The Mysterious Bell – Chapter 299
टिंकू को सामने वाली दुकान पर बैठा दिया। उसने वहाँ एक बूढ़े को चश्मा ठीक करते देखा और तुरंत उसकी मदद में लग गया। मैं गेट के पास खड़ा हो गया।
तीन घंटे।
लोग आते गए। काग़ज़ों की फाइलें लिए, मुँह लटकाए, कुछ मुस्कुराते हुए बाहर निकलते, कुछ और ज़्यादा मुँह लटकाए हुए। एक बूढ़ा आया जो अपनी ज़मीन का काग़ज़ लेने आया था और उसे बताया गया कि काग़ज़ अभी नहीं मिलेगा, दो हफ़्ते बाद आना। वो बाहर आकर सीढ़ियों पर बैठ गया और कुछ देर आसमान देखता रहा। मैं उसके पास बैठ गया।
“कितने दिन से आ रहे हो, काका?”
“छह महीने,” उसने कहा। और फिर हँसा। “पहले मैं सोचता था कि ये लोग मेरे काग़ज़ घुमा रहे हैं। अब सोचता हूँ, शायद मेरी उम्र घूम रही है।”
मैं कुछ नहीं बोला। क्योंकि कहने को कुछ था भी नहीं।
दस बजे दफ़्तर खुला। मैं अंदर गया। गलियारे में सीलन की गंध थी और काग़ज़ की गंध थी, जैसे किसी पुराने संदूक को खोल दिया हो। दीवारों पर तारीख़ों के चार्ट टँगे थे, कुछ इतने पुराने कि उनका काग़ज़ पीला पड़कर भूरा हो गया था।
शुक्ला बाबू का कमरा गलियारे के आख़िर में था। दरवाज़े पर नाम की पट्टी टेढ़ी टँगी थी। मैं दरवाज़े के सामने वाली बेंच पर बैठ गया। और इंतज़ार करने लगा।
मैंने अंदर जाकर नहीं पूछा। मैंने किसी चपरासी से नहीं कहा। मैं बस बैठा रहा। मुझे पता था कि वो बाहर निकलेगा ही। आदमी अगर अंदर बैठा रहे तो उसका दम घुटता है। ख़ासकर वो आदमी जो रात में अकेला रोता हो।
डेढ़ बजे दरवाज़ा खुला।
शुक्ला बाबू बाहर आए। छोटे कद के, सफ़ेद कुर्ता, हाथ में एक पीली जिल्द वाली फाइल दबी हुई, चश्मा नाक पर, और आँखों के नीचे जो काले घेरे थे वो किसी को भी बता देंगे कि उन्हें नींद नहीं आई। उन्होंने दो कदम बढ़ाए और मुझे बेंच पर बैठा देखा।
और वो रुक गए।
मैंने उन्हें पहले कभी नहीं देखा था। न ही उन्होंने मुझे। पर वो मुझे देखकर ऐसे रुके जैसे कोई पुराना कर्ज़ बीस साल बाद खुद चलकर दरवाज़े पर आ खड़ा हो। उनका चेहरा सफ़ेद पड़ गया। फाइल उनके हाथ से ज़रा सी फिसली और उन्होंने उसे दोनों हाथों से पकड़ा।
“आप शुक्ला बाबू हैं?” मैंने कहा, और उठ गया।
“हाँ। तुम कौन हो?”
“अंकुश यादव। साइकिल गली। सात नंबर दुकान। और आपने कल मेरी दुकान पर नोटिस लगवाया है।”
उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया। बस मुझे देखते रहे। और फिर उन्होंने वो कहा जो मुझे उम्मीद नहीं थी।
“तुम जगदीश जी के पोते हो।”
मैं चौंक गया।
“आप मेरे दादा को जानते थे?”
“तुम अंदर आओ,” उन्होंने कहा, और आवाज़ में वो सख़्ती नहीं थी जो ऐसे आदमियों में होती है। आवाज़ थकी हुई थी। बहुत थकी हुई।
“नहीं,” मैंने कहा। “मैं अंदर नहीं आऊँगा।”
“क्यों?”
“क्योंकि अंदर आप काग़ज़ों के पीछे बैठ जाएँगे। और मैं आपसे काग़ज़ों की बात नहीं करने आया।”
शुक्ला बाबू ने मेरी तरफ़ देखा। गलियारे में उस वक़्त एक आदमी गुज़रा जो काग़ज़ों का बंडल लिए था। उसने हमारी तरफ़ देखा और तेज़ी से निकल गया। दीवार पर लगी घड़ी की टिक-टिक सुनाई दे रही थी। और मुझे अपनी घंटी जेब में ठंडी महसूस हुई।
“तो किस बात करने आए हो?” उन्होंने धीरे से पूछा।
“आप रात में अकेले काग़ज़ फाड़ते हैं।”
शुक्ला बाबू का हाथ काँप गया। सच में काँप गया। फाइल उनके हाथ में थी और उसका कोना काँपने लगा, जैसे हवा चल रही हो, जबकि वहाँ हवा नहीं थी।
वो कुछ देर मुझे देखते रहे। फिर उन्होंने फाइल दबाकर बगल में ली और सीढ़ियों की तरफ़ बढ़ गए।
“चलो,” उन्होंने कहा। “यहाँ नीचे एक चाय की दुकान है।”
“मैं चाय नहीं…”
“मैं भी नहीं पीता,” उन्होंने कहा। “पर वहाँ सिर्फ़ चाय वाले की आवाज़ आती है, कोई काग़ज़ नहीं।”
मैं उनके पीछे चल पड़ा।
नीचे गेट के बगल में एक छोटी सी दुकान थी। लकड़ी की दो बेंचें, एक प्रेशर स्टोव, चाय की केतली जो हमेशा गरम रहती है, और दीवार पर एक फटा हुआ कैलेंडर जो दो महीने पीछे का था। दुकानदार एक पतला आदमी था जिसका एक कान सुनने में कमज़ोर लगता था, इसलिए वो हर बात पर सिर हिलाकर “हाँ जी, हाँ जी” कह देता था।
हम बेंच पर बैठ गए।
शुक्ला बाबू ने फाइल अपनी गोद में रखी और दोनों हाथ उस पर। जैसे किसी को गोद में सुला दिया हो। फिर उन्होंने चश्मा उतारा और शर्ट के कोने से उसे पोंछा। और बिना चश्मे के उनका चेहरा अचानक बहुत छोटा और बहुत थका हुआ दिखने लगा।
“मैंने कोई काग़ज़ नहीं फाड़ा,” उन्होंने कहा।
“मैंने देखा है।”
“तुमने क्या देखा है?”
“आप रात में दफ़्तर में अकेले बैठे थे। काग़ज़ फाड़ा। फिर एक काग़ज़ और एक पीली फाइल का पहला पन्ना छाती से लगाकर रोए।”
शुक्ला बाबू ने मेरी तरफ़ देखा। और उनकी आँखों में जो था वो डर नहीं था। हैरानी थी। और उसके नीचे कुछ और भी था — जैसे किसी ने उनका भेद खोल दिया हो और उन्हें राहत भी मिली हो।
“तुम्हें कैसे पता?” उन्होंने धीरे से कहा। “तुम वहाँ नहीं थे।”
“मुझे पता है। बस पता है।”
“ये जवाब नहीं है।”
“मैं इसका जवाब नहीं दे सकता,” मैंने कहा। “आप अगर पूछेंगे तो मुझे झूठ बोलना पड़ेगा, और मैं झूठ नहीं बोलना चाहता। इसलिए मैं चुप रहूँगा। पर जो मैंने कहा, वो सच है।”
शुक्ला बाबू कुछ देर मुझे देखते रहे। फिर उन्होंने नज़र नीचे कर ली और उनकी उँगलियाँ अपनी गोद में पड़ी फाइल के किनारे पर चलने लगीं।
“मैंने काग़ज़ नहीं फाड़ा,” उन्होंने दोबारा कहा, और इस बार आवाज़ ज़रा साफ़ थी। “मैंने सिर्फ़ उन पर हस्ताक्षर किए हैं। बीस साल से।”
“हस्ताक्षर?”
“हाँ। और यही मेरी सज़ा है।” उन्होंने सिर उठाया। “तुम जानते हो, जब मैं लिखने बैठता हूँ, तो मेरा हाथ ऐसे लिखता है जैसे किसी और का हाथ हो। जैसे मेरे हाथ में कोई और बैठा हो और मेरी उँगलियों को पकड़कर चला रहा हो। काग़ज़ों पर मेरा नाम जाता है, पर लिखता कोई और है।”
मेरे अंदर कुछ ठंडा हुआ।
“ऐसा कब से?”
“बहुत पहले से। पर शुरू में मैं सोचता था कि ये सिर्फ़ डर है। हाथ काँपता है, बस। फिर मैंने देखा कि जिस काग़ज़ पर मुझे नहीं लिखना, उस पर मेरा हाथ बिल्कुल साफ़ चलता है। और जिस काग़ज़ पर मुझे सच लिखना हो, उस पर हाथ जैसे पत्थर हो जाता है।”
उन्होंने अपनी जेब में हाथ डाला। वो पुरानी शर्ट थी, जिसकी जेब का कोना फटा हुआ था। उन्होंने एक काग़ज़ का टुकड़ा निकाला — मुड़ा हुआ, बार-बार मुड़ा हुआ, इतना कि उसके मोड़ों की लकीरें ही उसकी उम्र बता रही थीं। उन्होंने उसे खोला।
उस पर कुछ नहीं था। बस एक अक्षर। एक अधूरा अक्षर।
“ल,” उन्होंने कहा।
मेरी साँस रुक गई।
क्योंकि वो अक्षर मैंने पहले देखा था। उस पीले काग़ज़ पर, जो स्कूल के चौकीदार रामलाल के संदूक से मिला था, अजय की चिट्ठी के नीचे। उस पर धुँधली स्कूल मुहर थी और नीचे लिखा था — तुम कहीं नहीं जाओगे। और हस्ताक्षर का आख़िरी अक्षर था — ल।
मैंने उस काग़ज़ को छुआ था। मैंने उसे पढ़ा था। और उस वक़्त मुझे लगा था कि वो कोई और है। कोई ऊपर का आदमी।
“ये अक्षर…” मैंने कहा, और मेरी आवाज़ सूख गई।
“हाँ,” शुक्ला बाबू ने कहा। “जब मैं लिखने बैठता हूँ, हाथ यही बनाता है। बस यही एक अक्षर। फिर रुक जाता है। जैसे कोई नाम लिखना चाहता हो और पूरा न कर पाए।”
“किसका नाम?”
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