The Mysterious Bell275 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 275

7 min read November 5, 2026

एक वो साइकिल पुर्ज़ों वाला भाई था, और दूसरा एक और आदमी, जिसकी साइकिल मैंने तीन दिन पहले ठीक की थी — पहिया घुमाया, ब्रेक कसा, और मुफ़्त में कर दी थी क्योंकि उसके पास पैसे नहीं थे और भाई बोला था, “अगली बार दे दूँगा।”

वो मेज़ के पास खड़े हो गए।

“भैया,” साइकिल वाले भाई ने कहा, “मेरी साइकिल दे दीजिए।”

“दे दूँ,” मैंने कहा। “पर वो खड़ी नहीं है। वो तुम्हारे घर के सामने है। तुम उसे रोज़ चला रहे हो।”

वो एक पल को उलझा।

“मेरी मतलब है, मेरा पहिया,” उसने कहा। “जो आपके पास रखा है।”

“पहिया ये है,” मैंने कहा और ट्रंक के पास से उठाकर लाकर रख दिया। “रिम सीधा कर दिया, तीलियाँ बदल दीं, बॉल बियरिंग साफ़ कर दी। लो।”

उसने पहिया उठाया, फिर उसने कहा, “भैया, अब मैं ये पहिया नहीं लूँगा।”

मैं चुप खड़ा रहा।

“क्यों?” मैंने पूछा।

“क्योंकि इस पहिये के पैसे मैंने नहीं दिए।”

“पैसे नहीं दिए तो देना नहीं है। मैंने माँगा नहीं।”

“बात पैसे की नहीं है, भैया,” उसने कहा। “बात ये है कि हम लोग आपकी दुकान पर क्यों आने लगे? हमें क्या हो गया है? पहले हम ऊपर वाली दुकान पर जाते थे, वो बंद हुई तो आपके पास आते थे। अब… अब लोग कहते हैं कि आपके पास ख़ुद ही… कुछ है।”

“मेरे पास ख़ुद ही कुछ है,” मैंने दोहराया।

“मैं आपके ख़िलाफ़ नहीं हूँ, भैया,” उसने जल्दी से कहा। “पर मेरी अम्मी कहती हैं कि जिस आदमी को हर घर का दर्द पता हो, उससे दूर रहो। दर्द पता करने वाला दर्द लेकर आता है।”

“और दूसरे भाई?” मैंने उस आदमी से पूछा जिसकी साइकिल मैंने मुफ़्त ठीक की थी। “तुम भी यही सोच रहे हो?”

वो नीचे देखने लगा। फिर मैंने देखा—उसके हाथ में पैसे थे। दो रुपये और छोटे सिक्के, कपड़े में बँधे। वो उन्हें मेज़ पर रखने के लिए हाथ बढ़ाता रहा, फिर हाथ वापस खींच लिया, फिर धीरे से मेज़ के कोने पर रख दिए।

“भैया,” उसने कहा, “मेरी साइकिल… मैं कल आकर ले जाऊँगा।”

और वो चले गए।

मैं दुकान के बाहर आकर खड़ा हो गया। गली में शाम की धूप अब सिर्फ़ छतों पर बची थी।

पैसे मेज़ पर पड़े थे। मैंने उन्हें गिना नहीं। मैंने उन्हें वापस कपड़े में बाँधकर रख दिया, जैसे उनकी जगह कहीं और हो।

मुझे बुरा इस बात का नहीं लगा कि उसने पहिया नहीं लिया। मुझे बुरा इस बात का लगा कि जब वो मेरी दुकान पर आया था, तब उसकी आँखों में एक तरह का भरोसा था — वो भरोसा जो आदमी किसी ऐसे पर नहीं करता जो उसका दर्द जानता हो। वो भरोसा मैंने ख़ुद नहीं कमाया था। वो गली ने मुझे दिया था। और अब वही गली उसे वापस ले रही थी, और वजह बबलू ने दे दी थी।

मैंने जेब में हाथ डाला और घंटी को छुआ। वो चुप थी।

“कुछ बोल नहीं रही?” मैंने धीरे से पूछा।

“क्या बोलूँ?” घंटी ने कहा। “तू ख़ुद जानता है कि डर काग़ज़ से नहीं, कान में डाले हुए फुसफुसाहट से बढ़ता है। और आज वो फुसफुसाहट चार दरवाज़ों तक गई है।”

“तो मैं क्या करूँ? हर दरवाज़े पर जाकर सफ़ाई दूँ?”

“नहीं,” घंटी ने कहा। “आज एक भी दरवाज़े पर मत जा। आज तेरी दुकान पर जो आए, उससे बात कर। जिसे शक है, वो तेरे पास आएगा। जिसे यक़ीन है, वो किसी और के पास जाएगा। और तू जानता है — शक वाले भी आख़िर में तेरे पास ही लौटेंगे।”

“क्यों?”

