The Mysterious Bell – Chapter 290
सबने मेरी तरफ़ देखा।
उनकी नज़रें मुझ पर थीं, और मैं उन नज़रों में पढ़ सकता था कि सब एक ही बात सोच रहे थे — अंकुश, तू कुछ बोल। तू मीरा की जगह बोल दे। तू कह दे कि सब ठीक हो जाएगा।
मेरा गला सूख रहा था। मैंने जेब में हाथ डाला और घंटी को एक बार हिलाया — बहुत हल्का, इतना हल्का कि किसी को पता न चले।
कुछ नहीं।
मैंने आँखें बंद कीं, एक पल के लिए, और सोचा — तू होती तो क्या कहती? और जवाब नहीं आया। और यही सबसे डरावना था, कि अब मुझे अपना ही सवाल खुद सुलझाना था।
मैंने आँखें खोलीं।
"मैं मीरा की जगह नहीं बोलूँगा," मैंने कहा।
गली में हल्की सी हलचल हुई।
"मैं क्यों नहीं बोलूँगा, ये सुन लो।" मैंने अपनी आवाज़ को सँभाला, क्योंकि वो काँप रही थी। "मीरा ने पाँच साल पहले एक आधी खबर लिखी थी। उस खबर से रमा मैडम का घर टूटा। और आज अगर मैं उसकी जगह खड़े होकर कह दूँ कि सब माफ़ कर दो, तो मैं वो आधी खबर फिर लिख रहा होऊँगा — बस इस बार मीरा के नाम पर। उसकी मरज़ी के बिना। ये नहीं करूँगा।"
सरोज ने कहा, "तो काग़ज़ खुलेगा।"
"खुलेगा," मैंने कहा।
वो रुकी।
"अंकुश," उसने कहा, और इस बार उसकी आवाज़ थोड़ी नरम थी, "तू समझ नहीं रहा।"
"मैं समझ रहा हूँ, सरोज बहन," मैंने कहा। "मैं बस इतना कह रहा हूँ कि जो सच है, वो किसी के बोलने से सच नहीं होता, और किसी के न बोलने से झूठ नहीं हो जाता। काग़ज़ खुले या न खुले, मीरा पाँच साल से रोज़ उस खबर को अपने अंदर ढो रही है। वो सज़ा किसी काग़ज़ से कम नहीं होती।"
सरोज ने मेरी तरफ़ देखा, और मुझे लगा कि वो कुछ कहना चाहती है, पर नहीं कहा। वो मुड़ी और गली के किनारे, उसी पत्थर पर जाकर बैठ गई, जहाँ वो दोपहर से बैठी थी। उसने लिफ़ाफ़ा अपनी गोद में रख लिया और अपना हाथ उस पर रख दिया, जैसे कोई बीमार बच्चे के सिर पर हाथ रखता है।
अब दुबे अंकल खड़े हुए।
"बबलू," उन्होंने कहा। "तुम्हारे पास एक काग़ज़ है। पाँच अंगूठों वाला। निकालो।"
बबलू ने पान थूका नहीं, पानदान जेब में डाला, और उसने अपना काला बैग उठाया।
"अंकल," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में फिर वो पुरानी चमक आ गई थी, "वो काग़ज़ अब गली का काग़ज़ नहीं है। वो साहब के दफ़्तर जा चुका है। कल सुबह तक वो सूची में आएगा और फिर ये मामला गली के हाथ से निकल जाएगा। आप कहो तो मैं साहब से कह दूँ कि अंकुश भैया ने अपनी ग़लती मान ली है।"
"तुमने उसे दफ़्तर भेज दिया?" दुबे अंकल ने कहा, और उनकी आवाज़ में पहली बार कुछ टूटा।
"मैंने नहीं भेजा, अंकल," बबलू ने कहा। "वो ख़ुद जा रहा था। काग़ज़ को कोई नहीं रोकता।"
और वो हँसा।
फिर वो अपने स्कूटर की तरफ़ बढ़ा, और उसने स्कूटर की पिछली सीट पर काग़ज़ों की एक मोटी थैली रखी, जो अब तक वहीं पड़ी थी, और मुझे लगा कि वो थैली पूरे वक़्त वहीं थी और मैंने उसे देखा ही नहीं था, क्योंकि मैं अपनी जेब में पड़ी चुप्पी को देख रहा था।
स्कूटर चला।
दुबे अंकल ने एक कदम बढ़ाया। फिर रुक गए।
क्योंकि वो रिटायर थे, और काग़ज़ उनके हाथ में नहीं था, और गली में कोई लिखित शिकायत नहीं थी, और थाने का जवान सो रहा था।
वो रुक गए। और उनका रुकना मुझे ऐसे लगा जैसे कोई दरवाज़ा बंद हो गया हो — धीरे से, बिना आवाज़ के।
लोग धीरे-धीरे उठने लगे।
शबनम आपा ने दीये बुझाए नहीं, वो उन्हें वैसे ही जलता छोड़ गईं, और उनकी लौ में हवा का वो ही कंपन था। बंसी बाबा ने रहमत बाबा का हाथ पकड़ा और उन्हें उठाया। हाफ़िज़ बाबा ने तस्बीह उठाई और उन्होंने पंडित ब्रजकिशोर की लाठी उन्हें थमा दी, बिना कुछ कहे। क़ादिर बाबा ने बद्रीप्रसाद का कंधा थामा।
मैं चबूतरी पर खड़ा रहा और देखता रहा कि गली खाली हो रही है।
सुनीता दीदी मेरे पास आईं।
"अंकुश भैया," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ में अब वो कंपन नहीं था। "मैंने जो कहा, सो कह दिया। अब जो होगा, होगा। बस एक बात — राहुल का दाख़िला।"
"दीदी," मैंने कहा, "दाख़िला अब काग़ज़ से नहीं होगा। अब ये सब जो आज बोला गया है, वो सब जानते हैं। स्कूल का दफ़्तर खुला है, और आज सबके सामने जो सच बोला गया है, वो अब मिट नहीं सकता।"
"तुम ऐसे बोलते हो," उन्होंने कहा, "जैसे तुम्हें कुछ पता हो।"
मैंने कुछ नहीं कहा। सच ये था कि मुझे कुछ पता नहीं था। मुझे बस एक बात पता थी — कि घंटी चुप है, और मैं अब भी खड़ा हूँ।
फिर मैं दुकान लौटा।
मैंने शटर नहीं गिराया। मैंने पीछे वाले कमरे का दरवाज़ा खोला, बल्ब जलाया, और उस गुनगुनाती हुई पीली रोशनी में बैठ गया। मेज़ पर पड़ी थीं — मीरा का कैमरा, पुरानी अख़बार की कतरन, और पीली फाइल। उन तीनों को मैंने नहीं छुआ। मैंने बस उन्हें देखा और सोचा कि कोई आदमी जब जाता है तो अपनी चीज़ें क्यों छोड़ जाता है। क्या इसलिए कि वो लौटना चाहता है, या इसलिए कि वो ये कहना चाहता है कि अब ये तेरी हैं, तेरे पास रखी हैं, देख लेना।
मैंने जेब से घंटी निकाली और मेज़ पर रख दी।
"आज तूने कुछ नहीं कहा," मैंने कहा। "आज मैंने सब कुछ खुद कहा। और सच बताऊँ, आज पहली बार लगा कि तू चुप रहकर भी मेरे साथ थी।"
घंटी चुप।
"पर ये भी सच है," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ धीमी हो गई, "कि आज पहली बार लगा कि अगर तू कल भी चुप रही, तो मैं फिर भी खड़ा रहूँगा। बस ये बता दे — मैं खड़ा किसके लिए रहूँगा? गली के लिए, या अपने लिए?"
और तभी, बाहर गली में, एक आवाज़ आई — स्कूटर की, दूर जाती हुई।
मैंने बल्ब बुझाया और दुकान के सामने आया।
गली के मुँह पर स्कूटर की लाल बत्ती दूर जा रही थी, और धूल में एक आदमी की परछाईं खड़ी थी।
दुबे अंकल।
वो वहीं खड़े थे, चबूतरी से दूर, थाने की तरफ़ का रास्ता देख रहे थे, और उनकी शर्ट की नीली आस्तीन हवा में हिल रही थी।
मैं उनके पास गया।
"अंकल," मैंने कहा।
"अंकुश," उन्होंने कहा, बिना मेरी तरफ़ देखे। "मैं पैंतीस साल इस थाने में रहा। मैंने एक बात सीखी — काग़ज़ आदमी से तेज़ नहीं होता। पर काग़ज़ आदमी से पहले पहुँचता है।"
"अब क्या होगा?"
"अब काग़ज़ पहुँच जाएगा," उन्होंने कहा। "और फिर साहब काग़ज़ की भाषा में बोलेंगे, और उस भाषा में हम सब बहरे हैं।"
वो मुड़े और अपनी कुर्सी की तरफ़ चले, और फिर रुककर बोले, "तू घर जा। आज रात सो जा। और सुन — तेरी घंटी चुप है, ये बात किसी को मत बताना। गली को लगेगा कि तेरा हाथ भी गया।"
"अंकल, गली को पता है।"
"नहीं पता," उन्होंने कहा। "गली को इतना पता है कि तू कुछ बोलता नहीं। बस इतना ही। और ये काफ़ी है।"
मैं दुकान लौटा और कुर्सी पर बैठ गया, दरवाज़े के पास, जहाँ से पूरी गली दिखती है।
रात ग्यारह बजे।
गली में सिर्फ़ दो बत्तियाँ जल रही थीं — एक मेरी दुकान की, एक उस्ताद की दुकान के बाहर की। पीपल का पेड़ अंधेरे में इतना बड़ा लग रहा था कि उसकी छाया गली की चौड़ाई से बाहर निकल गई थी। कहीं दूर एक कुत्ता भौंका, फिर चुप हो गया।
मैंने अपने हाथ अपनी तरफ़ देखे। साफ़ थे। आज दिन भर में मैंने कोई औज़ार नहीं उठाया। मुझे लगा कि अगर मैंने कल भी कोई औज़ार नहीं उठाया, तो ये हाथ लोग किसी और काम के लिए समझने लगेंगे।
और फिर —
तीन ज़ोर की दस्तकें।
ठक। ठक। ठक।
शटर पर।
मैं उठा नहीं। मेरा शरीर कुर्सी पर चिपक गया, जैसे उस दस्तक ने मुझे वहीं सीव दिया हो।
बाहर से आवाज़ आई — मर्द की, थोड़ी भारी, थोड़ी थकी, और उसमें वो लय थी जो काग़ज़ी भाषा में बोलती है।
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