The Mysterious Bell – Chapter 278
वो कुछ देर मेरी तरफ़ देखता रहा। फिर उसने धीरे से कहा, "तू मुझे सच बता रहा है?"
"हाँ।"
"तो फिर मैं भी सच बताता हूँ," उसने कहा, और उसकी आवाज़ टूट गई। "मेरा भाई मुझसे नहीं बोलता। चार साल हो गए। वजह कर्ज़ था, जो बाप के वक़्त का था। पर सच ये है कि कर्ज़ तो मैंने भी ढोया है। फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है कि उसने कर्ज़ उतार दिया और मैं नहीं उतार पाया, और उसके बाद से मुझे उसके सामने खड़े होने में शर्म आती है।"
"तो शर्म को जेब में रखिए," मैंने कहा, "और भाई से बात कीजिए। शर्म दरवाज़ा नहीं खोलती, बंद करती है।"
उसने सिर हिलाया। फिर वो उठा और चला गया, पर जाते वक़्त उसने मेरी तरफ़ देखा, वो वाली नज़र जो आदमी तब देता है जब वो कुछ बोलना चाहता है और शब्द नहीं मिल रहे हों।
चूड़ी वाली बाई और किराने वाला भी उठे। किराने वाले ने जाते वक़्त कहा, "मैं उस काग़ज़ के बारे में… दुबे अंकल, कुछ हो सकता है क्या?"
"कोशिश करेंगे," दुबे अंकल ने कहा। "पर मैं वादा नहीं करता।"
वो दोनों चले गए। ज़्यादा शक मिट गया था, पर पूरा नहीं। मैं उनकी पीठ देखकर समझ गया कि आज उन्होंने सच कहा, और कल फिर डर बैठ जाएगा। डर सुलझता नहीं, वो सिर्फ़ कुछ देर के लिए पीछे हटता है।
बस रेडियो वाला बूढ़ा बैठा रहा। उसने अपनी लाठी को दोनों हाथों से पकड़ रखा था।
"मैंने भी अंगूठा लगाया," उसने कहा, बिना मेरी तरफ़ देखे। "और मेरे पास बबलू के डर की वजह भी नहीं थी। कोई दुकान नहीं, कोई लाइसेंस नहीं। मैं रेडियो ठीक करता हूँ, कभी कोई आ जाए तो दो रुपये दे देता हूँ। मुझे तो किसी ने डराया भी नहीं। बबलू ने बस कहा कि गली में सबने अंगूठा लगाया है, और जो नहीं लगाएगा वो अलग दिखेगा। और अंकुश, मैं बहुत साल अलग ही दिखा हूँ। अलग दिखने में आदमी की आदत पड़ जाती है, और फिर वो अपनी ही आदत से डरने लगता है।"
"आपने उस दिन रेडियो ठीक कराया था," मैंने कहा। "पुराना टॉर्च भी लाए थे।"
"हाँ। और मैंने उसी दिन शाम को अंगूठा लगा दिया।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "अब तू मुझसे पूछेगा कि मेरे बेटे से क्या टूटा?"
"नहीं," मैंने कहा।
"क्यों नहीं?"
"क्योंकि आपने ख़ुद बता दिया," मैंने कहा। "दरवाज़ा बंद करने की बात। बाक़ी आपका है,"बाक़ी आपका है," मैंने कहा।
रेडियो वाला बूढ़ा कुछ देर मेरी तरफ़ देखता रहा। फिर उसने अपनी लाठी को ज़मीन पर टिकाया, उसका घिसा हुआ सिरा पत्थर पर टकराया और एक छोटी सी आवाज़ निकली, जैसे कोई बहुत दूर से किसी बंद दरवाज़े को खटखटा रहा हो।
"मेरा बेटा," उसने कहा, "नए बाज़ार में रेडियो की बड़ी दुकान चलाता है। मेरे पास बैठकर वो कभी चाय नहीं पीता। आता है, गाड़ी से उतरता है, बाहर से दो थैलियाँ रख जाता है और चला जाता है। मैं उन थैलियों को खोलता नहीं। जानता हूँ कि उसमें क्या है। वही चीज़ें जो मैंने उसे दी थीं — अच्छे कपड़े, अच्छी घड़ी, मेरी पूरी मेहनत। वो मुझे वापस करने आता है, हर महीने।"
मैंने कुछ नहीं कहा।
"एक बार मैंने उससे पूछा था," वो बोला, "कि बेटा, क्या तुझे मुझसे कोई शिकायत है? वो बोला — नहीं पापा, शिकायत नहीं है। और उसके बाद वो चला गया। शिकायत नहीं है, अंकुश। मेरे बेटे को मुझसे शिकायत भी नहीं है। शिकायत होती तो बात बन जाती। वो तो बस… दूरी है। और दूरी का कोई मुँह नहीं होता, तू उससे बात नहीं कर सकता।"
उसने अपनी लाठी उठाई और धीरे से उठा।
"मैं नहीं जानता कि तू ये सब कैसे करता है," उसने कहा। "और सच कहूँ तो मुझे जानना भी नहीं। पर मैं इतना जानता हूँ — जो आदमी किसी के टूटे रिश्ते की बात जान जाए और उसका फ़ायदा न उठाए, वो बुरा आदमी नहीं होता। बुरा आदमी वही करता जो बबलू कर रहा है।"
वो चला गया। उसका चलना धीमा था, जैसे उसकी लाठी और उसकी पीठ दोनों एक ही ताल पर चल रहे हों।
मैं दुकान के पीछे वाले कमरे में गया। चारपाई पर बैठा। बल्ब गुनगुना रहा था, और उसकी आवाज़ आज किसी मक्खी जैसी लग रही थी, जो बंद कमरे में फँस गई हो।
मैंने घंटी जेब से निकाली और मेज़ पर रख दी। वो चमकती नहीं थी। पीतल जब पुराना हो जाता है तो चमकता नहीं, बस एक हल्की सी गरमी रखता है अंदर। जैसे बूढ़े आदमी की हथेली।
"आज तूने कहा था," मैंने धीरे से कहा, "कि शक वाले आख़िर में मरम्मत करवाने लौटेंगे।"
घंटी चुप रही।
"तो कब लौटेंगे?"
