The Mysterious Bell – Chapter 281
"अंदर है," उसने कहा। "आधा घंटा पहले आई। बैग लिए। मैंने पूछा तो बोली — कुछ काग़ज़ देखने हैं। तब से नहीं निकली।"
"स्कूल बंद है?"
"आज से बंद है। बच्चे नहीं आए। छत पर ताला लगा है। सिर्फ़ पुराना सामान पड़ा है अंदर।"
मैं आँगन से गुज़रा। नीम का पेड़ ख़ाली खड़ा था। उसके नीचे उसकी परछाई बैठी थी, बस। जिन बेंचों पर बच्चे बैठते थे, वो अब भी वहीं थीं, पर उन पर किसी की क़िताब नहीं थी। छत से प्लास्टर गिरने की जगह अब भी खुली थी, और उस जगह को देखकर मुझे अपनी जेब में पड़ी चाबी की याद आई — वो तीसरी चाबी, जो टिंकू के मोज़े में थी और अब मेरे पास थी।
पीछे वाला स्टोर का कमरा।
दरवाज़ा खुला था। अंदर से धूल, पुराने काग़ज़ और नमी की गंध आ रही थी। मैंने दरवाज़े पर हाथ रखा और अंदर झाँका।
मीरा फ़र्श पर बैठी थी।
घुटने मोड़कर, पीठ अलमारी से टिकाकर। उसके चारों तरफ़ काग़ज़ बिखरे थे — कुछ खुले रजिस्टर, कुछ फटे पन्ने, कुछ ऐसे बंडल जिनकी जूट की रस्सी खुली पड़ी थी। उसका कपड़े का थैला एक तरफ़ खुला था। कैमरा उसके बगल में फ़र्श पर रखा था, लेंस के ऊपर का ढक्कन भी नहीं लगा था।
उसके बाल बिखरे थे। क़मीज़ की एक बाँह पर धूल थी। आँखें लाल थीं, पर वो रो नहीं रही थी। और मुझे यही सबसे ज़्यादा डरावना लगा — जो औरत रो दे तो समझ आता है कि दर्द कहाँ है। जो रोए बिना बैठी हो, उसका दर्द पता नहीं चलता।
"मीरा।"
उसने सिर नहीं उठाया।
"तू आ गया," उसने कहा। आवाज़ सपाट थी, जैसे किसी और की आवाज़ हो।
"आ गया।"
"मैंने सोचा था तू नहीं आएगा। तू उन लोगों से बात करने में लगा होगा जो तेरे पीछे पड़े हैं।"
"उनसे बात हो गई।" मैं अंदर आया और उसके सामने वाले पुराने मोड़े पर बैठ गया। मोड़ा हिला, तो मैंने संभाल लिया। "अब तेरी बारी है।"
उसने एक काग़ज़ उठाया, देखा, फिर वापस फ़र्श पर रख दिया। जैसे मैं वहाँ हूँ ही नहीं।
"मैं तेरी मदद नहीं कर सकती," उसने कहा।
"क्यों?"
"क्योंकि जो दाग़ मेरे हाथ से लगा है, उसे तेरे हाथ से नहीं मिटाया जा सकता।"
"मैं दाग़ मिटाने नहीं आया।"
"तो क्या करने आया है?" उसने पहली बार सिर उठाया। आँखों में गुस्सा नहीं था, थकान थी। "तू आया है मुझसे ये कहने कि सच बोल दे, सब ठीक हो जाएगा? सब ठीक नहीं होता, अंकुश। तू रोज़ सुबह चबूतरी पर यही सिखाता है — माफ़ी माँग लो, भरोसा जोड़ लो। पर कुछ चीज़ें माफ़ी के बाद भी टूटी रहती हैं।"
"मुझे पता है।"
"नहीं, तुझे पता नहीं है।" उसने घुटने सीधे किए और पीछे झुककर अलमारी से पीठ टिका दी। "तूने कभी किसी का घर टूटते नहीं देखा। तूने कभी उस आदमी की आँखें नहीं देखीं जो अपना सामान बोरे में भरकर चुपचाप चला जाता है। मैंने देखा है। मैंने अपने हाथ से लिखकर देखा है।"
कमरे में धूल की महक गहरी हो गई।
मैंने जेब में हाथ डाला। घंटी वहाँ थी। ठंडी। आज सुबह से बिल्कुल चुप। मुझे उसकी चुप्पी की आदत नहीं थी, और मैं उस चुप्पी की बात मीरा से नहीं कहना चाहता था। उसका अपना दर्द कम नहीं था, उसमें अपनी चीज़ें मिलाना मुझे ठीक नहीं लगा।
"मीरा," मैंने कहा, "मैं तुझसे ये नहीं कहूँगा कि सब ठीक हो जाएगा। और मैं ये भी नहीं कहूँगा कि तेरा दाग़ धुल जाएगा। मैं सिर्फ़ इतना कह रहा हूँ — जो सच तूने अब तक अपने अंदर बंद कर रखा है, उसे एक बार बाहर निकाल। मेरे सामने। अगर तू उसे नहीं निकालेगी तो वो अंदर सड़ता रहेगा, और तू हर रोज़ उसकी बदबू लेकर उठेगी।"
"तू डॉक्टर है?"
