The Mysterious Bell283 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 283

7 min read November 5, 2026

मैंने कैमरा नीचे किया।

स्क्रीन अब भी जगमगा रही थी, तस्वीर खुल रही थी, और जो पहला साया अंदर आया, उसकी आवाज़ में वो सिलाई मशीन जैसी सूखी सादगी थी जिसे मैं तीन साल से सुन रहा था।

"बेटा," उस्ताद अली बक़्श ने कहा। "वो कैमरा रख दे। और ये देख — इस आदमी को तू नहीं जानता, पर ये तुझे बचपन से जानता है।"

॥

"बेटा, वो कैमरा रख दे।"

उस्ताद अली बक़्श की आवाज़ में वो सूखापन था जो सिलाई मशीन के पुराने पुर्ज़ों जैसा होता है — कुछ ऐसा जो सालों से चल रहा हो और अब भी बिना शिकायत चल रहा हो।

मैंने कैमरा नीचे नहीं किया।

"उस्ताद," मैंने कहा, "एक मिनट।"

"सुनता हूँ।"

"ये तस्वीर खुल रही है।"

दरवाज़े की रोशनी में उस्ताद खड़े थे, उनका मोटा चश्मा सूरज में दो पतली लकीरें बना रहा था। उनके पीछे वो आदमी खड़ा था — लाठी हाथ में, कंधे झुके हुए, पैरों में वो पुराने चमड़े के जूते जो किसी ज़माने में अच्छे रहे होंगे। उसके चेहरे पर उमर की लकीरें इतनी गहरी थीं कि लगता था किसी ने चाकू से खींच दी हों।

वो आदमी बोला नहीं। बस खड़ा रहा। पर उसकी आँखें मेरे हाथ में थीं — कैमरे पर, बिल्कुल वैसे, जैसे कोई पुरानी किताब का कोई पन्ना फिर से खुलते देख रहा हो।

स्क्रीन जगमगाई। तस्वीर पूरी खुली।

काले रंग का कुछ — रात का स्कूल का गेट। गेट के पीछे रोशनी का एक पीला धब्बा, जो स्ट्रीट लाइट का था या किसी गाड़ी के हेडलाइट का। और उस रोशनी के किनारे —

मेरी उँगली स्क्रीन पर रुक गई।

दो लोग खड़े थे। एक तो पीछे से दिख रहा था, चौड़ा, और उसके हाथ में कुछ था जो मुझे पहचाना-सा लगा — कोई पतला, लंबा काग़ज़। और उसके बगल में एक औरत थी। सिर पर सूती दुपट्टा, हाथ में सफ़ेद प्लास्टिक का थैला, और उस थैले में से एक कोना बाहर निकला हुआ — जिस पर पीली जिल्द वाली किसी चीज़ का छोर दिख रहा था।

औरत का चेहरा आधा था। पर जो आधा था, वो काफ़ी था।

वो सुनीता दीदी थी।

मुझे कुछ देर यक़ीन ही नहीं हुआ। मैंने स्क्रीन पर उँगली रखकर तस्वीर खींची। कुछ साफ़ हुआ। औरत का कंधा, झुका हुआ — वो झुककर ही किसी से बात कर रही थी। और उसके सामने खड़े आदमी की उँगली में कुछ काला था। काला और गोल।

अंगूठी।

"उस्ताद," मैंने धीरे से कहा। "ये औरत…"

"सुनीता," उस्ताद ने कहा। "जो स्कूल की रसोई चलाती थी। जो बच्चों के बर्तन धोती थी। जिसके हाथ में आज सुबह मैंने एक औरत को पीछे वाली गली में खड़ा देखा था।"

मैंने पीछे वाले आदमी की तरफ़ देखा।

वो अभी भी चुप था। फिर उसने लाठी को ज़मीन पर टेका — धीरे से, जैसे कोई बूढ़ा दरवाज़ा खोलता हो — और बोला, "उसका बेटा राहुल है। चौदह साल का। तीन महीने से स्कूल में दाख़िला नहीं हुआ।"

"तुझे कैसे पता?"

"क्योंकि मैं उस गली में रहता हूँ," उसने कहा। "और मैंने उसे दो बार स्कूल के दरवाज़े से लौटते देखा है। वो काग़ज़ों की तरफ़ देखती है, फिर अपने बेटे की तरफ़, फिर काग़ज़ों की तरफ़। और फिर घूम जाती है।"

उस्ताद ने चश्मा सीधा किया। "बेटा, मैंने तुझसे कहा था — ये आदमी तुझे बचपन से जानता है। ये बात यूँ ही नहीं कही। ये उस वक़्त शहर में नहीं था जब ये सब शुरू हुआ था। ये लौटा है, और जो लौटता है, वो हिसाब लेकर लौटता है। पर आज का हिसाब सुनीता से शुरू होगा, न इससे।"

"उस्ताद, सात बजे की सभा…"

"सात बजे की सभा से पहले तेरे पास छह घंटे हैं," उस्ताद ने कहा। "और उन छह घंटों में सबसे ज़रूरी काम ये है कि तू उस औरत से पूछे कि उसने मीरा पर झूठा आरोप क्यों लगाया।"

"आपको कैसे पता वो झूठा है?"

"क्योंकि सच्ची औरत अपने काग़ज़ में अपने बेटे का दाख़िला नहीं कटवाती," वो बोले। "और सुनीता ने काग़ज़ तीन दिन पहले ही भरा है। मुझे बच्चों की गली से पता चला।"

मैंने कैमरा मेज़ पर रख दिया। मन नहीं कर रहा था, पर बैटरी आधी थी और आँखों के सामने मीरा का चेहरा था — वो चौखट पर हाथ रखकर खड़ा चेहरा, जो कह रहा था कि मैं अब कुछ होने लायक नहीं हूँ।

"टिंकू कहाँ है?" मैंने पूछा।

"बाहर गेट पर, रामलाल के साथ," उस्ताद ने कहा। "बच्चों को मना कर दिया है कि स्कूल की दीवार के अंदर न घुसें।"

"घंटी?"

उस्ताद कुछ नहीं बोले।

मैंने जेब में हाथ डाला। घंटी वहीं थी। ठंडी। चुप। और उस चुप्पी में वो सब नहीं था जो सुबह था। सुबह जैसे कोई साँस रोककर बैठा था। अब जैसे कोई साँस रोककर उठकर खड़ा हो गया हो।

स्टोर के बाहर आँगन में धूप फैली थी। स्कूल खाली था। बच्चे नहीं थे, क्लासों से आवाज़ नहीं आ रही थी, सिर्फ़ एक चिड़िया बार-बार एक ही डाल पर बैठ रही थी और उड़ जा रही थी।

मैं निकला।

स्कूल के पीछे वाली गली में जाते वक़्त सूखी नाली पार करनी पड़ती थी। दोपहर थी और वो गली में पड़ी ईंटें जल रही थीं। मगर सुनीता दीदी के क्वार्टर के बाहर एक नीम था, जिसकी छाया में ठंडक थी। वहीं वो बैठी थी।

चार बड़े एल्युमिनियम के बर्तन धुले पड़े थे, उलटे। उसकी साड़ी का पल्लू घुटनों पर चढ़ा हुआ था, हाथ गीले, और सामने एक छोटी तपेली थी जिसमें दो रोटियाँ रखी थीं — ठंडी, ऊपर से किसी ने कपड़ा डाल दिया था। रोटियाँ उसने खाई नहीं थीं। वो दोनों वैसी ही रखी थीं, जैसे किसी का इंतज़ार कर रही हों।

मैंने पैर की आहट से पहले ही मुँह खोल दिया। "सुनीता दीदी।"

वो उठ गई।

"तू?" उसकी आवाज़ में छुरा था। "तू यहाँ क्यों आया? तेरी दुकान वहाँ है, तेरा पीपल वहाँ है, तेरी मंडली वहाँ है। यहाँ क्या रखा है?"

"आपसे दो बातें करनी हैं।"

"मुझसे बात करने का कोई मतलब नहीं। मैं गली की औरत हूँ, मेरी बात का कोई भाव नहीं। मुझे जो बोलना है, बोल चुकी।"

"आपने क्या बोला?"

"जो सबने सुना।"

मैंने कैमरा जेब से निकाला — नहीं, थैले से, मीरा का थैला जो वो स्टोर में छोड़ गई थी? नहीं, वो अपना थैला ले गई। मैंने कैमरा हाथ में उठाया और स्क्रीन उसकी तरफ़ घुमा दी।

वो देखने लगी। एक पल। दो पल।

फिर उसका हाथ तपेली के ऊपर के कपड़े पर जाकर रुक गया।

"ये क्या है?" उसकी आवाज़ बदल गई। "ये तूने कहाँ से…"

"कल रात का स्कूल का गेट है," मैंने कहा। "मीरा ने खींचा है। उसे पता भी नहीं था कि उसने क्या खींच दिया।"

"मिटा दे।" उसने स्क्रीन पर हाथ रख दिया। "मिटा दे इसे।"

"मिटाऊँगा," मैंने कहा। "पर पहले ये बताइए कि उस रात आप वहाँ क्या कर रही थीं?"

"मैं…" वो पीछे हटी, फिर वो मज़बूती आ गई जो डरे हुए लोगों में आ जाती है — जब इंसान को लगता है कि अब और कुछ बचा नहीं तो गाली दे देना ही एकमात्र सहारा है। "और तू कौन होता है पूछने वाला? तू वही है ना, जो सबके घर का दरवाज़ा खटखटाता है और कहता है — मैं तुम्हारा दुख जानता हूँ? तुझे किसने बुलाया था? किसने कहा था कि तू हमारे दुखों का हिसाब रखेगा?"

"मुझे किसी ने नहीं बुलाया।"

"तो फिर चला जा।"

"पर मुझे मीरा ने बुलाया था," मैंने कहा। "और आपने उस पर आरोप लगाया। मीरा का कोई भी अपना नहीं है इस मोहल्ले में जो उसके लिए खड़ा हो सके, सिवाय उसके कैमरे के। और वो कैमरा आज मेरे हाथ में है। तो दीदी, ये बात आपको मुझसे सुननी पड़ेगी।"

वो खड़ी रही। उसका होंठ काँपा।

फिर वो बैठ गई — धड़ाम से, जैसे पैरों ने कह दिया हो कि अब नहीं।

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