The Mysterious Bell – Chapter 293
"दीदी, वो सभा में नहीं आई।"
"मुझे पता है," उन्होंने कहा। "और मुझे ये भी पता है कि वो आएगी। नहीं आएगी तो मैं हर रोज़ शाम को इस गली में आ जाऊँगी। और वो मुझे देखकर भाग नहीं सकती — यहाँ से भागने के लिए रास्ता एक ही है, और वो मेरी ही गली से जाता है।"
वो मुड़ीं। तीन कदम चलीं। फिर रुकीं।
"अंकुश," उन्होंने कहा, बिना पलटे। "तुम्हारी दुकान पर जो चिपका है, मैंने पढ़ लिया।
"दीदी—"
"दस दिन," उन्होंने कहा। "तुम जानते हो, शहर में किसी दुकान का लाइसेंस दस दिन में नहीं बनता। कम से कम तीन महीने लगते हैं। और अगर रिश्वत देने की बात आई, तो तीन दिन।"
मेरे अंदर कुछ ठंडा हुआ। मुझे ये सोचना चाहिए था। मैंने सोचा नहीं था। या सोचा था, पर दबा दिया था।
"तो दस दिन का मतलब क्या है?"
"दस दिन का मतलब सिर्फ़ एक है," उन्होंने कहा, "कि उन्हें दस दिन रुकना है। किसी के आने का इंतज़ार है। और अगर उन्हें इंतज़ार करना पड़ रहा है, तो उनसे भी कोई डर रहा है।"
वो चली गईं। रात की हवा में उनकी साड़ी का पल्लू कुछ देर तक लहराता रहा, फिर गली के मोड़ पर गायब हो गया।
मैंने पीली फाइल उठाई, जो मैंने अभी तक मेज़ पर छोड़ी हुई थी, और उसे खोला।
और उसमें जो पहला काग़ज़ था, उस पर एक नाम था।
मुंशी रामअवतार।
तब दुबे अंकल लौटे।
वो लौटकर आए नहीं थे, वो कभी गए ही नहीं थे। वो अंधेरे में, पीपल के तने के पास खड़े थे, और मुझे इसका पता तब चला जब वो बोले।
"पढ़ रहा है?"
"अंकल, आप अभी तक यहाँ?"
"मैं तेरी दुकान का नोटिस पढ़ने आया हूँ," उन्होंने कहा, और दीवार की तरफ़ बढ़े।
उन्होंने टॉर्च नहीं निकाली। उन्होंने चश्मा नहीं निकाला — उनके पास चश्मा था भी या नहीं, मुझे नहीं पता। उन्होंने बस उँगली उठाई और उस पीले काग़ज़ पर रख दी।
"पढ़," उन्होंने कहा। "ऊपर से नीचे।"
"अंकल—"
"पढ़।"
मैंने पढ़ा।
"दुकान संख्या… " और मैं रुक गया।
रुक गया, क्योंकि जो नंबर लिखा था, वो मेरी दुकान का नंबर नहीं था।
मेरी दुकान सातवें नंबर पर है। मीरा के काग़ज़ में भी यही छपा था — सातवाँ नंबर। मैं वो नंबर जानता था, जैसे अपना नाम जानता हूँ। दादा के बोर्ड के नीचे वो नंबर आज भी पेंट से उभरा हुआ है।
पर इस पीले काग़ज़ पर लिखा था — उन्नीस।
उन्नीस नंबर।
"अंकल, ये…" मेरी आवाज़ सूख गई। "ये मेरी दुकान नहीं है।"
"नहीं है," दुबे अंकल ने कहा, और उनका हाथ उस काग़ज़ पर टिका रहा।
"फिर ये नोटिस—"
"अभी खत्म नहीं हुआ," उन्होंने कहा। "वो दरोगा जी देख रहे थे ना, मैं काग़ज़ देख रहा था। और मैंने वो देखा जो वो नहीं देख पाए।"
"क्या?"
"उन्नीस नंबर," उन्होंने कहा, और उनकी उँगली काग़ज़ पर दबी रही, जैसे वो उसे ज़मीन में गाड़ रहे हों। "ये दुकान पिछले महीने साहब के नाम रजिस्ट्री हो चुकी है।"
गली में उस वक़्त ऐसी चुप्पी छा गई जैसी अब तक नहीं थी।
मैंने दीवार पर चिपके उस पीले काग़ज़ को देखा, और उस पल मुझे लगा कि वो काग़ज़ नहीं, एक दरवाज़ा है — जो मेरी दुकान से नहीं, मेरी ज़िंदगी से जुड़ा है। और उस दरवाज़े के पीछे कोई बैठा है, हाथ जोड़े, मुस्कुराते हुए, और उसकी उँगली में काली अंगूठी है।
"अंकल," मैंने धीरे से कहा, "मतलब ये नोटिस मेरी दुकान पर नहीं, उस दुकान पर चिपका है जो अब साहब की है?"