कोई जवाब नहीं आया। कमरे में सिर्फ़ बल्ब की गुनगुनाहट रह गई, और बाहर गली से किसी कुत्ते के भौंकने की आवाज़, जो दूर जाकर ख़त्म हो गई।
मैं लेट गया, पर आँख बंद नहीं की। छत पर एक मकड़ी का जाला था, जो हवा न होने पर भी हिल रहा था, क्योंकि उसका एक सिरा किसी ऐसी चीज़ से बँधा था जो मुझे दिख नहीं रही थी।
मैं सोच रहा था — पाँच अंगूठे। पाँच आदमी। और उनमें से कोई भी ये नहीं कहेगा कि उसने डर की वजह से अंगूठा लगाया। सब कहेंगे कि हमने सोच-समझकर लगाया। आदमी अपने डर को कभी डर नहीं कहता। वो उसे अपनी राय कहता है।
सुबह मैं जल्दी उठ गया। सूरज अभी पीपल की छतरी पर नहीं चढ़ा था, बस उसकी जड़ों पर हल्की सुनहरी लकीर आई थी। मैंने दुकान का शटर आधा उठाया और बाहर निकला। ठंडी हवा में नाली की गंध और शबनम आपा की गुमटी से आती चाय की भाप दोनों मिली हुई थीं।
चबूतरी पर कोई नहीं था, सिवाय बंसी बाबा के, जो अपनी आदत के मुताबिक़ सबसे पहले आकर एक कोने में बैठ जाते थे और अपना सफ़ेद कुर्ता ठीक करते रहते थे।
मैंने उन्हें प्रणाम किया। उन्होंने सिर हिलाकर बैठने को कहा।
"आज यहाँ ज़्यादा लोग आएँगे," उन्होंने कहा। "बुरी खबर हवा से तेज़ चलती है।"
वो सही थे।
सात बजते-बजते चबूतरी के आसपास लोग जुटने लगे। पहले भोला भाई आए, अपनी दुकान का रेडियो बंद करके। उनके पीछे चूड़ी वाली बाई, फिर किराने वाले काका का बेटा, फिर साइकिल पुर्ज़ों वाला वो भाई — वही जिसने कल पहिया लेने से मना कर दिया था। वो दूर खड़ा रहा, पीपल के तने के पीछे, जैसे आधा आया हो और आधा नहीं।
और उनके बीच एक आदमी आया जिसे मैंने पहले कभी नहीं देखा। पतला, पीले रंग की कमीज़, कंधे पर एक फटा जैसा झोला, और चेहरे पर वो भाव जो आदमी तब लाता है जब वो रात भर सो न सका हो। वो सीधे मेरे सामने आकर खड़ा हो गया।
"तुम अंकुश हो?" उसने पूछा।
"हाँ," मैंने कहा।
"मेरा नाम मंसूर है। मेरी साइकिल की दुकान है, स्कूल के पीछे वाली गली में।"
मैंने सिर हिलाया। मैं उसे पहचानता नहीं था, पर मैंने देखा था उसकी दुकान। छोटी सी, जिसके बाहर हमेशा दो-तीन साइकिलें उलटी पड़ी रहती थीं।
"तुमने मेरे भाई से मेरी बात कैसे जानी?" उसने कहा।
उसकी आवाज़ में गुस्सा नहीं था। उसमें वो कंपन था जो गुस्से से पहले आता है — डर का कंपन।
"कौन सी बात?" मैंने पूछा।
"वो बात," उसने कहा, "जो घर के चार दीवारों में थी। जो मैंने किसी को नहीं बताई। जो मेरे भाई ने भी नहीं बताई। तुम कौन हो जो तुम्हें पता है कि मेरे और मेरे भाई के बीच पैसों का नहीं, बाप की दुकान का झगड़ा है? क्या तुम हमारी दुकान में आए थे? क्या तुमने हमारी अलमारी खोली थी?"
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