The Mysterious Bell – Chapter 273
“मैंने भी उसे कह दिया है,” सरोज ने कहा। “पर मेरी बात अलग थी।”
“क्या कहा आपने?”
“मैंने कहा — जब बोलने खड़ी हो, तब हाथ में काग़ज़ न हो।” सरोज ने थैले को और कसकर पकड़ लिया। “पाँच साल से वो अपनी बात काग़ज़ में लपेटकर रखती है। पाँच साल से वो लिफ़ाफ़ा उसी थैले में घूम रहा है, डाक में नहीं डाला गया, किसी को नहीं दिखाया गया। अब अगर वो सच बोलेगी, तो ज़ुबान से बोलेगी। काग़ज़ दिखाकर नहीं बोलेगी। काग़ज़ सबूत होता है, अंकुश, ज़ुबान नहीं। और मुझे सबूत नहीं चाहिए, मुझे ये चाहिए कि मेरी बहन के सामने वो अपने मुँह से कहे कि उसने क्या किया।”
“और अगर वो नहीं बोली?”
“तो काग़ज़ मेरे पास रहेगा,” सरोज ने कहा। “और सात बजे के बाद मैं वो काग़ज़ उसी को दे दूँगी जो उससे सबसे ज़्यादा डरता है।”
मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसका चेहरा सख़्त था, पर आँखें सख़्त नहीं थीं। आँखों में वो थकान थी जो पाँच साल से एक ही काम कर रही हो — किसी की हिफ़ाज़त।
“दीदी,” मैंने कहा, “आप रमा मैडम की बहन हैं न?”
“हूँ।”
“और आप सात बजे उनका काग़ज़ लाएँगी?”
“ला तो रही हूँ,” उसने कहा। “पर एक शर्त है।”
“कहिए।”
“मेरी बहन उस सभा में बैठेगी, ये मैं पक्का नहीं कह सकती। पर अगर बैठी, तो उसके सामने कोई ऐसी बात मुँह से न निकले जिससे उसका घर फिर बिखरे। मेरी बहन का घर एक बार बिखर चुका है। दूसरी बार बिखरेगा तो जुड़ेगा नहीं।”
मैं चुप रहा। कुछ देर तक सिर्फ़ दीवार के पीछे से आती पतंग की डोर की सरसराहट सुनाई देती रही।
“कुछ और भी कहना है आपको,” मैंने कहा। “वरना आप दो बजे से यहाँ नहीं बैठी होतीं।”
सरोज ने पहली बार मेरी तरफ़ पूरा मुँह करके देखा।
“तेरी आँखें तेज़ हैं,” उसने कहा। “इसी से तो लोग डर रहे हैं।”
“कौन डर रहा है?”
“स्कूल की गली में आज दोपहर से एक आदमी घूम रहा है,” सरोज ने कहा। “मोटा, गले में सोने की चेन, पान चबाता हुआ। वो दरवाज़ों पर खड़ा होता है, बातें करता है, हँसता है, और फिर चला जाता है। उसने किसी को डराया नहीं। उसने किसी को धमकाया नहीं। उसने बस पूछा—”
“क्या पूछा?”
“उसने पूछा — भाई, अंकुश भैया ने तुम्हारे घर की बात कैसे जान ली? तुमने उन्हें बताया था? किसी को बताया था?”
मेरे हाथ में जो घंटी थी, वो ठंडी लगी।
“और लोगों ने क्या कहा?”
“किसी ने कुछ नहीं कहा,” सरोज ने कहा। “और यही सबसे बड़ी बात है, अंकुश। जब आदमी कोई जवाब नहीं देता, तो वो जवाब ख़ुद बना लेता है। दोपहर में एक ने कहा — अरे, वो तो हमारे घर का झगड़ा जानता था, हमने किसी को नहीं बताया था। दूसरे ने कहा — हमारी बहू की बात भी उसे पता थी। तीसरे ने कहा — वो ऐसा कैसे जानता है, कुछ तो है।”
“कुछ तो है,” मैंने धीरे से दोहराया।
“हाँ। और तीन घंटे में वो 'कुछ तो है' चार तरह से बोला जा चुका था।” सरोज ने थैले को सीने से लगाया। “एक ने कहा कि तू जादू जानता है। दूसरे ने कहा कि तू किसी की ज़ुबान खरीद लेता है। तीसरे ने कहा कि तू गली-गली घूमकर जासूसी करवाता है — वो बच्चे, वो तेरे पीछे घूमते हैं न, वही सब बताते हैं। और चौथे ने…” वो रुकी।
“चौथे ने क्या कहा?”
“चौथे ने कहा — इसका हाथ कहीं और लगा है। इसके पास कोई चीज़ है।”
मैंने जेब में पड़ी घंटी को हल्का सा दबाया।
“आपने किसी को जवाब दिया?”
“मैंने किसी से बात ही नहीं की,” सरोज ने कहा। “मैं यहाँ बैठी थी। मेरा काम बोलना नहीं है। मेरा काम देखना है।”
वो उठी, साड़ी झाड़ी, और फिर मेरी तरफ़ देखकर बोली, “सुन, एक बात और। वो मोटा आदमी जब यहाँ से गया, तब उसके हाथ में एक काग़ज़ था। मैंने दूर से देखा — सफ़ेद, मोटा, मोड़ा हुआ। और उस पर लोग अंगूठा लगा रहे थे। दो दरवाज़ों के बाहर लोगों ने अंगूठा लगाया। मैंने पूछा नहीं कि क्या है। पर मैंने देखा कि किसी ने पढ़ा नहीं।”
“किसी ने नहीं पढ़ा?”
