The Mysterious Bell – Chapter 284
"राहुल का दाख़िला नहीं हो रहा था," उसने कहा। आवाज़ बहुत धीमी। "चौदह साल का है, दो साल का पीछा हो गया है पढ़ाई में। मैंने स्कूल में चार चक्कर लगाए। प्रिंसिपल बोले काग़ज़ पूरे नहीं। मैंने कहा साहब, हमारे पास रहने का काग़ज़ नहीं है, किराए के कमरे में रहते हैं, मकान मालिक नाम नहीं देता। वो बोले तो किरायानामा लाओ। किरायानामा बनवाने में तीन महीने लग गए, तब तक दाख़िले की तारीख़ निकल गई।"
उसने मेरी तरफ़ नहीं देखा। नीम के पत्तों की तरफ़ देख रही थी, जैसे वहीं से जवाब मिलेगा।
"फिर एक दिन मैं स्कूल के बाहर खड़ी थी, रो रही थी।" वो रुकी। "एक आदमी की गाड़ी रुकी। उसने कहा — क्या बात है माँ? इतना रोना ठीक नहीं।"
"बबलू।"
"हाँ।" उसने कहा, और वो "हाँ" इतने ज़ोर से बोली कि नीम का पत्ता हिल गया। "और उसने मेरे हाथ में दो हज़ार रुपये रख दिए। कहा — बहन, इससे किरायानामा बनवा लो, आगे का मैं देखूँगा।"
मैंने कुछ नहीं कहा।
"तू पूछेगा ना कि तूने लिए क्यों? ले लिए। देखा तूने? कैसे पूछना है तुझे? तेरे पास दुकान है, तेरे बाप के नाम पर ज़मीन है —"
"दीदी।"
"मेरे पास कुछ नहीं है!" वो चीखी। "मेरे पास बर्तन धोने का काम है, जो कल बंद हो जाएगा। मेरे पास एक बेटा है जो रोज़ पूछता है कि माँ, मैं पढ़ूँगा या नहीं? और मैं उसके सामने हर बार जूता पहनने के लिए झुक जाती हूँ ताकि वो मेरी आँखें न देख सके।"
उसकी आवाज़ टूट गई।
नीम के नीचे दोपहर की गरमी में, उन चार धुले बर्तनों के बीच, वो औरत बैठी रो रही थी और मैं खड़ा था — ये सोचकर कि मुझे क्या कहना चाहिए, और मुझे कुछ भी समझ नहीं आ रहा था।
पीछे गली के मोड़ पर पत्थरों पर किसी के पैर पड़े।
मैंने पलटकर देखा।
मीरा खड़ी थी।
कंधे पर थैला, बाल हवा में, और चेहरे पर वो रंग जो सिर्फ़ तब आता है जब कोई दौड़कर आया हो। वो हाँफ रही थी।
"टिंकू ने बताया," उसने कहा। "कि तू पीछे वाली गली में आया है।"
"मैंने तुझे बुलाया नहीं था।"
"मुझे बुलाने की ज़रूरत नहीं होती, अंकुश।" उसने थैला नीचे रखा। "ये मेरी लड़ाई है। मुझे नहीं चाहिए कि तू मेरी लड़ाई लड़े और मैं घर बैठी रहूँ।"
वो आगे आई और सुनीता के सामने खड़ी हो गई।
कुछ देर तक दोनों ने एक-दूसरे को देखा। एक औरत जो बोलने आई थी, और एक औरत जो चुप हो बैठी थी।
"सुनीता दीदी," मीरा ने कहा। "आपने सभा में कहा था कि मेरे पास सबूत है। आपने कहा था कि मैंने गली के लोगों के दुख बेचे हैं।"
"मैंने कहा था।"
"क्यों?"
"क्योंकि मुझे कहना पड़ा।"
"किसने कहा?"
सुनीता ने मुँह फेर लिया।
मीरा ने घुटने मोड़कर उसके सामने बैठने की कोशिश की, फिर खड़ी ही रही। "दीदी, मैंने पाँच साल पहले एक आधी खबर छापी थी। रमा मैडम का घर उससे बिखरा। उसके पति चले गए, बेटी ने स्कूल बदला। और मैं डरकर चुप हो गई। आज तक उस औरत से माफ़ी नहीं माँगी। इसलिए जब आपने मुझ पर आरोप लगाया, मैं गुस्सा नहीं हुई। मुझे लगा कि सज़ा मिल रही है। सही सज़ा। पाँच साल देर से।"
सुनीता ने उसकी तरफ़ देखा। कुछ नरमी आई, फिर तुरंत कड़ी हो गई।
"तू सज़ा की बात कर रही है?" उसने कहा। "मेरे बेटे का दाख़िला नहीं हुआ, मेरा काम जाता रहा, और मुझे गली वालों ने कह दिया कि तू साहब की चेली है। तेरी सज़ा क्या है? तू काग़ज़ छाप देती है, कल किसी और काग़ज़ पर मेरा नाम छाप देगी। तेरे लिए सज़ा क्या है?"
"आप सही कह रही हैं," मीरा ने कहा। "मेरे लिए सज़ा बहुत कम है। और यही सच है।"
"तो फिर?"
