The Mysterious Bell300 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 300

7 min read November 5, 2026

“यही तो मैं बीस साल से पूछ रहा हूँ,” उन्होंने कहा, और मुझे पहली बार उनकी आवाज़ में कुछ टूटा हुआ सुनाई दिया। “अपने आप से। काग़ज़ से। उस परमात्मा से जिस पर मैं बचपन में यक़ीन करता था।”

चाय वाला दो गिलास ले आया। शुक्ला बाबू ने छुआ भी नहीं। मैंने भी नहीं छुआ। गिलास बेंच पर रखे रहे और उनकी भाप हमारे बीच उठती रही।

“आपने कहा कि आपने काग़ज़ नहीं फाड़ा,” मैंने धीरे से कहा। “तो रात को क्या किया?”

शुक्ला बाबू ने अपना चश्मा वापस पहना। फिर कुछ देर सामने सड़क पर चलते लोगों को देखते रहे।

“जो काग़ज़ मेरे हाथ से नहीं लिखे जाते, वो मैं फाड़ देता हूँ,” उन्होंने कहा। “जब कोई काग़ज़ मेरे सामने आता है और मेरा हाथ उस पर वो अधूरा अक्षर बनाकर रुक जाता है, तो मुझे पता चल जाता है कि ये काग़ज़ मेरा नहीं है। किसी और का है। और मैं उसे फाड़ देता हूँ। डर के मारे।”

“क्यों?”

“क्योंकि अगर मैं उसे नहीं फाड़ता, तो वो काग़ज़ मेरे सामने रहता है। और मुझे उस पर हस्ताक्षर करने पड़ते हैं। और हर हस्ताक्षर के साथ मेरे अंदर कुछ और मर जाता है।”

वो चुप हो गए। मैंने उन्हें देखा। उनके हाथ बेंच पर रखे थे और उनकी उँगलियाँ धीरे-धीरे मुट्ठी बन रही थीं और खुल रही थीं।

“और पीली फाइल?” मैंने पूछा।

शुक्ला बाबू ने मेरी तरफ़ देखा।

“तुमने वो भी देखा?”

“हाँ।”

“वो मेरी नहीं है,” उन्होंने कहा। “वो उस कमरे में रखी है, जहाँ से सारे काग़ज़ निकलते हैं। जिसे कोई छूता नहीं। और मैं उसे रात में निकालता हूँ, सिर्फ़ पहला पन्ना। और उसे छाती से लगाकर रोता हूँ।”

“क्यों?”

शुक्ला बाबू ने अपना मुँह खोला और बंद कर दिया। दो बार। जैसे शब्द गले में अटक गए हों। फिर उन्होंने कहा, और आवाज़ इतनी धीमी थी कि मुझे आगे झुकना पड़ा।

“क्योंकि उस पन्ने पर मेरे बेटे का नाम है।”

मैं सीधा बैठ गया।

“मेरे बेटे का नाम स्कूल की सूची से कटा हुआ था,” शुक्ला बाबू ने कहा। “मैंने ख़ुद देखा। अपनी आँखों से। और मैं चुप रहा।”

“कौन सा सूची?”

“जो सूची तुम्हारी गली वाले स्कूल की थी।”

मेरे हाथ ठंडे हो गए।

“आपके बेटे का नाम… उस सूची में क्यों था?”

“क्योंकि वो उसी स्कूल में पढ़ता था,” शुक्ला बाबू ने कहा। “और उसके नाम के आगे जो लिखा था, वो मैंने पढ़ा। और मैंने कुछ नहीं किया।”

शुक्ला बाबू ने चाय उठाई। उनका हाथ काँप रहा था और गिलास बेंच पर खटखटा। उन्होंने उसे वापस रख दिया। और फिर उन्होंने वो कहा जो मुझे उम्मीद नहीं थी।

“तुम सोच रहे होगे कि मैं एक कायर आदमी हूँ,” उन्होंने कहा। “हूँ। मैं हूँ। पर तुम ये भी जान लो कि उस वक़्त मेरे पास क्या था। एक नौकरी। एक किराए का घर। एक बीवी जो दवा पर थी। और एक बेटा जिसका नाम मैं किसी काग़ज़ पर लिखा हुआ नहीं देखना चाहता था। अगर मैंने उस दिन आवाज़ उठाई होती, तो शायद नौकरी चली जाती। और घर बिखर जाता। और मैं सोचता रहा कि चुप रहने से घर बचेगा।”

“और बचा?”

शुक्ला बाबू ने मेरी तरफ़ देखा।

“नहीं,” उन्होंने कहा। “घर बचा, पर घर के अंदर का आदमी नहीं बचा।”

वो चुप हो गए। सड़क से एक ऑटो गुज़रा जिसकी गाड़ी की आवाज़ कर्कश थी। चाय वाले ने अपनी केतली में पानी डाला और वो ज़ोर से चीखी।

“अब वो बेटा?” मैंने धीरे से पूछा।

“वो अब बड़ा हो गया है,” शुक्ला बाबू ने कहा। “और अब वो मुझसे नहीं बोलता।”

“क्यों?”