“क्योंकि उन्हें मरम्मत करवानी है,” घंटी ने कहा। “शक से पहिया नहीं चलता।”

मैं हँस पड़ा। ये पहली बार हुआ कि घंटी ने कोई मज़ाक किया हो। या शायद उसने मज़ाक नहीं किया था। शायद उसने मेरे लिए आसान लफ़्ज़ चुन लिए थे, ताकि मैं आज टूटूँ नहीं।

मैं अंदर गया और ट्रंक पर बैठ गया। बल्ब गुनगुना रहा था। बाहर गली में किसी ने रेडियो चालू किया — भोला भाई की दुकान से, और वही पुरानी धुन आ रही थी।

तभी साया दरवाज़े पर पड़ा।

मैंने सिर उठाया। दुबे अंकल खड़े थे। अपनी नीली शर्ट में, वो वाली जो वर्दी जैसी लगती है, हाथ में एक पुरानी कॉपी और चेहरे पर वो भाव जो बता रहा था कि वो गुमटी से सीधे यहाँ आए हैं, रास्ते में कहीं नहीं रुके।

“उठ,” उन्होंने कहा। “बैठने का वक़्त नहीं है।”

“अंकल, चाय पी लीजिए,” मैंने कहा।

“चाय नहीं,” उन्होंने कहा। “सुन।”

उन्होंने कॉपी मेज़ पर रखी और उस पर हाथ टिका दिया।

“आज शाम चार बजे के बाद,” उन्होंने कहा, “बबलू ने गली के पाँच लोगों के अंगूठे एक काग़ज़ पर ले लिए हैं। एक ही काग़ज़ पर, अंकुश। पाँच अंगूठे। एक साथ दोनों तरफ़ से हस्ताक्षर। और मैं उस काग़ज़ का एक हिस्सा देखकर आया हूँ।”

मेरे पेट में वो ठंडी लहर फिर आई, सरोज वाली लहर, पर इस बार ज़्यादा ठंडी।

“क्या लिखा है उस पर?” मैंने पूछा।

दुबे अंकल ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखें थकी हुई थीं, पर डरी हुई नहीं थीं। उन्होंने धीरे से कहा,

“वो काग़ज़ तेरे ख़िलाफ़ है, अंकुश। गली के लोगों ने अपने अंगूठे से लिख दिया है कि तेरी दुकान, तेरा काम और तेरी बातें — सब उन्हें मंज़ूर नहीं। और जिस लम्हें वो काग़ज़ साहब के दफ़्तर पहुँचेगा, गली में ये बोला जाएगा कि ये फैसला गली का है, किसी बाहर वाले का नहीं।”

मैं ट्रंक पर ही बैठा रहा। घंटी ने कुछ नहीं कहा। वो भी चुप थी।

और मैं सोच रहा था — पाँच अंगूठे। पाँच आदमी, जिन्होंने उस काग़ज़ को पढ़ा भी नहीं।

॥

"पाँच अंगूठे।"

मैंने यह होंठों ही होंठों में दोहराया, ज़ोर से नहीं। दुबे अंकल ने अपनी पुरानी कॉपी उठाकर सीने से लगा ली, जैसे वो कोई काग़ज़ न हो, कोई ज़ख़्म हो जिसे हवा लगते ही दर्द देने लगेगा।

"मैं तुझे डराने नहीं आया," उन्होंने कहा। "मैं तुझे बताने आया हूँ, ताकि कल कोई तेरे मुँह पर ये कहे कि गली ने तेरा फ़ैसला कर दिया, तो तू अनजान बनकर खड़ा न रहे। अनजान आदमी की ज़ुबान जल्दी लड़खड़ाती है।"

"किसके अंगूठे हैं?" मैंने पूछा।

उन्होंने कॉपी खोली, पर उसमें देखा नहीं। जैसे उसमें देखना भी उस काग़ज़ की गवाही बन जाएगा।

"जिन दरवाज़ों पर बबलू दोपहर से लेकर शाम तक घूमा था," उन्होंने कहा। "वही पाँच। साइकिल के पुर्ज़ों वाला भाई, चूड़ी वाली बाई, किराने वाले बूढ़े काका का बेटा, नसीम भाई, और रेडियो ठीक करने वाला बूढ़ा। पाँचों के अंगूठे एक ही काग़ज़ पर। और मेरी जानकारी में एक भी अंगूठा पढ़कर नहीं लगा है।"

"उस काग़ज़ पर क्या लिखा है?"

दुबे अंकल ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखें थकी थीं, पर डरी हुई नहीं थीं। डरे हुए आदमी की आँखों में एक हड़बड़ी होती है, इनमें एक जैसी शांति थी, जो बहुत साल वर्दी पहनने के बाद ही आती है।

"जो मैंने पढ़ा, वो सिर्फ़ इतना," उन्होंने कहा। "कि तेरी दुकान गली की ज़मीन पर नहीं होनी चाहिए, तेरा काम गली को चाहिए ही नहीं, और तेरी बातें लोगों के घर तक पहुँचती हैं, इसलिए तेरा आना-जाना बंद होना चाहिए। ऊपर एक लाइन और थी, जिसमें लिखा था कि ये गली की राय है।"

"गली की राय," मैंने धीरे से दोहराया।

"हाँ। और अंकुश, वो काग़ज़ साहब के दफ़्तर जाएगा। बबलू उसे ख़ुद ले जाएगा। मेरी समझ से वो उसे आज शाम की सभा से पहले पहुँचाना चाहेगा, ताकि सभा में खड़े होकर साहब के हाथ में वो काग़ज़ हो, और तेरे हाथ में खाली हवा।"

मैं ट्रंक पर ही बैठा रहा। बल्ब ऊपर गुनगुना रहा था, जैसे किसी पुराने गाने की आख़िरी लाइन भूल गया हो। बाहर भोला भाई की दुकान से रेडियो बज रहा था, वो वाली धुन जो हर घर में एक जैसी लगती है।

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