The Mysterious Bell294 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 294

7 min read November 5, 2026

तुम सोच रहे होगे कि इसमें बड़ी बात क्या है? एक बच्चा रो रहा था, रोता है, हँसता है। सुनो, बात वो नहीं थी। बात ये थी कि वो जो डर रहा था — दुकान बंद होने का, घर से निकाले जाने का, कहीं न टिकने का — वो मेरे अंदर भी बैठा था। मैं उसे हर रोज़ दुकान के पीछे वाले कमरे में छोड़कर सुबह निकलता था और शाम को वापस उठा लेता था। आज वो बाहर आ गया, क्योंकि टिंकू ने उसे बोल दिया।

और अजीब बात — बाहर आकर वो छोटा हो गया।

"अब सुन," मैंने कहा, जब उसका रोना ठंडा हुआ। "दुकान दस दिन में बंद नहीं होती। और अगर हो भी गई, तो मैं सड़क पर बैठकर भी पंचर लगाऊँगा। तू उस दिन आ जाना, मैं तेरे लिए भी एक ईंट रख दूँगा।"

"उस्ताद—"

"और हाँ, स्कूल तूने छोड़ा है, ये तेरी गलती है। मैंने नहीं छुड़ाया था।" मैंने उसके सिर पर हल्का हाथ मारा। "पर इसका मतलब ये नहीं कि तेरा दिमाग़ भी छूट गया। अस्पताल के पीछे शाम सात बजे पाठशाला चलती है। वहाँ नाम लिखवाऊँगा।"

"मैं वहाँ जाऊँगा?"

"तू जाएगा नहीं। मैं ले जाऊँगा।"

उसने मुँह पोंछा। और फिर जो बात कही, उस पर मुझे हँसी भी आई और कुछ और भी हुआ अंदर।

"उस्ताद, अगर दुकान बंद हो गई, तो ये औज़ार मेरे पास रहेंगे ना?"

"औज़ार मेरे पास रहेंगे।"

"एक रिंच?"

"सोचेंगे।"

"वो नई रिंच?"

"वो तो बिल्कुल नहीं।"

वो हँसा। और मैंने पहली बार महसूस किया कि दुकान सिर्फ़ शटर और दीवार नहीं होती। दुकान वो होती है जहाँ कोई तुम्हारे औज़ार पूछ ले।

तभी बाहर से खड़खड़ाहट आई।

तीन सिर दरवाज़े पर आ गए, एक के ऊपर एक। सानिया, गुड्डू और चिंटू। चिंटू के हाथ में एक लकड़ी का टुकड़ा था, जितना बड़ा एक किताब होती है, और उसे वो इस तरह पकड़े थे जैसे कोई इनाम लेकर आया हो।

"उस्ताद!" सानिया चिल्लाई। "लाइसेंस!"

"क्या?"

"लाइसेंस!" गुड्डू बोला। "हम लाए हैं।"

वो लकड़ी मेज़ पर रखी गई। उस पर सफ़ेद पेंट से उलटे-सीधे अक्षरों में लिखा था — मोटा, टेढ़ा, कहीं पेंट टपका हुआ, कहीं अक्षर बह गया। ऊपर बड़ा सा शब्द, और नीचे छोटे अक्षरों में मेरा नाम।

अंकुश यादव।

"ये कहाँ से लाए?"

"पीछे वाली गली में लकड़ी वाले से। शाम को उसके पास बड़ा टुकड़ा बचा था," सानिया ने कहा, पूरी गर्व से। "और पेंट चिंटू के पापा की दुकान से। उन्होंने दो रुपये लिए।"

"दो रुपये?"

"बोले कि बच्चों से नहीं लेंगे, फिर ले लिए," चिंटू ने कहा, बड़ी ईमानदारी से।

मैंने वो लकड़ी उठाई। हल्की थी। एक तरफ़ से पेंट अभी गीला था और मेरी उँगली पर लग गया।

"देखो," सानिया ने कहा, आँखें बड़ी करके, "अब दुकान कानूनी हो गई। इसे बाहर चिपका दो। जैसे बड़ी दुकानों पर होता है।"

मैं कुछ कहने ही वाला था कि चिंटू ने मेरी आस्तीन खींची।

"उस्ताद, और जो दरोगा वाला पीला काग़ज़ है ना, वो हटा दें? अब तो लाइसेंस आ गया।"

तीनों मेरे चेहरे देखने लगे।

मैंने लकड़ी को करीब से देखा। उलटे-सीधे अक्षर। टपका हुआ पेंट। नीचे मेरा नाम। और यही सबसे सुंदर चीज़ थी जो उस हफ़्ते मेरे हाथ में आई थी।

"देखो," मैंने कहा, धीरे से, "सच बात ये है कि असली लाइसेंस काग़ज़ का होता है। मुहर वाला। अंगूठे वाला। और उस काग़ज़ के लिए हमें असली दफ़्तर जाना पड़ेगा।"

तीनों के चेहरे उतर गए।

"पर," मैंने वो लकड़ी उठाई, "ये मैं नहीं हटाऊँगा। ये शटर के ऊपर लगेगा। और जब भी कोई पूछेगा कि तुम्हारा लाइसेंस कहाँ है, मैं यही दिखा दूँगा।"

चिंटू खुश हो गया।

"और उन्नीस नंबर?" सानिया ने अचानक कहा।

मैं रुक गया। "क्या?"

"वो जो नोटिस पर लिखा था। उन्नीस। हमने पता कर लिया।"

"कैसे?"

"हमने गली में सबसे छोटी गिनती से गिनना शुरू किया," गुड्डू ने कहा, जैसे कोई बहुत बड़ा खुलासा कर रहा हो। "मन्दिर वाली तरफ़ से। एक, दो, तीन—"

"हमने सुबह से गिना," चिंटू ने कहा। "मैंने अपनी उँगलियों पर गिना।"

सानिया ने अपनी लाल कवर वाली कॉपी खोली। उसमें उसके तिरछे अक्षरों में लिखा था, तारीख़ें, नाम, और कुछ ऐसा जो सिर्फ़ उसे समझ आता था।

"उन्नीस नंबर," उसने कहा, और उँगली एक लाइन पर रखी, "वो दुकान है जो आपकी दुकान से बिल्कुल सटी हुई है। पीछे की तरफ़। जिसका शटर महीने भर से गिरा है।"

मैं चुप हो गया।

मैंने सोचा। हाँ। मेरी दुकान से तीन कदम आगे, एक शटर है जो हमेशा गिरा रहता है। बच्चे उसकी सीढ़ी पर बैठते हैं। कोई नहीं जानता वहाँ पहले क्या था। उसके ऊपर का बोर्ड सीमेंट से पोत दिया गया है, जैसे किसी ने नाम मिटाया हो।

"और?" मैंने पूछा।

"और वो दुकान पिछले महीने बिकी है," सानिया ने कहा। "ये मुझे नहीं पता, ये भोला काका ने बताया। उन्होंने कहा कि एक पीली जीप आई थी, उसमें से कोई उतरा भी नहीं, बस काग़ज़ दिए और चला गया।"

"और उसकी चाबी?" टिंकू ने पूछा।

"नई है," गुड्डू ने कहा। "मैंने देखी। चमक रही थी।"

मैंने औज़ार उठाए और चुपचाप बाहर निकला। उस शटर के सामने खड़ा हुआ।

आधे घंटे की धूप में वो शटर और भी बूढ़ा लग रहा था। नीचे ज़मीन पर ताज़ा सीमेंट था, जिस पर पैरों के निशान थे। ऊपर का बोर्ड सीमेंट से पुता था, पर उसके एक कोने से पुराना हरा रंग झाँक रहा था। और दरवाज़े के ऊपर, जहाँ नंबर लिखा होता है, वहाँ अब सिर्फ़ खुरचा हुआ लकड़ी का हिस्सा था। किसी ने जल्दी में नंबर उखाड़ा था, और नीचे के लकड़ी पर उन्नीस का पुराना निशान बचा रह गया था।

"उस्ताद," टिंकू ने पीछे से कहा।

"हम्म।"

"ताला नहीं तोड़ेंगे ना?"

मैंने उसकी तरफ़ देखा।

"नहीं," मैंने कहा। "ताला नहीं तोड़ेंगे।"

"क्यों?"

"क्योंकि ताला तोड़ना साहब का काम है।" मैंने शटर के नीचे से झाँका। "हमारा काम काग़ज़ का है।"

शटर के नीचे उँगली भर की जगह थी। उसमें से अंदर देखा तो सीमेंट की बोरियाँ दिखीं, एक के ऊपर एक, और उनके बीच से एक लोहे का ट्रंक, और ट्रंक के ऊपर एक फावड़ा। कोई दुकान नहीं, कोई सामान नहीं — सिर्फ़ माल और औज़ार। यानी वो जगह दुकान नहीं, अड्डा थी।

"सानिया," मैंने कहा, "तूने कहा कि पीली जीप आई थी और काग़ज़ दिए गए। ये बात भोला काका ने तुझे कब बताई?"

"आज सुबह," उसने कहा। "वो अपनी दुकान के बाहर बैठे थे और चना खा रहे थे, तो मैंने पूछा।"

"और उन्होंने कुछ और कहा?"

सानिया ने अपनी कॉपी पलटी।

"कहा कि," उसने धीरे से पढ़ा, "कि उस दिन काग़ज़ लेने वाले ने उन्हें भी बुलाया था। पर वो नहीं गए। और उसके बाद उस दुकान पर रात में दो बार गाड़ी आई और सुबह तक कुछ होता रहा, खट-खट।"

मैंने अपनी जेब में हाथ डाला। घंटी थी, वही पुरानी, गहरे रंग की — चुप, ठंडी। इतनी ठंडी जैसे उसने अपनी साँस रोक ली हो।

"बोल ना," मैंने धीरे से कहा।

कुछ नहीं।

मैंने घंटी वापस जेब में रखी।

"ठीक है," मैंने कहा। "तू चुप रह। हम बोलेंगे।"

हम लौटने ही वाले थे कि शबनम आपा आई। हाथ में समोसे की प्लेट, सिर पर साड़ी का पल्लू, चेहरे पर वो भाव जो कह रहा था कि वो किसी से बहस करके आई है और जीत गई है।

"लो," उसने प्लेट मेज़ पर रखी। "चार समोसे। और ये लो।"

ये लो में उसने अपनी कॉपी निकाली। वही मोटी, किनारों से टेढ़ी, जिसमें वो चाय का हिसाब लिखती है — किसने कितनी चाय पी, किसने कितने पैसे दिए, किसका उधार है।

"इसमें क्या लिखूँ?" मैंने पूछा।

"लाइसेंस के जो पैसे लगेंगे," उसने कहा, "उसका हिसाब इसी कॉपी में डाल देना।"

मैं एक पल के लिए चुप रह गया।

"आपा—"

"मैं बात पूरी कर लूँ पहले," उसने कहा, और समोसे वाली प्लेट सरका दी। "मैंने गुमटी पर कल रात हिसाब देखा। पिछले साल से जो पैसा बचा रखा था — साड़ी के लिए, अपने लिए, जो भी था — वो अलग है। ये उससे नहीं जाएगा। ये मैंने चाय वालों से जोड़कर अलग रखा है।"

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