The Mysterious Bell291 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 291

7 min read November 5, 2026

"अंकुश यादव?"

मैंने कुछ नहीं कहा।

"अंकुश यादव?" आवाज़ फिर आई, और इस बार थोड़ी तेज़। "थाने से आए हैं। शिकायत हुई है।"

मैंने धीरे से जेब में हाथ डाला और घंटी उँगलियों में पकड़ ली।

ठंडी थी।

पर जिस पल मेरी उँगलियों ने उसे छुआ, मुझे लगा — नहीं, ये वहम था — कि उस पीतल में एक बहुत हल्की सी गुनगुनाहट है, बस उतनी जितनी किसी सोते हुए आदमी की साँस होती है।

बाहर दस्तक नहीं हुई।

शायद उन्हें इंतज़ार था कि मैं खुद आकर शटर उठाऊँ।

और मैं उठकर खड़ा हो गया — पर शटर की तरफ़ नहीं, मेज़ की तरफ़, जहाँ मीरा का कैमरा, पुरानी कतरन और पीली फाइल रखी थीं।

क्योंकि मुझे लगा कि अगर ये शिकायत मेरे ख़िलाफ़ है, तो काग़ज़ उनके पास है। और अगर काग़ज़ उनके पास है, तो मेरे पास भी कुछ होना चाहिए।

मैंने पीली फाइल उठाई।

और फिर मैं शटर की तरफ़ बढ़ा।

"आ रहा हूँ," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ पहली बार उस पूरी रात में साफ़ निकली। "पर एक बात पहले सुन लो — ये दुकान मेरी है, और अगर शिकायत मेरे ख़िलाफ़ है, तो अंदर आकर बताओ। शटर के बाहर से मैं कोई बात नहीं सुनता।"

बाहर दो आवाज़ें फुसफुसाईं।

फिर वो आवाज़ आई —

"शटर उठाओ।"

॥

"शटर उठाओ।"

मैंने हाथ बढ़ाया। शटर का कुंडा ठंडा था, जैसे रात ने उसे भी अपनी तरफ़ खींच लिया हो। मैंने कुंडा खोला, शटर को कंधे से धक्का दिया, और वो ऊपर गया — चरचराता हुआ, धूल झाड़ता हुआ, और साथ में वो पुरानी आवाज़ निकालता हुआ जो सिर्फ़ बीस साल पुराने शटर ही निकालते हैं।

बाहर का अंधेरा सीधे मेरी आँखों में आ गया।

और उस अंधेरे के बीच, गली की एकमात्र जलती बत्ती के नीचे, तीन आदमी खड़े थे।

आगे वाला आदमी मेरे कंधे जितना ऊँचा था, पेट थोड़ा आगे, कमर पर पेटी कसी हुई, और मूँछ इतनी घनी कि लगा जैसे उसने अपने चेहरे पर अलग से एक हिस्सा लगा रखा है। उसके एक हाथ में मोटा काग़ज़ था, जो दो जगह से मोड़ा हुआ था, और दूसरे हाथ में छोटी टॉर्च, जिसकी रोशनी उसने सीधे मेरे चेहरे पर डाल रखी थी।

पीछे दो और आदमी थे। दोनों खाकी में, दोनों चुप, दोनों के हाथ पीछे बँधे हुए — वो हाथ जो कुछ नहीं करते, पर हर वक़्त ये बताते रहते हैं कि वो कुछ कर सकते हैं।

"अंकुश यादव?" आगे वाले ने पूछा।

"जी," मैंने कहा। "पर साहब, टॉर्च ज़रा नीचे कर दीजिए। मैं आपका चेहरा देखना चाहता हूँ, आपकी टॉर्च नहीं।"

टॉर्च नीचे हुई। और चेहरा दिखा — दरोगा जी। पहचाना नहीं मैंने, पर पहचानना ज़रूरी भी नहीं था। उस पेटी की कसावट और उस काग़ज़ को पकड़ने के तरीक़े से ही पता चल रहा था कि ये आदमी बात नहीं करने आया है, बताने आया है।

"दरोगा जी," उसने खुद बताया, जैसे तारीफ़ कर रहा हो। "आपके ख़िलाफ़ शिकायत आई है।"

"रात ग्यारह बजे?"

"शिकायत का वक़्त नहीं होता," उन्होंने काग़ज़ खोला। "काम का होता है।"

उन्होंने काग़ज़ पढ़ना शुरू किया, और उनकी आवाज़ में वो लय थी जो सरकारी काग़ज़ों में ही आती है — जैसे हर शब्द के आगे एक मुहर लगी हो।

"आपकी दुकान बिना लाइसेंस चल रही है। बिना इजाज़त आपने दुकान पर लोग इकट्ठे किए। लोगों के अंगूठे लिए गए। गली में आपने ऐसा माहौल बनाया कि लोगों में डर और बेचैनी फैली।"

वो रुके और मेरी तरफ़ देखा।

"ये आरोप हैं। समझ रहे हो?"

"समझ रहा हूँ, साहब," मैंने कहा।

"तो बोलो, क्या कहना है?"