"नहीं। मैं साइकिल वाला हूँ। मैं टूटी चीज़ें देखता हूँ। और मैंने एक बात सीखी है — टूटी चीज़ अंदर से कभी ठीक नहीं होती, चाहे ऊपर से तू उसे नए रंग से पोत दे।"
वो हँसी। एक छोटी, कड़वी हँसी।
"तू बहुत अच्छी बातें करता है," उसने कहा। "इसीलिए लोग तेरे पास आते हैं। पर तू ये मत सोचना कि तेरी बातों से मेरी रातें कम हो जाती हैं।"
"मेरी बातों से नहीं। मैं तो सिर्फ़ दरवाज़ा खोल रहा हूँ। अंदर से तू निकलेगी।"
वो चुप हो गई।
उसके बगल में एक बंद लिफ़ाफ़ा पड़ा था। पुराना, पीला, कोने से मुड़ा हुआ। उस पर रमा का नाम लिखा था। वो लिफ़ाफ़ा पाँच साल से उसके थैले में था और आज भी डाक में नहीं पड़ा था। मैंने उसकी तरफ़ नहीं देखा — ये जानता था कि हर चीज़ को उँगली से छूकर नहीं देखा जाता।
"तूने मेरा नाम सूची से क्यों काटा?" मैंने सीधा पूछा।
वो एक पल रुकी।
"यही पूछने आया है?"
"हाँ।"
"बस?"
"बस।" मैंने कंधे उचकाए। "बाक़ी सब तू ख़ुद बताएगी।"
उसने अपने घुटनों पर रखी क़िताब बंद की। उसका हाथ काँप रहा था — बहुत हल्का, पर मैं उसे देख रहा था। जब इंसान सच बोलने वाला होता है तो उसके हाथ पहले बोलते हैं।
"मैंने तेरा नाम इसलिए काटा," उसने कहा, "क्योंकि मैं जानती हूँ कि अगर ये लड़ाई हारी गई, तो सब एक ही काग़ज़ पर लिखा जाएगा। तेरा नाम, मेरा नाम, उस्ताद का नाम, शबनम आपा का नाम — और उस काग़ज़ के नीचे लिखा होगा कि ये लोग झूठे थे।"
"तो नाम काटने से क्या बच गया?"
"कुछ नहीं बचा।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "पर मैं ये नहीं चाहती थी कि जिस दिन मेरा सच खुले, उस दिन तेरा नाम भी साथ में कीचड़ में हो। मैं जानती हूँ मेरा सच क्या है। मैं जानती हूँ कि उस सच में सिर्फ़ मैं हूँ, और मेरे साथ कोई और नहीं होना चाहिए।"
"ये तूने मुझसे पहले क्यों नहीं कहा?"
"क्योंकि तब तक मैं ख़ुद से कहने की हिम्मत नहीं कर पाई थी।"
मैंने कुछ नहीं कहा।
वो आगे झुकी और काग़ज़ों के बीच से एक पुरानी क़िताब उठाई। उसके पन्नों के बीच से एक कतरन निकली, फिर कुछ और काग़ज़, और वो सब वापस रखने लगी — जैसे हाथ को काम देना ज़रूरी हो, वरना हाथ कुछ और कर बैठें।
"मैं बताती हूँ," उसने कहा। "पूरा नहीं बता पाऊँगी। पर जितना हाँ, वो सुन।"
"सुन रहा हूँ।"
"पाँच साल पहले की बात है। मैं उस वक़्त यही चैनल नहीं चलाती थी। मैं एक अख़बार में नई थी। महीने भर की नौकरी थी। छोटे-छोटे काम मिलते थे — किसी का जन्मदिन, किसी का शैक्षिक कार्यक्रम, कोई सड़क बनने की खबर। और एक दिन मुझे यही स्कूल भेजा गया। किसी अधिकारी का दौरा था, कुछ नया स्कूल बनने की बात थी।"
उसने काग़ज़ एक तरफ़ सरकाया।
"मैं गेट के पास खड़ी थी, टाइम देख रही थी। तभी भीतर से दो आदमी आए। एक आदमी लंबा था, सफ़ेद कुर्ता, पीली फ़ाइल हाथ में। दूसरा नहीं था। या शायद था भी तो मैंने देखा नहीं। मैंने सिर्फ़ एक चीज़ देखी — उस लंबे आदमी की उँगली में एक काली अंगूठी।"
मेरी साँस रुकी।
"तूने उसे देखा था?" मैंने पूछा।
"देखा था।" उसकी आवाज़ दब गई। "और मैंने आँखें बंद कर लीं।"
"क्यों?"
"क्योंकि उस वक़्त एक कार आ रही थी और मैं उसके सामने खड़ी थी, और मेरी पहली सोच यह थी कि कहीं मुझे इसी वजह से नौकरी से न निकाल दें।" उसने आँखें बंद कीं। "मैं एक लड़की थी जिसे डर था कि अगर मैंने सही सवाल पूछा तो कल से अख़बार का दरवाज़ा बंद हो जाएगा। मैंने आँखें बंद करके दो कदम पीछे हट गई। और जब मैंने आँखें खोलीं, दोनों जा चुके थे।"
कमरे में एक लंबी ख़ामोशी बैठ गई। मुझे बाहर के आँगन से किसी चिड़िया की आवाज़ सुनाई दी, फिर कुछ नहीं। धूल हवा में लटकी हुई थी।
"और फिर तूने वो लिख दिया जो तुझे दिखा, न कि जो तूने छिपाया," मैंने कहा।
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