मीठी कि जैसे किसी ने शहद की उँगली से दरवाज़ा छुआ हो।

“बाबू जी, किस काग़ज़ पर हाथ रखा है?”

शुक्ला बाबू का चेहरा सफ़ेद पड़ गया। उन्होंने काग़ज़ की तरफ़ देखा जिस पर अभी कुछ लिखा नहीं था, फिर मेरी तरफ़।

मैंने एक कदम आगे बढ़कर अपना कंधा दरवाज़े की तरफ़ किया।

मुझे उस आवाज़ की आदत थी। मीठी आवाज़ वालों से डरना नहीं होता। डरना तब होता है जब मीठी आवाज़ आदमी का नाम याद रखे और तुम्हारे हाथ नहीं।

दरवाज़ा खुला।

और सफ़ेद कुर्ते की बाँह दिखी — इस्त्री किया हुआ, कहीं एक भी सिलवट नहीं। और उस बाँह के नीचे हाथ में एक फाइल थी, जिसके किनारे सोने के रंग जैसे चमक रहे थे।

दरवाज़े के बाहर जो खड़ा था, उसने मुझे देखा। फिर शुक्ला बाबू को देखा।

और वो मुस्कुराया।

“अरे,” उसने कहा। “बेटा, तुम भी यहाँ हो?”

“हूँ,” मैंने कहा। “काग़ज़ बाँटने आया हूँ। अंगूठे नहीं। सिर्फ़ बातें।”

उसकी मुस्कान एक इंच भी नहीं हिली।

और मेरे पीछे शुक्ला बाबू की कुर्सी पीछे सरकने की आवाज़ आई।

॥

दरवाज़े के बाहर जो खड़ा था, उसने मुझे देखा। फिर शुक्ला बाबू को देखा।

और मुस्कुराया।

“अरे,” उसने कहा। “बेटा, तुम भी यहाँ हो?”

सफ़ेद कुर्ता। इस्त्री किया हुआ। आस्तीन की कलाई पर एक भी सिलवट नहीं, जैसे कुर्ता पहनने से पहले ही सीधा होकर पैदा हुआ हो। हाथ में फाइल, जिसके किनारे सोने के रंग की पतली लकीर की तरह चमक रहे थे। और चेहरे पर वो मुस्कान, जो आपकी बात को भी अपनी बात बना लेती है।

चंद्रेश सक्सेना।

मैंने उसे पहले भी देखा था। वो दिन याद है जब वो मेरी दुकान पर आया था, फाइल लेकर, और बोला था कि तारीख़ आगे नहीं बढ़ती, तारीख़ खींची जाती है। उस दिन मैंने सोचा था कि यह आदमी बोलता मीठा है और सोचता ठंडा है। आज मुझे लगा कि मैंने उस दिन आधी बात सोची थी।

उसके कुर्ते से साबुन और धूप की गंध आ रही थी। वही गंध जो उस्ताद ने उस पीले लिफ़ाफ़े में सूँघी थी, जो भोला भाई की दुकान के नीचे से मिला था। मुझे उस वक़्त समझ नहीं आया कि यह गंध क्यों अचानक मेरी नाक में इतनी तेज़ हो गई।

“आइए,” शुक्ला बाबू ने कहा। उनकी आवाज़ में अब वो डर नहीं था। डर खत्म नहीं हुआ था, बस उन्होंने उसे पीछे धकेल दिया था। “बैठिए।”

“बैठूँगा, बाबू जी।” सक्सेना ने कुर्सी खींची और बैठ गए। बिल्कुल वैसे बैठे जैसे कोई अपने ही घर में बैठता है। फिर उन्होंने मेज़ पर नज़र घुमाई।

मेरी नज़र उनके हाथ पर थी।

उनका हाथ धीरे-धीरे बढ़ा और उस पुराने रजिस्टर के ऊपर रुक गया। उँगली किनारे से एक इंच दूर हवा में थी। फिर उन्होंने उसे उठा लिया।

वो रजिस्टर जिसमें बारह दुकानों की एक रात की कहानी लिखी थी। वो रजिस्टर जिसमें जगदीश यादव का नाम था, मेरे दादा का नाम, और उसके नीचे चिपका हुआ वो सफ़ेद काग़ज़, जिस पर लिखा था कि दुकान गिरवी रखी गई और कर्ज़ नहीं चुका।

सक्सेना ने रजिस्टर खोला। पन्नों को पलटा — बिना जल्दी, बिना झिझक। जैसे कोई अपनी ही किताब में से कोई पुराना पन्ना ढूँढ रहा हो।

फिर उन्होंने किताब बंद की, मेज़ पर रखी, और उस पर हल्का सा हाथ फेरा। जैसे किसी बच्चे के सिर पर हाथ फेरते हैं।

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