मैंने एक गहरी साँस ली। मेरे पीछे, दीवार पर, घंटी टँगी थी — चुप। मेरे सीने में कुछ ऐसा उठ रहा था जो डर नहीं था, बस थकान थी, और थकान बोलती है।

"साहब," मैंने कहा, "लाइसेंस नहीं है, तो क्या हुआ। पंचर तो मैं असली ही लगाता हूँ।"

दरोगा जी का चेहरा सख़्त हो गया। एक इंच भी नहीं हिला, पर उस पर जो लकीरें थीं, वो चारों तरफ़ खिंच गईं।

"तेरी हिम्मत कैसे हुई?" उन्होंने कहा, और आवाज़ धीमी थी, जो और भी बुरा था। "मैं आधी रात को तेरी दुकान के सामने खड़ा हूँ, मेरे हाथ में काग़ज़ है जिस पर चार लोगों के अंगूठे हैं, और तू मुझसे मज़ाक कर रहा है?"

"साहब, मज़ाक नहीं—"

"मज़ाक मैं समझता हूँ," उन्होंने कहा। "पैंतीस साल से समझता हूँ। और मैं ये भी समझता हूँ कि जो आदमी मज़ाक करता है, वो या तो बहुत निर्दोष है, या बहुत होशियार। और तेरे जैसे लड़के के लिए निर्दोष होना बहुत महँगा पड़ता है।"

पीछे वाले दोनों खाकी आदमियों ने मेरी दुकान को देखा — शटर का आधा हिस्सा, अंदर का बल्ब, दीवार पर टँगे औज़ार, फर्श पर पड़ा पंचर वाला टब।

उनमें से एक ने कहा, "साहब, ये दुकान पहले से ही चल रही है। रजिस्टर में नाम भी नहीं है।"

"बोलने की ज़रूरत नहीं," दरोगा जी ने कहा, बिना पलटे।

मैंने एक पल के लिए सोचा कि क्या कहूँ। मेरे अंदर कुछ कह रहा था — लाइसेंस ले लो, बात आगे न बढ़ाओ, ये रात नहीं, ये साल है जो अभी शुरू हो रहा है। और मेरे अंदर कुछ और भी कह रहा था — तू झुका तो सब झुक जाएंगे।

और तभी मुझे पीछे कुछ हिलता दिखा।

पीछे वाले कमरे का पर्दा, थोड़ा सा हटा, और उसमें से टिंकू का आधा चेहरा झाँक रहा था। उसकी आँखें बड़ी थीं, उसके होंठ कुछ कहने के लिए खुले थे, पर आवाज़ नहीं निकली। उसने दरोगा जी की पेटी देखी, पीछे खड़े दो खाकी को देखा, और फिर पर्दा जैसे अपने आप बंद हो गया।

मुझे लगा कि अगर मैं आज इस शटर के सामने झुक गया, तो उस पर्दे के पीछे से झाँकने वाला लड़का कल से झाँकना बंद कर देगा।

"साहब," मैंने कहा, "काग़ज़ दिखा दीजिए। मैं पढ़ लूँ।"

"पढ़ ले," उन्होंने काग़ज़ आगे बढ़ाया, पर मेरे हाथ में नहीं दिया। "ऐसे ही पढ़ ले।"

मैंने काग़ज़ देखा। ऊपर तारीख़ थी, कल की। नीचे शिकायत की पंक्तियाँ — बिना लाइसेंस, बिना इजाज़त, अंगूठे लेना, डर फैलाना। और सबसे नीचे दस्तख़त।

और जब मैंने दस्तख़त पढ़ा, तो घुटने के पीछे की मेरी नस किसी ने खींच दी।

क्योंकि वो नाम मैंने पहले पढ़ा था।

पापा के पुराने काग़ज़ों में।

"दरोगा जी," किसी ने कहा मेरे पीछे से।

आवाज़ धीमी थी, जैसे बहुत सालों की चुप्पी के बाद निकली हो। मैं पलटा।

दुबे अंकल। नीली शर्ट, बटन ऊपर तक बंद, बाल सफ़ेद, हाथ में कुछ नहीं — जब आदमी के हाथ में कुछ न हो, तो पुराने सिपाही की सबसे बड़ी ताक़त वही होती है।

"दुबे अंकल," दरोगा जी ने कहा, और उनकी आवाज़ का ताप एक डिग्री गिर गया। "आप यहाँ?"

"मैं यहीं रहता हूँ," दुबे अंकल ने कहा। "पैंतीस साल से। और तुम बीस साल से शहर के दूसरे हिस्से में। पर कोई बात नहीं। तुम आए हो, तो चलो, पीपल के नीचे चलो।"

"अंकल, मेरे पास काग़ज़ है—"

"मुझे दिख रहा है," उन्होंने कहा। "चलो।"

और दरोगा जी चले।

सिर्फ़ इसलिए नहीं कि दुबे अंकल पुराने हैं। इसलिए भी कि उस आवाज़ में वो चीज़ थी जिसे लोग ऐसे ही नहीं मोड़ते। दुबे अंकल पीपल की तरफ़ बढ़े, मैं पीछे रह गया, पर उन्होंने बिना पलटे हाथ उठाया और इशारा किया — आ जा।

हम तीनों पीपल के नीचे खड़े थे। पत्थर की चबूतरी ठंडी थी, और उस पर रात की ओस पड़ी थी। दुबे अंकल ने दरोगा जी से काग़ज़ माँगा। दरोगा जी ने एक पल सोचा, फिर दिया।

दुबे अंकल ने काग़ज़ दोनों हाथों से पकड़ा, उसे बत्ती के नीचे किया, और देर तक देखा।

"ये तारीख़ कल की है," उन्होंने कहा।

"जी," दरोगा जी ने कहा। "शिकायत कल दी गई थी।"

"अच्छा," दुबे अंकल ने कहा। "तो अंकुश ने कल लोगों के अंगूठे लिए थे?"

"जी, काग़ज़ में यही लिखा है।"

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