The Mysterious Bell297 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 297

7 min read November 5, 2026

और मेरे अंदर कुछ हिल गया। तुम सोचोगे कि ये बड़ी बात थी? नहीं थी। बड़ी बात ये थी कि उसने मुझसे ये नहीं पूछा कि बाज़ार में तेरे ख़िलाफ़ क्या क्या बातें चल रही हैं। उसने सिर्फ़ भरोसा किया। एक आदमी का भरोसा, जिसका नाम मुझे आज तक पता नहीं।

“ले आओ,” मैंने कहा। “पर मेरे औज़ार दुकान में हैं। तीन चीज़ें चाहिए। रिंच, चेन का कांटा, और एक अच्छी सी धूप। तीसरी मैं ख़ुद ढूँढ लूँगा।”

वो हँसा। दाँत एक-दो ही बचे थे।

“बैठो,” मैंने कहा।

और मैंने सड़क किनारे, पत्थर के पुल की रेलिंग से साइकिल टिकाकर, औज़ार निकाले। ट्रंक मैं रोज़ साथ नहीं लाता, पर आज साथ लाया था। किसी चीज़ का तो काम आना ही था।

पहले चेन। उतरी नहीं थी, टूटी थी। कड़ी मुड़ी हुई थी। मैंने कांटे से खोली, सीधी की, फिर धीरे से जोड़ी। उँगलियाँ अपने आप चल रही थीं। दिमाग़ जहाँ मुझे ले जाना चाहता था, वहाँ नहीं गया। हाथ जानते थे — अभी तुम्हारा काम ये है, बातें बाद में।

“भाई,” बूढ़ा बोला, “सच बताऊँ?”

“बोलो।”

“मैं डर रहा था कि तू कहीं अब दुकान बंद न कर दे।”

मेरे हाथ रुके।

“क्यों?”

“क्योंकि जब बबलू भाई साहब गली में घूमकर पूछ रहा था कि तेरे पास ये सब बातें कैसे पहुँचीं, तब मेरी औरत ने कहा था — लड़का सच बोलता है, इसलिए लोग उससे डरते हैं।”

मैं उसकी तरफ़ देखने से बच गया। आँख में कुछ जा गया था, धूल। ज़रूर धूल।

“आपकी औरत ठीक हैं?” मैंने पूछा, सिर झुकाए हुए।

“पहले से बेहतर। दवा चल रही है।”

“अच्छा।”

और मैंने चेन को पकड़कर पैडल घुमाया। चरर… चरर… पर कटी नहीं।

“अब सीट।” मैंने पीछे की सीट की रॉड पकड़ी। ढीली थी, और मुड़ी भी हुई। दो जगह पर लोहे ने हार मान ली थी।

तभी जेब में घंटी हिली।

नहीं, ठंडी नहीं रही। मैंने महसूस किया, जैसे जेब में एक छोटा-सा अंगार जल उठा।

और आवाज़ आई, बहुत धीरे, इतनी धीरे कि मुझे सुनने के लिए साँस रोकनी पड़ी —

“हिसाब दो सौ तिरसठ।”

मैंने पैडल घुमाना जारी रखा, चेहरा वैसा ही रखा।

“एक चेहरा देखेगा?”

मैंने औज़ार उठाया, जैसे कुछ सोच रहा हूँ।

“किसका?” मैंने फुसफुसाकर पूछा।

“चालीस अंक। छिपा दर्द।”

चालीस अंक। मेरे पास दो सौ तिरसठ थे। ये अंक पिछले कुछ दिनों में बढ़े थे — नसीम भाई, मंसूर, सुनीता दीदी, रामलाल और अजय, स्कूल के स्टाफ़ वाले दो कमरे। छोटे-छोटे जुड़ाव, दस-दस, बीस-बीस। जब तुम दो लोगों को बैठकर बात करवाते हो, तो अंक नहीं आते। जब वो दोनों ख़ुद एक-दूसरे से वो सच बोल देते हैं जो सालों से पेट में दबा था, तब आते हैं। तंत्र उसी का हिसाब रखता है।

पर चालीस अंक बहुत होते हैं। बहुत।

मैंने बूढ़े की साइकिल की रॉड सीधी की, एक मोटा बोल्ट और दो पुराने धागे से कस दी, और हाथ झाड़कर खड़ा हो गया।

“चला के देखो।”

उसने चलाई। चरचराना बंद। चेन शांत। सीट जगह पर।

“अरे वाह!” वो हँस पड़ा। “अरे वाह भाई! तू तो जादूगर है!”

“जादूगर नहीं, बाबा,” मैंने कहा, औज़ार पोंछते हुए। “इसे कसना कहते हैं।”

उसने जेब से दस का सिक्का निकाला।

“रखो,” मैंने हाथ उठा दिया।

“नहीं, ले ले। मैं मुफ़्त नहीं चलाता।”

“बाबा,” मैंने कहा, “आज मैं मुफ़्त भी नहीं ले रहा। आज मैं तुमसे कुछ और ले रहा हूँ।”

वो रुक गया।

“क्या?”

“भरोसा,” मैंने कहा। “और वो मुफ़्त नहीं मिलता। इसकी कीमत तुमने अभी दे दी, जब तुमने कहा कि लाइसेंस हो या न हो, मेरा भरोसा तो है।”

वो कुछ देर खड़ा रहा। फिर उसने सिक्का जेब में रखा, साइकिल घुमाई, और जाते-जाते बोला —

“अंकुश, एक बात कहूँ?”

“कहो।”

“जो काग़ज़ तेरी दुकान पर लगा है, उसे मैंने पढ़ा नहीं। मैं पढ़ना नहीं जानता। पर मेरी औरत ने पढ़ा और कहा — इस पर तेरे नाम की जगह दुकान का नंबर ग़लत लिखा है।”

मैं हँस दिया। सच में हँस दिया, पहली बार उस सुबह।

“तुम्हारी औरत,” मैंने कहा, “मुझसे ज़्यादा होशियार है।”

“सबकी औरतें हमसे ज़्यादा होशियार होती हैं, भाई।” और वो चल दिया, सीट पर कंबल लपेटे, और मेरे पीछे सड़क पर चरचराहट की आवाज़ नहीं बची।

मैं सड़क किनारे खड़ा रहा। हाथ में ग्रीस, जेब में अंगार।

“किसका चेहरा?” मैंने दोबारा पूछा।

पर तंत्र चुप हो गया। इतना ही कहता है, और चुप। जैसे कोई बूढ़ा आधी बात कहकर चाय पीने लगे।

मैंने ट्रंक उठाया और दुकान की तरफ़ चल दिया। लाइसेंस दफ़्तर देखना रह गया। कोई बात नहीं। आज नहीं तो कल। काग़ज़ भागता नहीं है, बस आदमी भागते हैं।

दुकान पहुँचा तो सात बजने वाले थे। मैं शटर के नीचे से घुसा, पीछे के कमरे में गया, दरवाज़ा बंद किया और चारपाई पर बैठ गया।

कमरे में एक बल्ब था, गुनगुनाता हुआ। बाहर से कोई आवाज़ नहीं।

मैंने घंटी जेब से निकाली।

वो गरम थी, और मेरी हथेली में वैसे ही बैठी जैसे बच्चा माँ की गोद में।

“ठीक है,” मैंने कहा। “देखना है।”

और मैंने घंटी बजाई।

पहले कुछ नहीं हुआ। फिर कमरे की हवा भारी हो गई, जैसे किसी ने बड़ा कंबल सिर पर डाल दिया हो। बल्ब की रोशनी पीली पड़ गई। मेरे कान में एक गिनती चली — जैसे कोई बूँदें गिन रहा हो। एक, दो, तीन…

और मैं कहीं और था।

रात थी। दफ़्तर। बड़ी मेज़, ऊपर एक कम रोशनी वाला बल्ब, और सामने काग़ज़ों का ढेर। इतना ढेर कि मेज़ दिखती ही नहीं थी।

और उस ढेर के पीछे एक आदमी बैठा था।

पतला, झुका हुआ, चश्मा नाक पर फिसला हुआ। कमीज़ की कली खुली थी और गला पसीने से चमक रहा था, हालाँकि पंखा चल रहा था। उम्र पचास से ऊपर। आँखों के नीचे काला, बहुत काला। जैसे दस साल से सोया न हो।

मैंने उसे पहचाना नहीं। फिर उसने बात की, और मैं समझ गया। उसकी आवाज़ में वो ज़रा-सी मिठास थी, वो धीमापन, जो आदमी सिर्फ़ उस वक़्त निकालता है जब वो किसी से कुछ छीन रहा हो और उसे लगे कि ये भलाई है।

शुक्ला। लाइसेंस बाबू शुक्ला।

वो एक काग़ज़ उठाता, पढ़ता, और मेज़ के किनारे पर रख देता। फिर दूसरा उठाता, पढ़ता, और फाड़ देता।

फाड़ता। धीरे-धीरे। दोनों हाथों से। एक सीधी लकीर में।

फिर तीसरा। फिर चौथा।

कमरे में सिर्फ़ काग़ज़ फटने की आवाज़ थी। फर्र… फर्र… फर्र…

और फिर वो रुका।

उसने एक काग़ज़ उठाया, और उसे पढ़ते हुए उसका चेहरा बदल गया। वैसे बदला जैसे कोई अपना ही नाम अख़बार में पढ़ ले।

उसने उसे फाड़ा नहीं।

उसने उसे जेब में नहीं रखा।

उसने उसे दोनों हाथों से पकड़ा, माथे पर लगाया, और रो पड़ा।

बिना आवाज़। बस कंधे हिल रहे थे और चश्मा धुँधला हो गया था। उसने चश्मा उतारा, मेज़ पर रखा, और हथेली से मुँह छिपा लिया।

वो बहुत देर तक ऐसे ही बैठा रहा। फिर उसने अपना दराज़ खोला, और उसमें से एक फाइल निकाली — पीली जिल्द वाली।

मैंने देखा और मेरी साँस रुक गई।

वो वैसी ही फाइल थी। बिल्कुल वैसी। पीली जिल्द, सोने के रंग जैसा किनारा, और ऊपर कोने पर स्याही से कुछ लिखा — जो घिस गया था, जिसे कोई पढ़ नहीं सकता था।

उसने फाइल खोली। उसका पहला पन्ना उसने बड़े प्यार से सीधा किया, जैसे कोई पुरानी तस्वीर सीधी करता है।

उस पन्ने पर नीचे की तरफ़ एक हस्ताक्षर था — अधूरा। आधा नाम, फिर हाथ काँप गया हो जैसे। या जैसे किसी ने लिखते-लिखते कलम रोक दी हो।

शुक्ला ने उस पन्ने को दोनों हाथों से छाती से लगा लिया। और उसकी आँखें फिर भर आईं।

कमरे में सिर्फ़ पंखे की आवाज़ थी। और मैं — मैं वहाँ खड़ा था, और मैं कुछ नहीं कर सकता था। मैंने नाम पढ़ने की कोशिश की, पर वो दृश्य पानी की तरह काँप रहा था। जो दिखता था, वो बस हाथ और आँसू और पीली जिल्द।

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