“कोई नहीं, अंकुश। एक भी नहीं। जिसे पढ़ना आता भी था, उसने सिर्फ़ ऊपर की लाइन पर नज़र डाली और अंगूठा लगा दिया।”
वो चल पड़ी। कुछ कदम जाकर रुकी, बिना मुड़े बोली, “सात बजे। मैं आऊँगी। और हाँ — अगर तेरे मन में ये आए कि मैं ये सब तेरे लिए कर रही हूँ, तो निकाल दे। मैं अपनी बहन के लिए कर रही हूँ।”
मैं वहीं बैठा रहा। दीवार के पीछे पतंग की डोर की आवाज़ बंद हो गई थी।
जब मैं गुमटी की तरफ़ लौटा, तो शाम हो चुकी थी, पर अंधेरा नहीं हुआ था। वो वक़्त था जब दिन ढलता है पर रात आने में ज़िद करता है। शबनम आपा की गुमटी पर चार लोग बैठे थे और पाँचवाँ खड़ा था। चाय की केतली चढ़ी थी, समोसे की कड़ाही से भाप उठ रही थी, और आपा लोहे की चिमटी से कुछ उलट-पलट रही थीं।
टिंकू बेंच के किनारे बैठा था और उसके चेहरे पर वो भाव था जो मुझे पसंद नहीं आया — गुस्सा, और उसके नीचे थोड़ा डर।
“उस्ताद,” वो उठकर मेरे पास आया, “आपको पता है क्या बातें हो रही हैं?”
“पता है,” मैंने कहा। “सरोज दीदी ने बता दिया।”
“नहीं, आपको नहीं पता,” टिंकू ने कहा। “आपको पता नहीं कि किसने क्या कहा। वो चूड़ी वाली बाई कह रही थी कि आपने उसकी बेटी की बात कैसे जानी। और किराने वाले काका का बेटा कह रहा था कि आपको सब पता है, सब।”
“तो?”
“तो!” टिंकू का गला चढ़ गया। “तो मतलब क्या? मतलब ये कि आप किसी की चुगली करते हैं?”
शबनम आपा की चिमटी थाली पर पड़ी। ज़ोर से पड़ी। इतनी ज़ोर से कि बेंच पर बैठे दो लोग एक साथ चौंके।
“टिंकू,” आपा ने कहा, और उनकी आवाज़ में वो तेज़ी थी जो सिर्फ़ गुमटी के मालिक की होती है, ‘किसी के घर की बात’ कहने से पहले सोच लिया जाता है। और तू अभी बच्चा है, तेरे ऊपर भी ये बात आएगी। चुप करके चाय पी।”
फिर वो मेरी तरफ़ मुड़ीं। उन्होंने मुझे ऊपर से नीचे तक देखा, फिर कहा, “बैठ। चाय पी। तेरी चाय में आज मैं शक्कर कम डालूँगी। ज़ुबान की मिठास आज लोगों के पास ज़्यादा है।”
मैं बैठ गया।
सामने वाले छोटे तख़्त पर तीन लोग बैठे थे। एक चूड़ी वाली बाई थीं — लाल धागे हाथ में लिपटे हुए, और आँखों में वो हिसाब जो किसी किसान की होती है जब वो बीज बोने से पहले आसमान देखता है। दूसरे किराने वाले बूढ़े काका का बेटा था, कमर पर हाथ रखे, और तीसरा वही साइकिल पुर्ज़ों वाला भाई, पच्चीस-छब्बीस साल का, जो पिछले महीने दुकान पर आया था और जिसने मुझसे सिर्फ़ इतना कहा था, “भैया, ये चेन ज़रा देखिए।”
चूड़ी वाली बाई ने पहले बात खोली।
“अंकुश भैया,” उसने कहा, “मैं तो सीधी बात करूँगी। आपने मेरी बेटी की बात कैसे जानी?”
गुमटी पर चुप्पी हो गई। केतली की भाप की आवाज़ भी बंद हो गई, ऐसा लगा।
“कौन सी बात, दीदी?” मैंने पूछा।
“वो बात,” उसने कहा, और उसकी आवाज़ थोड़ी धीमी हो गई, “जो मैंने किसी को नहीं बताई। मेरी बेटी की शादी टूटी थी। अब हो रही है। और जो हो रही है, वो… वो ठीक है या नहीं, ये मैंने अपने दिल में ही रखा था। मैंने अपनी बहन तक से नहीं कहा। मैंने किसी को नहीं कहा।”
“तो आपको किसने कहा कि मुझे पता है?”
“किसी ने नहीं कहा,” उसने कहा। “पर सुबह तुमने मेरी तरफ़ देखा था न, चबूतरी से। तुमने मुझे ऐसे देखा था जैसे तुम्हें पता हो।”
मैंने उसकी आँखों में देखा। सच कह रही थी। यही तो सबसे मुश्किल बात है — लोग झूठ नहीं बोलते। लोग सिर्फ़ वो देख लेते हैं जो उन्हें दिखना होता है।
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno