The Mysterious Bell – Chapter 282
"मैंने वो लिख दिया जो सबसे आसान था।" उसने सामने फ़र्श की तरफ़ देखा। "रमा मैडम के घर में उस दिन कोई मेहमान आया था। उस पर एक बात उठी, जो मेरे लिखने के बाद और बड़ी हो गई। सच ये था कि उस बात का सबूत किसी के पास नहीं था। पर मेरे लिखने के बाद लोगों के लिए सवाल नहीं बचा।" उसने हथेली की धूल झाड़ी। "उसकी बेटी ने स्कूल बदल लिया। उसके पति ने घर छोड़ दिया। और मेरे एडिटर ने मुझे बुलाकर कहा — बेटा, अब तुम जैसे काग़ज़ नहीं लिखोगी। मैंने उस दिन से एक ही बात पक्की की — अब कोई खबर आधी नहीं छपेगी। इसीलिए मैं हर छोटी बात के पीछे पागलों की तरह दौड़ती हूँ।"
वो उठी। फ़र्श पर बैठे-बैठे उसके पैर सुन्न हो गए थे, वो दीवार का सहारा लेकर खड़ी हुई।
"अब तू वो कह जो तुझे कहना है," उसने कहा। "कि माफ़ी माँग लो, सब जुड़ जाएगा।"
"नहीं," मैंने कहा। "मैं वो नहीं कहूँगा।"
"तो?"
"मैं इतना कहूँगा कि सच बोलने और माफ़ी माँगने से सब कुछ वापस नहीं आता।" मैं भी खड़ा हो गया। "रमा का घर वापस नहीं आएगा। उसकी बेटी का वो साल वापस नहीं आएगा। तेरी वो पहली नौकरी वापस नहीं आएगी। और मैं तुझसे झूठ नहीं बोलूँगा — मैंने जो चीज़ें टूटी देखी हैं, उनमें से कुछ आज भी टूटी पड़ी हैं।"
"फिर क्या फ़ायदा?"
"फ़ायदा ये है कि टूटा हुआ जुड़ भी सकता है।" मैंने उसकी तरफ़ एक कदम बढ़ाया। "पर वो तभी जुड़ता है जब दोनों अपनी मर्ज़ी से एक सच्ची बात कहें। डर से कहा हुआ माफ़ कर दिया मुझे नहीं चाहिए। तेरे आँसुओं से कहा हुआ नहीं चाहिए। मुझे वो चाहिए जो तू ख़ुद सोचकर बोले।"
वो मेरी तरफ़ देखने लगी। उसकी आँखों में कुछ बदला।
"तू समझता है कि हर टूटी चीज़ जुड़ने लायक होती है?" उसने पूछा, और आवाज़ में पहली बार कुछ तेज़ आया। "तू मेरी दुकान पर आया था ना उस दिन? मैंने तुझे अपना कैमरा दिखाया था। तूने कहा था — इस लेंस पर खरोंच है। मैंने कहा, ठीक हो जाएगी। तू क्या बोला था?"
"मैंने कहा था — लेंस ठीक हो जाएगा, पर खरोंच की जगह पर तस्वीर थोड़ी टेढ़ी आएगी," मैंने कहा।
"हाँ। और मैंने तुझे यही बात तब भी कही थी — कुछ चीज़ें टेढ़ी हो जाती हैं, सीधी नहीं होतीं। तू उनके आस-पास काम करता है, बस।" उसने मेरी तरफ़ उँगली उठाई। "तो आज वही सुन ले। जो मेरे हाथ से टेढ़ा हुआ है, वो सीधा नहीं होगा। रमा मैडम उस दिन से मुझसे नहीं बोली हैं। और जानता है क्या? वो मुझसे नहीं बोलीं, पर आज भी जब स्कूल आती हैं तो जानती हैं कि मैं पीछे खड़ी हूँ। वो जान-बूझकर मुड़ती नहीं। ये माफ़ी है या सज़ा है, मुझे नहीं पता।"
"तूने उनसे माफ़ी माँगी?"
"तीन महीने तक हर रोज़। फोन किया, गई, खड़ी रही। एक दिन उन्होंने दरवाज़ा खोला और बोलीं — जाओ, बेटा।" मीरा ने नीचे देखा। "बेटा कहकर भुला दिया। और वो शब्द आज तक मेरे अंदर चुभता है, क्योंकि वो शब्द 'अब कुछ नहीं हो सकता' का दूसरा नाम था।"
मैंने उसे देखा।
"और मैं तेरी बात मान लूँगा," मैंने कहा। "सब कुछ नहीं जुड़ता। पर आज तक जो भी जुड़ा है, वो भी तो टूटा ही था। बंसी बाबा और रहमत बाबा पैंतालीस साल से नहीं बोलते थे। आज वो साथ बैठकर चना खा रहे थे। चाचा इब्राहीम और बृजमोहन बाबा चालीस साल अलग बैठे थे। आज उनके बीच सिर्फ़ एक पत्थर का फ़ासला है, और वो भी बैठने का। उस्ताद का भाई आज भी उनसे नहीं मिला, पर याद है क्या — मीरा, उस्ताद ने पचास साल बाद अपने भाई की घंटी दूर से सुनी और उनकी आँखें भर आईं। उनके बीच कुछ नहीं जुड़ा। फिर भी कुछ जुड़ गया।"
मीरा ने कुछ नहीं कहा। उसने बगल में रखा कैमरा उठाया और उसे दोनों हाथों से पकड़कर देखने लगी। उसकी उँगलियाँ लेंस के खरोंच वाली जगह पर रुकीं।
"तेरे पास क्या है इस वक़्त?" उसने पूछा।
"क्या मतलब?"
"घंटी।" उसने ठुड्डी उठाई। "आज सुबह से चुप है?"
मैं कुछ नहीं बोला।
"मैंने तुझे आज चबूतरी पर देखा था," उसने कहा। "तूने एक बार भी जेब में हाथ नहीं डाला। बाक़ी दिनों में तू बात करते-करते भी जेब छू लेता था। आज नहीं छुई। इसका मतलब वो चुप है।"
"हाँ," मैंने कहा। "सुबह से चुप है।"
"तो फिर तू मेरे पास क्यों आया? अगर वो चुप है तो तू भी चुप हो जाना चाहिए ना? बैठ जाना चाहिए दुकान पर, और इंतज़ार करना चाहिए कि सब अपने आप ठीक हो जाए।"
"क्योंकि वो चुप है, इसीलिए आया हूँ।" मैंने कुर्सी पर रखा हाथ हटाया। "आज सुबह से मैं उसकी आवाज़ सुनने के लिए कान लगाए बैठा हूँ। वो नहीं बोल रही। तो मुझे लगा कि शायद आज मुझे बोलना है। और मैं बोल रहा हूँ।"
मीरा ने कैमरा उठाया।
वो मेरे पास आई। उसके क़दम फ़र्श पर बज रहे थे। उसने कैमरा सीधे मेरे हाथ में रख दिया। मेरी उँगलियों ने उसे पकड़ लिया — ठंडा, भारी, और उसकी गर्मी अभी भी उस पर थी।
"इसकी बैटरी आधी है," उसने कहा। "दो दिन पहले चार्ज किया था।"
"मीरा।"
"इसमें आख़िरी तस्वीर देख ले।" उसने एक पल मेरी आँखों में देखा। "आज सुबह की नहीं। कल रात की। जिस वक़्त मैं स्कूल के गेट से लौटी थी और समझ नहीं पा रही थी कि किसे क्या बताऊँ।"
"क्या है उसमें?"
"देख ले। और उसके बाद," उसने थैला उठाया और कंधे पर डाला, "मुझे मत बुलाना। सात बजे की सभा में भी मत बुलाना। मैं नहीं आऊँगी। और जो नाम मैंने काटा है, वो कटा ही रहेगा।"
वो दरवाज़े की तरफ़ बढ़ी।
"मीरा।"
वो रुकी। दरवाज़े की चौखट पर हाथ रखकर, मुँह बाहर की तरफ़।
"तेरे थैले में रमा के नाम का लिफ़ाफ़ा है," मैंने कहा। "पाँच साल पुराना। बंद।"
"है।"
"खोलेगी?"
"नहीं।" उसने सिर हिलाया। "वो लिफ़ाफ़ा मैंने इसलिए लिखा था कि किसी दिन ये सब कह दूँगी। पर अब मैं जानती हूँ कि कुछ बातें कहने से नहीं, होने से ठीक होती हैं। और मुझे नहीं लगता कि मैं अब कुछ होने लायक हूँ।"
"ये तेरा डर है, सच नहीं।"
"तो ये भी मेरा है।" उसने मुड़कर देखा, और उस वक़्त उसके चेहरे पर वो पुरानी मीरा दिखी — जिसकी ज़ुबान में सिर्फ़ सवाल नहीं, धार भी थी। "तू किसी और को सच्चाई के नाम पर माफ़ी माँगते देखता है, अंकुश। एक बार मुझे अपनी शर्तों पर रहने दे।"
वो बाहर निकल गई।
उसके क़दम आँगन की मिट्टी पर बजे, फिर ख़त्म हो गए।
मैं स्टोर में अकेला रह गया।
फ़र्श पर काग़ज़ पड़े थे। उनमें से कुछ मेरे पैरों के नीचे आ रहे थे। हवा बंद थी। दरवाज़े की रोशनी ज़मीन पर एक लंबा चौकोर टुकड़ा बना रही थी, और काग़ज़ों की धूल उस रोशनी में धीरे-धीरे नाच रही थी।
मैंने जेब में हाथ डाला।
घंटी वहाँ थी। चुप।
पर अब उसकी चुप्पी में कुछ अलग था। जैसे कोई साँस रोककर बैठा हो — बोल नहीं रहा, पर जा भी नहीं रहा।
मैंने कैमरा उठाया।
अंदर आने वाली रोशनी में उसकी स्क्रीन काली दिख रही थी। मैंने पीछे का बटन दबाया। स्क्रीन धीरे से जगमगाई, और उस पर एक तस्वीर खुल गई — फ़ोकस में नहीं, पूरी नहीं, जैसे किसी ने काँपते हाथ से बटन दबाया हो।
मैंने कैमरा अपनी आँखों के सामने उठाया।
और स्टोर के बाहर, स्कूल के आँगन में, किसी ने बहुत धीरे से पत्थर पर लाठी टेक दी — लक। फिर एक और — लक।
मैंने सिर उठाया।
दरवाज़े की रोशनी में एक परछाई खड़ी थी। लाठी वाली परछाई। और उसके साथ एक और, जिसके हाथ में कुछ था जो सूरज में नहीं चमक रहा था, पर उसका साया दीवार पर पड़ रहा था।
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