“क्योंकि उसे पता है,” शुक्ला बाबू ने कहा। “बच्चे को हमेशा पता चल जाता है कि उसके बाप ने किस वक़्त उसके लिए आवाज़ नहीं उठाई।”

मेरे अंदर वो भारीपन फिर आया जो सुबह से बैठा था। मैंने शुक्ला बाबू को देखा — उनके हाथ, उनका फटी जेब वाला कुर्ता, उनकी गोद में पड़ी फाइल जिसे वो पकड़े हुए थे जैसे कोई बच्चा अपना झूला पकड़े रहता है। और मुझे याद आया कि मेरे पापा भी चुप थे। पाँच साल से चुप। और मैंने उन पर गुस्सा किया था। और मैंने सोचा था कि चुप्पी कायरता है।

पर चुप्पी कायरता नहीं है। चुप्पी एक कमरा है। जिसमें आदमी खुद को बंद कर लेता है और फिर बाहर से चाबी फेंक देता है।

“मुझे रजिस्टर चाहिए,” मैंने कहा।

शुक्ला बाबू ने मेरी तरफ़ देखा।

“कौन सा?”

“वो जिसमें साइकिल गली की दुकानों का हिसाब है।”

वो कुछ देर मुझे देखते रहे। फिर उन्होंने चाय का गिलास उठाया, एक घूँट लिया जैसे दवा ली हो, और उठ खड़े हुए।

“मेरे साथ आओ,” उन्होंने कहा।

हम सीढ़ियों से चढ़े। यह बार हम गलियारे के आख़िर तक नहीं गए। बीच में एक दरवाज़ा था जिस पर ताला लगा था, और शुक्ला बाबू ने अपनी जेब से चाबियों का गुच्छा निकाला, उसमें से एक काली चाबी चुनी, और ताला खोला। अंदर धूल और काग़ज़ की भारी गंध थी। कमरे में एक लंबी सी लकड़ी की मेज़ थी और उस पर रजिस्टरों के ढेर, जिल्दें चढ़ी हुई, धूल से ढकी हुई।

“ये रजिस्टर पुराने हैं,” शुक्ला बाबू ने कहा। “अब कोई इन्हें नहीं खोलता। नया काम कंप्यूटर पर होता है। पर असली हिसाब इनमें है।”

उन्होंने उँगली चलाकर एक रजिस्टर निकाला। मोटी, भूरी जिल्द, किनारे फटे हुए, और ऊपर पीली स्याही से लिखा साल। उसने रजिस्टर खोला और पन्ने पलटने लगे। उनकी उँगली रुकी, फिर आगे बढ़ी, फिर रुकी।

“रुक जाओ,” मैंने कहा। “यहीं।”

शुक्ला बाबू ने मेरी तरफ़ देखा।

“तुम्हें कैसे पता कि यहीं है?”

“पता है।”

उन्होंने पन्ना खुला छोड़ दिया।

उस पन्ने पर हाथ से खिंची लकीरें थीं। कॉलम बने हुए थे। नाम, दुकान का नंबर, काम की तरह, तारीख़। और नीचे लाल स्याही में मुहर।

मैंने उँगली रखी और पढ़ने लगा।

सात नंबर। साइकिल मरम्मत।

और उसके आगे एक नाम।

जगदीश यादव।

मेरे दादा का नाम।

मेरे हाथ उस पन्ने पर थे और मैं उसे छू नहीं रहा था। मैं बस उसे देख रहा था। स्याही ज़रा फीकी पड़ गई थी, पर नाम साफ़ था। और उसके नीचे एक तारीख़ थी, जो बीस साल पहले की थी।

और उसके आगे एक शब्द लिखा था — जारी।

“बीस साल पहले बना था,” शुक्ला बाबू ने कहा, और उनकी उँगली पन्ने पर मेरे पास रखी थी, उसी नाम के नीचे। “यही लाइसेंस। यही दुकान। और जिसके नाम पर बना था, वो तुम्हारा दादा जगदीश यादव है।”

मैं कुछ नहीं बोला।

क्योंकि मेरे अंदर जो हो रहा था, उसके लिए शब्द नहीं थे। मैं तीन महीने से सोच रहा था कि मेरी दुकान मेरी है। दादा की साइकिल, दादा की घंटी, पापा का औज़ार। मैंने सोचा था कि ये तीनों मुझे विरासत में मिले हैं, वैसे ही, जैसे बारिश का पानी छत से रिसता है।

पर नहीं। ये एक काग़ज़ पर लिखा हुआ था। बीस साल पहले। मेरे दादा के नाम।

और मैं कभी उसे देखने नहीं आया।

क्योंकि मुझे लगता था कि काग़ज़ बड़े लोगों की चीज़ है।

“ये लाइसेंस…” मैंने शुरू किया।

और शुक्ला बाबू ने मुझे रोक दिया।

“एक बात सुन लो,” उन्होंने कहा। उनकी आवाज़ अचानक बहुत साफ़ हो गई थी, बहुत शांत, जैसे कोई आदमी लंबी बीमारी के बाद पहली बार बैठकर सीधा बोल रहा हो। “तुमने मुझसे पूछा कि मैंने रात में क्या किया। मैंने तुमसे कहा कि मैंने काग़ज़ फाड़े। ये सच है। पर आधा सच है।”

मैंने उनकी तरफ़ देखा।

शुक्ला बाबू ने रजिस्टर पर अपनी उँगली उसी लाइन पर रखी जहाँ मेरे दादा का नाम था। और फिर उन्होंने पन्ना पलटा। अगला पन्ना। और उस पर भी वही सात नंबर था। और उसके आगे मेरे दादा का नाम। पर इस बार उसके आगे एक शब्द और जुड़ गया था।

रद्द।

मेरी नज़र उस शब्द पर अटक गई।

“ये…” मैंने कहा।

“हाँ,” शुक्ला बाबू ने कहा, और उन्होंने सिर उठाया। उनके चश्मे के पीछे उनकी आँखें सूखी थीं। बिल्कुल सूखी।

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