The Mysterious Bell279 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 279

7 min read November 5, 2026

चबूतरी पर सन्नाटा छा गया। शबनम आपा गुमटी से निकलकर खड़ी हो गईं, हाथ में चिमटी पकड़े।

मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में सचमुच डर था — वो डर जो आदमी को तब लगता है जब उसे लगे कि कोई उसके घर की दीवार के अंदर झाँक रहा है।

"मंसूर भाई," मैंने कहा, "मैं तुम्हारी दुकान में नहीं आया। तुम्हारी अलमारी नहीं खोली।"

"तो फिर?"

"मैं तुम्हें एक बात पूछूँ?" मैंने कहा। "तुम्हारे और तुम्हारे भाई के बीच जो टूटा है, उसकी सच्ची वजह क्या है?"

वो चुप हो गया।

"क्योंकि," मैंने कहा, "जो मुझ पर शक करता है कि मैंने उसकी बात कैसे जानी, वो पहले ये बताए कि उसकी बात टूटी कैसे। शक का जवाब काग़ज़ में नहीं होता, भाई। शक का जवाब उस दरवाज़े में होता है जो आदमी ने ख़ुद बंद किया था।"

मंसूर ने अपना झोला कंधे से उतारा और नीचे रख दिया, जैसे उसका वज़न अचानक बढ़ गया हो।

"हमारे बाप की साइकिल की दुकान थी," उसने धीरे से कहा। "बाप मरे, तो दुकान मेरे नाम चली गई, क्योंकि मैं बड़ा था। भाई ने कहा कि दुकान बेचकर आधा-आधा बाँट लो। मैंने नहीं बेची। मैंने कहा कि बाप की चीज़ बेची नहीं जाती। और फिर हम बारह साल से नहीं बोले।"

उसने अपना मुँह पोंछा।

"पर सच ये है," उसने कहा, "कि दुकान बेचने की बात छोटी थी। असली बात ये थी कि बाप के अंतिम दिनों में भाई अस्पताल नहीं आया। मैंने उसका इंतज़ार किया, वो नहीं आया। मैंने उससे ये नहीं पूछा कि क्यों नहीं आया। मैंने बस मान लिया कि उसने जान-बूझकर नहीं आना चुना। और भाई ने ये नहीं बताया कि उस रात उसकी बीवी को भी दवा चाहिए थी, और वो नहीं आ सका। बारह साल बाद ये बात मुझे कल पता चली, जब मेरी बहन ने फोन किया।"

चबूतरी पर बैठे लोगों में एक हल्की सी हलचल हुई। किसी ने कुछ कहा नहीं, पर लोगों ने एक-दूसरे की तरफ़ देखा।

"तो जवाब मिल गया?" मैंने पूछा।

"मिल गया," उसने कहा। "और मैं अब जानता हूँ कि तुमने मेरी बात कैसे जानी — तुमने नहीं जानी। तुमने बस पूछा, और मैंने बता दिया।" वो हँसा, पर हँसी में कोई मज़ाक नहीं था। "मैं बारह साल से अपने ही घर में चोर ढूँढ रहा था, और चोर मेरे अंदर बैठा था।"

वो उठा। जाने लगा, फिर रुका।

"वो अंगूठा," उसने कहा, "मैंने भी लगाया था। बबलू ने कहा कि तुम गली में सबकी बातें फैला रहे हो। और मैं डर गया कि कहीं मेरी दुकान की वो बात भी तुमने किसी को न बता दी हो, जो बारह साल से बंद है। मेरी अपनी बात का डर मुझे बबलू के पास ले गया।"

वो चला गया। इस बार सीधा, पीपल के तने के पास नहीं रुका।

मंसूर के जाने के बाद नसीम भाई उठे। वही नसीम, जिनका नल का झगड़ा मैंने कुछ दिन पहले स्टूल पर बैठाकर सुलझाया था। उनका चेहरा आज लाल था, और हाथ में वही गीला तौलिया था, जो कभी नल के झगड़े में उनके हाथ में था।

"मैं बोलूँ?" उन्होंने कहा। "मुझे बोलना है।"

चबूतरी पर सब उनकी तरफ़ मुड़े।

"मैंने भी अंगूठा लगाया," नसीम ने कहा। "और मैं झूठ नहीं बोलूँगा। मुझे न तुम्हारी बातों से डर था, न तुम्हारे काम से। मुझे डर था अपनी दुकान के लाइसेंस का। बबलू ने मुझे काग़ज़ दिखाया जिस पर दुकान का नंबर और लाइसेंस की तारीख़ लिखी थी। उसने कहा कि ये काग़ज़ साहब की मेज़ पर पहुँचा तो मेरी दुकान बंद। और मैंने उसी वक़्त अंगूठा लगा दिया, ये भी नहीं पूछा कि इस पर लिखा क्या है।"