"तो फिर आप मुझे बताइए," मीरा ने कहा, "कि मेरा नाम उस काग़ज़ में किसने लिखवाया? क्योंकि जिस काग़ज़ पर आपका अंगूठा है, उस पर मेरा नाम नहीं होना चाहिए था। उस पर सिर्फ़ ये लिखना चाहिए था कि मीरा ने एक आधी खबर छापी थी।"
सुनीता चुप हो गई।
मैंने बीच में कदम रखा। "दीदी," मैंने कहा। "एक बात सीधी कहूँ?"
"कह।"
"आपका दुख असली है। राहुल का दाख़िला, काम का जाना — ये सब असली है। मैं इस पर सवाल नहीं उठा रहा।"
"तो किस पर उठा रहा है?"
"आरोप पर।" मैंने कहा। "क्योंकि झूठ से बना आरोप किसी घर को नहीं जोड़ता। वो सिर्फ़ दूसरे का घर तोड़ता है और अपने घर में एक दरवाज़ा और बंद कर देता है।"
वो मेरी तरफ़ देखने लगी।
"आज सुबह आपने सोचा होगा कि आपने एक काग़ज़ पर अंगूठा लगाकर अपने बेटे का दाख़िला खरीद लिया," मैंने कहा। "पर वो काग़ज़ किसी दाख़िले का नहीं है, दीदी। वो काग़ज़ कहीं और जाएगा। और जब वो कहीं और जाएगा, तब उस पर एक आदमी का नाम नहीं होगा — पूरी गली का नाम होगा। और उस गली में आपका क्वार्टर भी है।"
"झूठ बोल रहा है।"
"मैं झूठ नहीं बोलता, दीदी।" मैंने कहा। "मुझे बोलना पड़े तो चुप रह जाता हूँ, पर झूठ नहीं बोलता। आप चाहे तो उस्ताद से पूछ लीजिए। आप चाहे तो उस काग़ज़ की नक़ल दुबे अंकल से माँग लीजिए।"
"मैंने काग़ज़ पढ़ा नहीं," उसने कहा। फिर रुकी। "पढ़ नहीं पाई। चश्मा नहीं है। बबलू ने कहा — बस अंगूठा, बहन, बाकी सब मैं देख लूँगा।"
वो चुप हो गई।
और उस चुप्पी में मुझे वो सब दिखा जो वो नहीं बोल रही थी — एक औरत जो सुबह उठती है, बर्तन धोती है, और अपने बेटे के सामने ये नहीं दिखने देती कि आज फिर कुछ टूटा है।
"दीदी," मैंने कहा। "राहुल का दाख़िला मैं करवाऊँगा।"
वो हँसी। एक छोटी, कड़वी हँसी। "तू?"
"मैं।"
"कैसे?"
"पता नहीं," मैंने सच कहा। "पर करवाऊँगा। और जिस दिन करवाऊँगा, उस दिन आप शाम की चाय मेरी दुकान पर पीएँगी। और ये दो हज़ार रुपये उस आदमी को लौटा देंगे।"
"मेरे पास लौटाने को कुछ नहीं है। वो खर्च हो गए।" उसने कहा। "बर्तन धोने वाली औरत क्या करेगी? रोज़ दो रोटी बनाती है। दो हज़ार रुपये किसी औरत के लिए दो रोटी नहीं होते।"
मीरा ने धीरे से कहा, "तो हम मिलकर लौटाएँगे।"
सुनीता ने उसकी तरफ़ देखा।
"तू क्यों लौटाएगी?"
"क्योंकि जिस आदमी ने आपके हाथ में पैसे रखे, उसी ने मेरे नाम पर झूठ लिखवाया," मीरा ने कहा। "मुझे लगता है कि उसका पैसा लौटाना मेरा भी काम है।"
कुछ देर तक कोई नहीं बोला।
फिर सुनीता ने वो कपड़ा उठाया जो रोटियों के ऊपर रखा था। रोटियाँ ठंडी थीं। उसने एक उठाई, देखी, और वापस रख दी।
"जा," उसने कहा। "मुझे कुछ नहीं सुनना।"
"दीदी —"
"जा अंकुश।" उसने मेरी तरफ़ नहीं देखा। "मैंने जो किया सो किया। अब मैं उस पर क्या बोलूँ? मैं माफ़ी माँगूँ? माफ़ी की बात मेरे घर की टूटन से बड़ी नहीं हो सकती। मेरे बेटे का दाख़िला माफ़ी से नहीं आएगा। तेरी माफ़ी से मेरे बर्तन नहीं धुलेंगे।"
"माफ़ी किसी और के लिए नहीं होती," मैंने कहा। "अपने लिए होती है।"
"तो मैं अपने लिए जीना सीख लूँगी," उसने कहा।
मीरा ने उसकी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो सवाल था जो वो ज़ुबान से नहीं पूछ सकती थी। फिर उसने अपना थैला उठाया।
"दीदी," उसने कहा, "मैं आपसे माफ़ी माँगती हूँ। न काग़ज़ के लिए — काग़ज़ तो आपने लगाया ही नहीं ठीक से। मैं उस बात के लिए माफ़ी माँगती हूँ कि मैंने गली के लोगों को ये समझने में मदद की कि मेरे पास सबका दुख लिखा हुआ है। मैंने कभी किसी से पूछा नहीं कि लिख सकती हूँ या नहीं। मैंने बस लिख दिया।"
सुनीता ने कुछ नहीं कहा।
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। "चल?"
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