The Mysterious Bell – Chapter 276
मैंने जेब से घंटी निकाली और हथेली पर रखी। पीतल ठंडा था।
"कुछ बोल," मैंने कहा।
वो चुप रही।
"बोल ना," मैंने कहा, इस बार थोड़ा ज़्यादा ज़ोर से। "पाँच अंगूठे लग गए, मेरा नाम कट रहा है शहर से, और तू चुप है?"
"तूने कभी सोचा," घंटी ने कहा, इतने धीमे स्वर में कि मैं कान लगाकर सुनने पर मजबूर हो गया, "कि मैं चुप क्यों हूँ?"
"नहीं।"
"क्योंकि आज जो बोलना है, वो मैं नहीं, तू बोलेगा। मेरी आवाज़ से लोग डरते हैं। तेरी आवाज़ से लोग लड़ते हैं। और आज लड़ना ज़रूरी है।"
"लड़ना?" मैंने कहा। "मैं नहीं लड़ता। मैं साइकिल ठीक करता हूँ।"
"तभी तो तुझे ज़रूरत है," घंटी ने कहा, "किसी ऐसे आदमी की जो पाँच अंगूठों से लड़ सके। और वो आदमी तू है। बस फ़र्क़ इतना है कि तू आज किसी दरवाज़े पर नहीं जाएगा। तू चबूतरी पर बैठेगा। और जो पाँच लोग तेरे ख़िलाफ़ अंगूठा लगाकर आए हैं, उन्हें ख़ुद बैठने देगा।"
"वो आएँगे ही क्यों?"
"क्योंकि उनमें से एक भी सो नहीं पाया," घंटी ने कहा। "जिसे तूने नहीं छुआ, वो सो जाता है। जिसे तूने छुआ, वो करवटें बदलता रहता है।"
मैंने घंटी जेब में रख दी और दुबे अंकल की तरफ़ देखा।
"अंकल, सुबह चबूतरी पर आ जाइए। सात बजे।"
"क्या करना है?"
"पंचायत," मैंने कहा। "छोटी सी। पाँच अंगूठे वालों के साथ।"
दुबे अंकल कुछ देर मेरी तरफ़ देखते रहे, फिर बोले, "अंकुश, पंचायत में जो हार जाता है, वो ज़िंदगी भर हारा नहीं रहता। पर जो पंचायत में बोलने से बच जाता है, वो ज़िंदगी भर बोल नहीं पाता। तू बोलेगा न?"
"मैं बोलूँगा," मैंने कहा। "डरूँगा भी। पर बोलूँगा।"
वो मुस्कुराए, पहली बार आज रात। एक छोटी सी मुस्कान, जैसे किसी पुरानी तस्वीर से कोई अपना झाँक रहा हो। फिर वो चले गए, और उनकी चप्पल की आवाज़ गली में दूर तक गई।
मैं अंदर गया। चारपाई पर बैठकर मैंने अपनी सारी चीज़ें एक जगह रखीं — पीतल की घंटी, उस्ताद की छोटी फूल वाली घंटी, रामलाल की घड़ी जो अब चल रही थी, रणवीर का सफ़ेद कार्ड, नियुक्ति पत्र, माँ की फाइल की नक़ल, अजय का पीला काग़ज़ जिस पर "तुम कहीं नहीं जाओगे" लिखा था, सनी का आधा काग़ज़, और रज्जो बाई का बैग।
घड़ी की टिक-टिक कमरे में ऐसी लग रही थी जैसे कोई बूढ़ा आदमी सीढ़ी चढ़ रहा हो, एक-एक क़दम भारी।
मैंने आँखें बंद कीं और सोचा — अगर बबलू ये काग़ज़ दफ़्तर पहुँचा देगा, तो मेरा नाम सिर्फ़ चबूतरी से नहीं, पूरे मोहल्ले से कट जाएगा। और फिर, चाहे मैं कितनी भी साइकिलें ठीक कर लूँ, लोग घर की बातें छुपाने लगेंगे। और जिस दिन गली की बातें छुपने लगें, उस दिन घंटी चुप हो जाएगी। और जिस दिन घंटी चुप हो गई, उस दिन मैं सिर्फ़ एक मरम्मत करने वाला लड़का रह जाऊँगा, जिसके हाथ में ग्रीस है और जेब में कुछ नहीं।
मैंने आँखें खोली।
"नहीं," मैंने ख़ुद से कहा। "पहले पंचायत।"
सुबह सात बजे गली ऐसी थी जैसे किसी ने उसे ओस में धो दिया हो। पीपल के पत्तों से पानी की बूँदें टपक रही थीं और पत्थर की चबूतरी पर हल्की भाप थी। शबनम आपा गुमटी खोल चुकी थीं, केतली चढ़ी थी, और उनकी पीतल की थाली आज भी वहीं टँगी थी, जहाँ वो उसे पटकती हैं।
बच्चे पहले से आ चुके थे। सानिया चबूतरी के किनारे बैठी थी, उसकी लाल कवर कॉपी गोद में। रफ़ीक़ और गुड्डू पीपल की जड़ पर बैठे थे, और चिंटू चुपचाप झाड़ू लगा रहा था, जैसे आज उसे कोई डाँट न पड़े इसकी तैयारी कर रहा हो।
टिंकू मेरे पास खड़ा था, आँखें सिकोड़े हुए।
"उस्ताद, पाँचों आ रहे हैं," उसने कहा। "सानिया ने देखा, सब अपने-अपने दरवाज़े से निकल रहे हैं।"
"अच्छा हुआ," मैंने कहा।
"अच्छा क्या हुआ?" टिंकू ने कहा। "पाँचों ने तेरे ख़िलाफ़ अंगूठा लगाया है।"
"अच्छा इसलिए हुआ," मैंने कहा, "कि अब वो मेरे सामने बैठेंगे। और अंगूठा लगाने वाला आदमी जब सामने बैठता है, तो उसकी आँखें बोलने लगती हैं।"
पहले नसीम भाई आए। सिर पर तौलिया, हाथ में चाय का गिलास, चेहरे पर वो भाव जो आदमी तब लाता है जब वो ख़ुद से ज़्यादा किसी और से डर रहा हो। उनके पीछे रमेश भाई आए, जिनसे नसीम भाई का पानी का झगड़ा मैंने दो स्टूल पर बैठाकर सुलझाया था। रमेश भाई ने नसीम भाई को देखा, फिर मुझे देखा, और चुपचाप चबूतरी के दूसरे सिरे पर बैठ गए।
फिर आए साइकिल पुर्ज़ों वाला भाई, पच्चीस-छब्बीस साल का, जिसकी आँखें दो दिन पहले मेरी दुकान से हट गई थीं। उसके हाथ में कोई पहिया नहीं था।
फिर चूड़ी वाली बाई, हाथ में लिपटे लाल धागे और आँचल से बार-बार चेहरा पोंछती हुई। फिर किराने वाले बूढ़े काका का बेटा, जिसकी चाल में एक तरह की तेज़ी थी, जैसे वो जितनी जल्दी बोल दे, उतनी जल्दी पीछे हट जाए। और आख़िर में रेडियो ठीक करने वाला बूढ़ा, अपनी घिसी लाठी के सहारे, जिसके चश्मे के शीशे पर आज भी सुबह की धूप रुकी हुई थी।
दुबे अंकल अपनी कुर्सी लेकर आए, वही नीली शर्ट, और चबूतरी से थोड़ा हटकर बैठ गए, ऐसे जैसे आज वो फ़ैसला देने नहीं, सुनने आए हों।
मैंने पाँचों की तरफ़ देखा।
"बैठिए," मैंने कहा।
बैठे। चूड़ी वाली बाई दूसरी तरफ़ देखने लगीं। रेडियो वाले बूढ़े ने लाठी अपने घुटनों के पास टिकाई।
"मैं आज किसी से अंगूठे की बात नहीं करूँगा," मैंने कहा। "मुझे पता है पाँचों के अंगूठे हैं। मुझे ये भी पता है कि कोई भी अंगूठा पढ़कर नहीं लगा है।"
साइकिल पुर्ज़ों वाला भाई उठकर खड़ा हो गया।
"अंकुश भाई," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में गुस्सा था, बहुत गुस्सा, पर वो डर का गुस्सा था, जो सबसे ज़्यादा चुभता है। "तू मुझसे अंगूठे की बात कर, ये ठीक है। मैंने लगाया है, मैं कबूलता हूँ। पर एक बात बता — तुझे मेरे और मेरे भाई के बीच की बात कैसे पता चली?"
चबूतरी पर सन्नाटा छा गया। शबनम आपा की केतली भी उस वक़्त सीटी बजाना भूल गई, या मुझे ऐसा लगा।
"मेरे और मेरे भाई के बीच जो बात थी," उसने कहा, आवाज़ थोड़ी भर्रा गई, "वो मैंने किसी को नहीं बताई। न घर में, न दुकान पर, न गुमटी पर। फिर तू कौन सा हवा का पता लगाने वाला यंत्र है जो तूने हमारी आवाज़ सुन ली?"
"हाँ," किराने वाले काका का बेटा बोल पड़ा। "और मेरी दुकान की जो हालत है, वो बात किसी को मालूम नहीं थी। तूने मेरे बाप को क्या कहा कि बाप रात को चुपचाप बैठा रहा?"
चूड़ी वाली बाई ने आँचल से मुँह ढककर कहा, "मेरी बेटी की बात तक पहुँच गई, भाई। तू जोड़ने वाला है, सब जानने वाला नहीं बन जा।"
और फिर तीनों बोलने लगे, एक साथ, एक-दूसरे की बात काटते हुए, और उनकी आवाज़ों में जो चीज़ सबसे ऊपर थी, वो शक नहीं था — वो डर था। शक आदमी के दिमाग़ में बैठता है, डर आदमी की छाती में। और मैं छाती से निकली आवाज़ पहचानता हूँ, क्योंकि मेरी ही छाती में बैठा रहता है।
मैं चुप बैठा रहा।
टिंकू मेरे पास खड़ा था। उसने कान के पास झुककर कहा, "उस्ताद, कुछ बोल।"
"चुप रह," मैंने कहा। "सब की सब सुननी है।"
वो सुनते रहे, बोलते रहे। किसी ने कहा कि मैं रातों को गली में घूमता हूँ, मुझे कुछ पता चल जाता है। किसी ने कहा कि जिसे मैंने मुफ़्त साइकिल ठीक कर दी थी, वो पैसे रखकर चला गया, इसका भी कोई मतलब है। किसी ने कहा कि घंटी की आवाज़ पूरी गली ने सुनी है और घंटी के बिना आदमी को किसी के घर की बात कैसे पता चलेगी।
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