उन्होंने तौलिया अपने घुटनों पर रखा।

"और एक बात कहूँ?" उन्होंने कहा। "उस काग़ज़ पर मैंने अंगूठा लगाया, पर उसके नीचे मेरे दुकान के लाइसेंस की बात सच थी। मैं तुमसे माफ़ी नहीं माँगूँगा, अंकुश, क्योंकि माफ़ी उससे माँगी जाती है जिसे मैंने चोट पहुँचाई हो। मैंने तुम्हें चोट नहीं पहुँचाई। मैंने अपने आप को चोट पहुँचाई।" उसने अपनी आँखों में आता पानी पोंछा। "और ये मैं तुमसे नहीं, अपने भाई से कह रहा हूँ, जो आज यहाँ नहीं है।"

जब नसीम ने ये कहा, तो चबूतरी के किनारे खड़े दो लोग पीछे हट गए। एक चूड़ी वाली बाई थीं, जिन्होंने अपने हाथ से लिपटे लाल धागे को देखा और मुँह फेर लिया। दूसरे किराने वाले काका का बेटा था, जो पीछे जाकर पीपल की जड़ के पास खड़ा हो गया और वहीं से बोला,

"मैंने भी अंगूठा लगाया था। पर बबलू ने मेरे बाप को बोला था कि दुकान की बोरी के नीचे जो काग़ज़ है, वो आगे आया तो दुकान का नाम बदल जाएगा। मेरे बाप ने चौदह साल से वो काग़ज़ जलाया नहीं, बोरी के नीचे दबाकर रखा है। और मैं डर गया कि अब वो नाम आगे आया तो…"

वो पूरी बात नहीं कह सका। उसकी आवाज़ रुंध गई।

मैंने कुछ नहीं कहा। मैं बैठा रहा और उनकी बात सुनता रहा।

उसके बाद चूड़ी वाली बाई बोलीं। उन्होंने कहा कि उनकी दुकान पर तीन आदमी दिन भर बैठते हैं, और वो जानती हैं कि वो क्यों बैठते हैं। उन्होंने अंगूठा इसलिए लगाया कि उन्हें लगा कि चुप रहने से सब ठीक रहेगा। फिर उन्होंने अपनी कलाई के लाल धागे देखे और कहा कि ये उन्होंने किसी मंदिर में बँधवाए थे, इस डर से कि कुछ बुरा न हो।

लोगों का डर धीरे-धीरे खुल रहा था। पर मैं जानता था कि डर खोलने से शक नहीं मिटता। डर खुलने के बाद आदमी और शरमिंदा होता है, और शरमिंदा आदमी जल्दी अपनी शरम को गुस्से में बदल देता है।

वही हुआ।

भोला भाई ने कहा, "अंकुश, ये सब ठीक है। पर एक बात साफ़ कर दे। तू करता क्या है? कोई आदमी पूछे तो हम क्या कहें? कि हमारा पड़ोसी जानता है कि किसके घर में क्या टूटा है?"

उनकी आवाज़ में गुस्सा नहीं था, सिर्फ़ थकान थी। वो अपनी बीवी की बैसाखी का सहारा लिए खड़े थे, जो अब पर्दे से बाहर आकर उनके पीछे खड़ी थी।

"भोला भाई," मैंने कहा, "जिस दिन आपने अपनी बीवी के ऑपरेशन के पैसे के लिए बबलू से बारह हज़ार लिए और बिना पढ़े अंगूठा लगाया, क्या उस दिन मैंने आपसे ये सब पूछा था?"

वो चुप हो गए।

"मैं किसी के घर में नहीं झाँकता," मैंने कहा। "पर जब कोई मेरे पास आकर अपनी टूटी चीज़ रखता है और कहता है कि इसे ठीक करो, तो मुझे उसके पीछे की बात जाननी पड़ती है। जिस घर में पानी का नल टूटा है, वहाँ पाइप के नीचे ईंट रखी जाती है। जिस घर में रिश्ता टूटा है, वहाँ भी कोई ईंट रखी गई होती है — कोई पुरानी बात, कोई पुरानी चुप्पी। मैं वही ईंट हटाता हूँ। बस।"

तभी चबूतरी के दूसरे सिरे से उस्ताद अली बक्श की आवाज़ आई।

मुझे पता ही नहीं चला कि वो कब आए और कब बैठे। उनका मोटा चश्मा आज भी कान पर पेंसिल दबाए हुए था, और हाथ में उनकी छोटी पीतल वाली सुई की डिब्बी थी।

"ये सब बातें बाद में करेंगे," उन्होंने कहा। उनकी आवाज़ धीमी थी, पर उसमें वो बात थी जो गली के लोग बरसों से सुनते आए थे। "पहले मैं एक बात कहूँ।"

चबूतरी पर सन्नाटा छा गया। उस्ताद बोलते कम थे, और जब बोलते थे, तो लोग रुक जाते थे।

"ये घंटी," उन्होंने कहा, और मेरी जेब की तरफ़ देखा, जैसे उन्हें दिख रही हो, "किसी की जागीर नहीं है। न अंकुश की, न मेरी, न उस साहब की जिसकी गाड़ी गली के मुँह पर खड़ी रहती है। ये गली की चीज़ है। इसे गली ने बनाया है — जब किसी ने किसी से माफ़ी माँगी, जब किसी ने किसी का दुख बाँटा, जब किसी ने चुप्पी तोड़ी। ये उन्हीं पलों से बनी है।"

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