The Mysterious Bell274 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 274

7 min read November 5, 2026

“दीदी,” मैंने कहा, “मुझे पता नहीं था।”

“अब मत कहो कि पता नहीं था,” किराने वाले काका का बेटा बोला। “मुझे भी कोई पता था कि मेरे बाप के हाथ काँपते हैं? मैंने किसी को नहीं बताया। पर तुमने चबूतरी पर कह दिया — 'जो हमसे बात करने आता है, वो डरकर आता है, पर आता है।' तुम्हारी बात किस पर लगी? मेरे बाप पर।”

“वो बात मैंने किसी के लिए नहीं कही थी,” मैंने कहा।

“फिर भी लगी,” उसने कहा। “और लगी तो सही। अब तुम बताओ — तुम्हें कैसे पता कि ये बात मेरे बाप पर लगेगी? तुम्हें पता होगा तो लगी होगी। तुम्हें सब पता है न?”

“नहीं पता,” मैंने कहा। “मुझे ये नहीं पता था कि तुम्हारे पापा के हाथ काँपते हैं। ये मुझे अभी तुमसे पता चला।”

वो एक पल चुप रहा। फिर बोला, “अब तो पता चल गया।”

साइकिल पुर्ज़ों वाला भाई धीरे से हँसा। वो हँसी अच्छी नहीं थी।

“अंकुश भैया,” उसने कहा, “हम सब एक ही गली में रहते हैं, बरसों से। कोई किसी को जादू नहीं करता दिखा। तुम आए, दुकान खोली, और अचानक गली में हर आदमी अपना दर्द भूलकर तुम्हारी दुकान पर चला आ रहा है। क्यों?”

“क्योंकि साइकिल खराब होती है,” मैंने कहा।

किसी को हँसी नहीं आई।

“मैंने सुना है,” उसने कहा, “कि तुम किसी को छूते हो, किसी की चीज़ लेते हो, और फिर सामने वाले का छिपा हुआ बता देते हो। बीमारी की तरह।”

“किसने कहा?”

“किसी ने कहा,” उसने कंधा उठाया। “इसी बात पर तो बात हो रही है। कि कौन कहता है। कहने वाले का नाम नहीं होता।”

शबनम आपा ने चाय का गिलास मेरे आगे रखा और फिर बीच में खड़ी हो गईं। उनके हाथ में चिमटी थी। उन्होंने वो चिमटी हवा में उठाई और पूरी गुमटी को दिखाई, जैसे कोई स्कूल का बोर्ड दिखा रहा हो।

“अब मेरी सुनो,” आपा ने कहा। “सब सुनो। तुम, चूड़ी वाली बहन, तुम सुनो। तुम किराने वाले के लड़के, तुम सुनो। तुम भी, जो साइकिल के पुर्ज़े बेचते हो और आज बहुत बड़े जज बने बैठे हो।”

गुमटी की छत के नीचे सन्नाटा हो गया।

“आज दोपहर से ये गली में एक बात फैली है,” आपा ने कहा, “कि ये लड़का लोगों का दर्द जानकर अपना तंत्र चलाता है। मैं साफ़ बोलती हूँ। जो दूसरों के घर की आग बुझाने में पूरी रात खड़ा रह रहा है, उसके घर में माचिस रखने की बात करना, ये शर्म की बात है। मैंने तीन दिन में इस गली को जितना बदलते देखा है, उतना पंद्रह साल में नहीं देखा। भोला भाई की दुकान का शटर आज सुबह खुला था या बंद था? खुला था। क्यों खुला था? क्योंकि इस लड़के ने उनकी बीवी को बाहर बैसाखी पकड़कर खड़ा करवा दिया। ये जादू है? हाँ, तो ये जादू है। पर इस जादू में पैसा नहीं लगा, न किसी का खून गिरा।”

फिर आपा ने चिमटी थाली पर पटक दी। ठन्। धातु की आवाज़ गली के मोड़ तक गई।

“अब कोई इस लड़के पर उँगली उठाएगा, तो पहले मेरी चिमटी से बात करेगा,” आपा ने कहा। “समझ गए?”

चूड़ी वाली बाई ने नज़रें नीची कर लीं। किराने वाले का बेटा एक पल को हिला, फिर बोला, “आपा, हम किसी पर उँगली नहीं उठा रहे। हम बस पूछ रहे हैं। पूछना गुनाह है?”

“पूछना गुनाह नहीं,” आपा ने कहा। “किसी के फैलाए हुए झूठ पर पूछना गुनाह है।”

मैंने चाय का घूँट लिया। फिर मैं मुस्कुराया। सच बताऊँ, उस वक़्त मुस्कुराना आसान नहीं था, पर मैंने मुस्कुरा दिया, क्योंकि अगर मैं नहीं मुस्कुराता तो टिंकू को लगता कि दुनिया जीत गई।

“आपा,” मैंने कहा, “इन्हें पूछने दीजिए। पूछना अच्छा है। मुझे ही पूछ लें, मैं बता दूँगा।”

मैं उठकर खड़ा हो गया।

“बहन जी,” मैंने चूड़ी वाली बाई से कहा, “मैं आपकी बेटी की शादी के बारे में कुछ नहीं जानता था। आज सुबह मैंने आपको इसलिए देखा था कि आपके हाथ में लाल धागे थे और आप उन्हें बार-बार उलट-पुलट रही थीं। वो मैंने देखा। आपकी बेटी की शादी मैंने नहीं देखी।”

उसने हाथ की तरफ़ देखा, जैसे लाल धागे उस वक़्त भी उसको धोखा दे रहे हों।

“और साइकिल वाले भाई,” मैं उसकी तरफ़ मुड़ा, “तुम पूछ रहे हो कि मेरे पास क्या है। तो सुनो — मेरे पास तीन चीज़ें हैं। एक ग्रीस, एक पेचकस, और बहुत सारा धैर्य। जब कोई आदमी साइकिल का पहिया लेकर आता है, तो वो सिर्फ़ पहिया नहीं लाता। वो ये भी लाता है कि उसकी साइकिल क्यों टूटी। किसने तोड़ी। किसने नहीं पूछा। किसने मज़ाक उड़ाया। मैं साइकिल ठीक करता हूँ, और चूँकि पहिया हाथ में रहता है, बातें भी सुननी पड़ती हैं। मैंने कभी किसी की बात किसी से नहीं कही। मैंने कभी किसी को नहीं छुआ जिससे उसका राज़ निकले। और जादू अगर होता, तो मैं अपनी ही साइकिल की चेन पहले ठीक कर लेता, वो पिछले महीने से टूटी पड़ी है।”

दो-तीन लोग हँसे। हल्की हँसी, वो हँसी जो किसी मज़ाक पर नहीं, तनाव हटने पर आती है।

पर साइकिल पुर्ज़ों वाला भाई नहीं हँसा। वो उठा और बोला, “जो दिन में गली में खड़े होकर राज़ खोलते फिरते हैं, वो रात में क्या करते हैं, ये किसी को नहीं पता। मैं अपनी बात कह चुका।”

वो चला गया। किराने वाले का बेटा भी उसके पीछे चला गया, पर जाते-जाते मुड़ा और बोला, “आपा, चाय बढ़िया थी।”

“जा,” आपा ने कहा। “अगली बार पैसे लूँगी, मुफ़्त नहीं पिलाऊँगी।”

अंधेरा अब गली में उतर आया था। बच्चे चबूतरी से उठ चुके थे और उनकी जगह बुज़ुर्गों ने ले ली थी। मैं दुकान की तरफ़ बढ़ा तो टिंकू मेरे पीछे-पीछे आया, और उसका गुस्सा अभी उतरा नहीं था।

“उस्ताद,” वो बोला, “आपने उन्हें इतना क्यों समझाया? आपने क्यों माफ़ी जैसी बातें कीं? आपने किसी का क्या बिगाड़ा है?”

“कुछ नहीं बिगाड़ा,” मैंने कहा।

“तो फिर आप चुप क्यों नहीं रहे? आपने उन्हें इतना क्यों बताया कि आपके पास ग्रीस है, पेचकस है…” उसकी आवाज़ भर्रा गई। “आपने अपने बारे में ऐसे बोला जैसे आप कुछ ग़लत कर रहे हों।”

मैं रुक गया। दुकान का शटर आधा खुला था और अंदर अंधेरा था।

“टिंकू,” मैंने कहा, “जब कोई तुझसे पूछे कि तू क्या करता है, तो सीना तानकर बताना। पर जब कोई पूछे कि तू क्या है, तो उससे झगड़ना मत। क्योंकि जो पूछ रहा है, वो जवाब नहीं चाहता। वो बस अपना डर निकाल रहा है।”

“किसका डर?”

“इनका नहीं,” मैंने कहा। “बबलू का। उसने आज सुबह यहाँ आकर मुझे धमकाया था। आज दोपहर वो स्कूल की गली में घूम रहा था और पूछ रहा था कि मुझे सब कैसे पता है। अब सोच — जिस आदमी को मुझे डराना हो, वो ये क्यों पूछेगा कि मुझे कैसे पता है? वो सीधे मुझे डरा देता।”

टिंकू ने सोचा।

“वो पूछ रहा है,” मैंने कहा, “क्योंकि उसे ख़ुद पता करना है। उसे लगता है कि मेरे पास कुछ है। और जब आदमी को लगे कि सामने वाले के पास कुछ है, तो वो पहले लोगों से पूछता है। लोगों की शक उसकी तलवार है, टिंकू। वो ख़ुद तलवार नहीं चलाता। वो हमें एक-दूसरे के ऊपर चलवाता है।”

टिंकू ने मुट्ठी बाँधी।

“तो हम क्या करें?”

“आज रात कुछ नहीं,” मैंने कहा। “सात बजे की सभा देखते हैं।”

मैं दुकान के अंदर गया। अंधेरे में हाथ बढ़ाकर बल्ब खींचा तो पीली रोशनी फैल गई और दीवार पर टँगे औज़ार चमकने लगे। मैंने ट्रंक पर रखी रिंच उठाई, फिर रख दी। फिर मैं मेज़ के पास गया, जहाँ उस दिन के दो पहिये खड़े थे, जो अभी तक लेने नहीं आए थे।

तभी बाहर पैरों की आवाज़ आई। दो लोग।

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