The Mysterious Bell – Chapter 285
मैंने कैमरा थैले में रखा।
हम मुड़े।
और हमने चार कदम चले होंगे कि सुनीता की आवाज़ आई।
"अंकुश।"
मैं रुका।
वो वहीं खड़ी थी, चार बर्तनों के बीच, नीम की छाया में। दोपहर ढल रही थी और उसकी छाया क्वार्टर की दीवार पर पड़ रही थी — लंबी, एक तरफ़ झुकी हुई, जैसे कोई भार उठाए खड़ा हो।
"आज मैंने पूरा सच नहीं बोला," उसने कहा।
मैं वापस मुड़ा।
"क्या मतलब?"
उसने एक हाथ से साड़ी का पल्लू ठीक किया। "मतलब ये कि बबलू ने सिर्फ़ दो हज़ार रुपये नहीं दिए थे।"
मेरे पीछे मीरा रुकी। मैंने उसकी साँस सुनी।
"और राहुल के दाख़िले की बात भी सिर्फ़ दाख़िले की बात नहीं थी," सुनीता ने कहा। उसकी आवाज़ अब बिल्कुल सपाट थी, जैसे कोई लंबी सड़क खत्म हो रही हो। "बबलू ने मुझसे एक काम करवाया था। मुझे उस दिन रमा मैडम के पास भेजा था।"
मीरा ने धीरे से कहा, "क्या काम?"
"ये कहने को कि मैंने तुझे स्कूल के पास देखा है। कि तू पाँच साल बाद भी आई थी, और उस वक़्त भी पैसों की बात कर रही थी।"
मेरा हाथ जेब में चला गया। घंटी वहाँ थी। ठंडी। चुप।
"तूने रमा से ये कहा?" मीरा की आवाज़ बदल गई — न गुस्सा, न चीख। कुछ और। जैसे किसी ने उसके सामने से ज़मीन खींच ली हो।
"मैंने कह दिया," सुनीता ने कहा। "और रमा ने मेरी बात मान ली। क्योंकि मैं स्कूल में काम करती हूँ, और मैंने कहा कि मैंने अपनी आँखों से देखा है।"
नीम का पत्ता हिला। किसी दूर के क्वार्टर में किसी ने रेडियो चालू किया और बंद कर दिया।
"मीरा," मैंने धीरे से कहा।
वो वहीं खड़ी रही। उसने मेरी तरफ़ नहीं देखा। उसने सुनीता की तरफ़ देखा और बोली —
"तो रमा मैडम जो नहीं बोलतीं… वो सिर्फ़ पाँच साल पुरानी खबर से नहीं है। वो आज की बात से भी है।"
"हाँ," सुनीता ने कहा।
"मैं रोज़ स्कूल के गेट से गुज़रती हूँ," मीरा ने कहा। "और सोचती हूँ कि वो मुझे देखती भी हैं या नहीं।"
"देखती हैं," सुनीता ने कहा। "और मुझे भी देखती हैं। कल से।"
वो मुड़ी और बर्तनों की तरफ़ बढ़ गई। फिर रुकी।
"मैं सात बजे की सभा में आऊँगी," उसने कहा, बिना पलटे। "और मैं वही बोलूँगी जो आज बोला। बस तेरे सामने नहीं — सबके सामने।"
मैंने कुछ कहना चाहा। मगर घंटी बजी।
बहुत धीरे। जैसे किसी ने उसे कपड़े के नीचे दबाकर बजाया हो। और उतनी ही धीमी आवाज़ में तंत्र ने कहा —
"आधा सच, आधा दरवाज़ा।"
फिर चुप।
"क्या बोली?" मीरा ने पूछा।
"कुछ नहीं," मैंने कहा। "घंटी।"
"क्या कहा उसने?"
मैंने जेब से हाथ निकाला। "कहा कि आज एक और दरवाज़ा खुला है। पर आधा। बाकी आधा कल खुलेगा।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। "अंकुश, सात बजे की सभा में वो औरत आएगी। और वो जो बोलेगी, वो रमा मैडम के कानों तक जाएगा।"
"हाँ।"
"और रमा मैडम का वो पाँच साल पुराना काग़ज़ सरोज ला रही है।"
"हाँ।"
"तो फिर?" उसकी आवाज़ में पहली बार वो धार लौटी जो स्टोर में टूट गई थी। "फिर वहाँ क्या होगा?"
मैंने पीछे मुड़कर देखा।
सुनीता दीदी अपने बर्तनों के पास बैठी थी, और उसकी पीठ धूप में चमक रही थी, और वो एक बर्तन को पानी से भरकर फिर खाली कर रही थी — भरना, खाली करना, भरना, खाली करना। जैसे कोई हिसाब जोड़ रही हो जो कभी पूरा नहीं होगा।
"मुझे नहीं पता," मैंने सच कहा। "पर एक बात पता है।"
"क्या?"
"आज सात बजे वहाँ कोई झूठा आरोप नहीं बोलेगा," मैंने कहा। "क्योंकि जिसने लगाया, वो खुद आएगा और अपने हाथ से मिटाएगा। इसी को तो जोड़ कहते हैं।"
वो कुछ देर मेरी तरफ़ देखती रही।
फिर उसने थैला कंधे पर ठीक किया और कहा, "चल, सात बजे से पहले मुझे एक और काम करना है।"
"क्या?"