दुबे अंकल ने उँगली हटाई।
"नहीं," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ में पैंतीस साल की सिपाहीगिरी थी। "मतलब ये है कि आज रात कोई मेरी गली में आया, और उसने जान-बूझकर गलत नंबर पर नोटिस चिपकाया — ताकि कल जब काग़ज़ काग़ज़ से मिले, तो लड़ाई दुकान की न हो, ज़मीन की हो।"
"और ज़मीन की लड़ाई में—"
"ज़मीन की लड़ाई में," उन्होंने कहा, "हारने वाला दुकान नहीं, पूरी गली होती है।"
उन्होंने नोटिस को एक आख़िरी बार देखा, फिर मेरी तरफ़ पलटे।
"सुबह सात बजे सरोज काग़ज़ खोलेगी," उन्होंने कहा। "उससे पहले तुझे ये पता करना है कि उन्नीस नंबर किसका है।" वो रुके। "और अंकुश — जब पता करे, तो अकेले मत जाना।"
और मैंने पहली बार, बिना सोचे, बिना ज़िद किए, बिना "अंकल, मैं देख लूँगा" कहे, सिर हिलाया।
"नहीं जाऊँगा," मैंने कहा। "अकेले नहीं जाऊँगा।"
॥
सुबह के छह बज रहे थे और शटर सिर्फ़ आधा खुला था।
आधा इसलिए, क्योंकि आज मेरे हाथ नहीं उठ रहे थे। जब से वो पीला काग़ज़ दीवार पर चिपका था, मुझे लग रहा था कि शटर पूरा खोलूँगा तो गली देख लेगी कि मेरे अंदर कुछ टूट गया है।
और मैं नहीं चाहता था कि गली मेरी आँखें देखे।
टिंकू अंदर था। झाड़ू लगा रहा था। आम तौर पर जब वो झाड़ू लगाता है, तो पूरी दुकान को उलट देता है — एक तरफ़ से पेंच, दूसरी तरफ़ से रिंच, और बीच में से मेरी चाय। आज वो चुपचाप झाड़ू लगा रहा था, और झाड़ू की आवाज़ भी ऐसी थी जैसे कोई दबे पाँव चल रहा हो।
मैंने उसे देखा। उसका कंधा ऊपर उठ रहा था, बार-बार। झाड़ू की डंडी हाथ में थी और वो अपने कंधे को कान तक ले जाकर उससे आँख पोंछ रहा था। जैसे किसी को पता न चले।
मुझे पता चल गया।
"टिंकू।"
"हँ, उस्ताद।" आवाज़ नाक से निकली।
"झाड़ू से आँसू नहीं पोंछे जाते, भाई। उससे धूल जाती है, आँसू नहीं।"
"मैं रो नहीं रहा।"
"अच्छा। फिर तेरी आँख से पानी क्यों गिर रहा है? पसीना है?"
"गर्मी है।"
"सुबह छह बजे, शटर आधा खुला है, और तू पसीना-पसीना है।"
वो रुक गया। झाड़ू उसने दीवार से टिका दी, और उसी तरह खड़ा रह गया, मुँह नीचे, हाथ पीछे बँधे हुए।
"बोल।"
"कुछ नहीं।"
"टिंकू।"
"उस्ताद," उसने कहा, और उसकी आवाज़ टूट गई, "दुकान बंद हो गई तो मैं कहाँ जाऊँगा?"
मैं वहीं रुक गया। हाथ में पेचकस था, वो भी रुक गया।
"मैंने स्कूल छोड़ दिया," वो बोला, रफ़्तार पकड़ते हुए, जैसे बहुत दिनों से जमा था और आज टूट गया। "माँ कहती है कि ये भी कहीं नहीं टिका। दो जगह से निकल गया, अब यहाँ भी निकाले जाएँगे। माँ कहती है कि तेरे पापा होते तो…"
वो रुक गया। पापा शब्द पर हर बच्चा रुक जाता है। मैंने भी देखा है — जिस घर में पापा नहीं होते, वहाँ ये शब्द एक कुर्सी की तरह रखा रहता है, जिस पर कोई बैठ नहीं सकता और कोई हटा भी नहीं सकता।
मैंने औज़ार मेज़ पर रखा।
पहली बार, मैंने उसे टोका नहीं। न "चुप रह", न "बच्चों की बातें", न "अभी तू छोटा है"। मैं उठकर उसके सामने बैठ गया। ज़मीन पर। घुटनों के बल, उस पुराने पंचर वाले टब के पास, जहाँ सुबह की धूप पड़ रही थी और उसमें धूल के कण नाच रहे थे।
अपनी ग्रीस वाली उँगलियाँ मैंने कपड़े से पोंछीं। फिर उसकी तरफ़ देखा।
"सुन," मैंने कहा। "मैंने तुझे कभी नौकरी पर रखा ही नहीं था।"
उसने सिर उठाया। आँखें लाल, नाक बह रही, और चेहरे पर वो भाव जो कह रहा था — अब ये क्या बात हुई।
"तो निकालूँगा क्या?"
वो एक पल चुप रहा।
फिर हँसा। पहले हल्का, फिर ज़ोर से, और फिर उसी हँसी के बीच से रोना निकल आया — वो रोना जो हँसी के साथ आता है और सबसे ज़्यादा सच्चा होता है। वो मेरे कंधे पर सिर रखकर फूट-फूटकर रोया, और मैं वहीं बैठा रहा, हिला नहीं।
उसकी पीठ पर हाथ रखा। कुछ नहीं कहा।
क्योंकि मैं जानता था — अगर मैं आज एक शब्द भी ज़्यादा बोलता, तो मेरी आवाज़ भी टूट जाती।
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