"रमा मैडम के घर जाना है," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में वो हिम्मत थी जो सिर्फ़ उन लोगों में होती है जिन्होंने अपना सबसे बड़ा डर अभी-अभी खुद बोलकर निकाल दिया हो। "और इस बार मैं अपने साथ एक औरत ले जाऊँगी। सुनीता दीदी को।"
दोपहर ढल चुकी थी। गली के मोड़ पर पीपल की छाया लंबी हो रही थी। दुकान का शटर अभी बंद था, और मुझे याद आया कि आज सुबह से मैंने एक भी साइकिल नहीं छुई। हाथ अब भी साफ़ थे। उँगलियों में ग्रीस नहीं थी।
और ये बात मुझे डरा गई।
क्योंकि जिस दिन मरम्मत करने वाले के हाथ साफ़ रह जाएँ, उस दिन कुछ बड़ा टूट रहा होता है।
मैंने चलते-चलते पीछे देखा।
सुनीता दीदी ने बर्तन उलट दिए थे और वो उठ रही थी। उसकी छाया क्वार्टर की दीवार से हट रही थी।
और मुझे लगा कि उस दीवार पर आज एक दरवाज़ा ज़रूर खुला है — पूरा नहीं, आधा ही सही। पर खुला है।
गली के उस मोड़ पर, जहाँ सूखी नाली पार करनी पड़ती है, मैंने कदम रोके और धीरे से कहा, "तू सुन रही है?"
घंटी चुप रही।
"अच्छा," मैंने कहा। "तो सुन ले। आज शाम मैं सबके सामने बोलूँगा। और मैं झूठ नहीं बोलूँगा। हाँ, ये मुझे पता है कि इसका मतलब क्या है। मेरे पास दो सौ तिरसठ अंक हैं और उनमें से एक भी आज काम नहीं आएगा। फिर भी बोलूँगा।"
घंटी में एक हल्की-सी हरकत हुई — जैसे किसी ने नींद में करवट बदली हो।
फिर वो फिर चुप हो गई।
और मैं, मीरा के साथ, उस गली से बाहर निकला जहाँ सुबह सुनीता दीदी ने एक झूठ पर अंगूठा लगाया था और दोपहर में उसी झूठ ने अपना चेहरा खोल दिया था।
सात बजे से पहले बहुत कुछ होना बाकी था।
पर एक बात तय थी — जो औरत आज सुबह चुप थी, वो शाम को बोलेगी।
और जब वो बोलेगी, तो उसके साथ एक और औरत खड़ी होगी, जिसने पाँच साल बाद पहली बार अपनी सज़ा के बजाय अपना सच चुना था।
॥
सुनीता दीदी के क्वार्टर से निकलकर हम दोनों चुप थे। मीरा आगे चल रही थी, मैं पीछे। बीच में सिर्फ़ नाली की सूखी पट्टी आ रही थी, जिस पर से गुज़रते वक़्त जूते ऐसी आवाज़ करते थे जैसे कोई पुराना दरवाज़़ खुल रहा हो।
मीरा की पीठ देखकर पता चल रहा था कि वो अंदर से काँप रही है। कंधे सीधे थे, पर थैले का पट्टा उसने इतनी ज़ोर से पकड़ रखा था कि उँगलियाँ सफ़ेद पड़ गई थीं।
मैंने कुछ कहना चाहा। फिर सोचा, अभी नहीं।
दोपहर अब भी गली पर बैठी थी, पर उसकी गर्मी ढीली पड़ रही थी। पीपल की छाया पत्थर की चबूतरी से उतरकर आधी गली में फैल गई थी, और छाया के उस किनारे पर बंसी बाबा अपनी लाठी के सहारे बैठे थे। उन्होंने हमें देखा, कुछ नहीं बोले, बस सिर हिलाया — जैसे कह रहे हों, आगे बढ़ो, बैठने का वक़्त नहीं है।
शबनम आपा की गुमटी पर कोयला अभी जल रहा था। चिमटी की टक-टक सुनाई दे रही थी।
गुमटी के बाहर की बेंच पर उस्ताद अली बक़्श बैठे थे और उनके बगल में वो लाठी वाला अनजान आदमी। उसने हमें आते देखा, फिर नज़र नीचे कर ली, जैसे उसे हमारी बात सुननी न हो पर वो सुन रहा हो।
"कहाँ गए थे?" शबनम आपा ने पूछा, चाय का गिलास मेरी तरफ़ बढ़ाते हुए।
"बर्तन धोने वाली औरत से मिलने," मैंने कहा।
"और?"
"और वो बोली।"
शबनम आपा का हाथ एक पल रुका। चिमटी हवा में लटकी रही।
"क्या बोली?"
"जो बोलना चाहिए था," मैंने कहा। "देर से बोली, पर बोली।"
शबनम आपा ने गिलास मेरी हथेली पर रखा और मीरा की तरफ़ देखा। मीरा ने गिलास नहीं लिया। वो सीधी दुकान की तरफ़ बढ़ गई, जहाँ शटर अभी बंद था।
मैंने ताले की चाबी निकाली।
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno