The Mysterious Bell – Chapter 272
वो रुका।
“मुझे माफ़ कर दे, पापा,” उसने कहा।
रामलाल तीन क़दम चले और फिर जैसे उनके हाथ-पैर सब साथ छोड़ गए, वो बेटे के सामने बैठ गए। उन्होंने अपनी हथेली अजय के सिर पर रखी।
“मैंने भी कुछ नहीं पूछा,” उन्होंने कहा। “तू रात में किससे बात करता है, तेरे जूते कब फटे, तेरा दोस्त क्यों नहीं आता — मैंने कभी नहीं पूछा। मैंने सिर्फ़ ये पूछा कि भात बनेगा या रोटी। मैं तेरा बाप हूँ, अजय। बीस साल तेरे साथ रहकर मैं तेरा बाप नहीं बन पाया — मैं तेरा… कोई छतरी बन गया, जो बारिश में ही याद आती है।”
“चुप रहो,” अजय ने कहा, पर वो भी रो रहा था। “तुम बहाना मत दो। तुम बस ये बोलो कि अब क्या करना है।”
“अब ये करना है,” मैंने कहा, और दोनों ने मेरी तरफ़ देखा। “अभी बात करनी है, या सात बजे के बाद?” मैंने मेज़ पर रखी घड़ी उठाई। “क्योंकि ये घड़ी चलने का वक़्त आ गया है।”
रामलाल ने घड़ी देखी और हाथ मेरी तरफ़ बढ़ाया। मैंने घड़ी नहीं दी।
“नहीं,” मैंने कहा। “ये घड़ी तुम्हारी है, पर इसका वक़्त तुम्हारा किया हुआ नहीं है। इसे मेरे हाथ में ही रहने दो। जब चलेगी, तब तुम्हारे पास जाएगी।”
अजय उठा। उसने अपनी पैंट की जेब से कुछ निकाला — एक पुराना, मुड़ा हुआ पीला काग़ज़। “ये मुझे उसी संदूक में मिला था,” उसने कहा। “चिट्ठी के नीचे दबा था। मैंने इसे तुम्हें नहीं दिखाया, क्योंकि अब मुझे तुमसे कुछ भी नहीं लेना था।”
मैंने काग़ज़ खोला। काग़ज़ पर कोई लिखाई नहीं थी — बस एक पुराना स्कूल की मुहर जैसा धुँधला निशान और उसके नीचे नीली स्याही में तीन शब्द।
“क्या है?” रामलाल ने पूछा।
“अभी नहीं,” मैंने कहा, और काग़ज़ मोड़कर जेब में रख लिया। दरअसल मैं झूठ बोल रहा था। काग़ज़ पर लिखा था — तुम कहीं नहीं जाओगे ये कर के लिखा था, और उसके नीचे बड़े अक्षरों में एक आदमी का हस्ताक्षर था, जिसका पूरा नाम मिट चुका था, बस आख़िरी अक्षर बचा था — ल.
उस वक़्त घड़ी ने आवाज़ की।
बहुत धीमी, बहुत पतली — टिक।
तीनों चुप हो गए।
टिक। टिक।
सुई हिली, जैसे सोई हुई चिड़िया ने पंख हिलाए हों। फिर वो सामान्य चलने लगी। उसकी आवाज़ के साथ एक अजीब सी बात हुई — कोठरी की दीवार पर लगी तुलसी ने सूखे पत्ते में थोड़ा हिलना शुरू किया, जैसे हवा ने उसे याद किया हो। अजय का जूता उसकी जगह से सरका। रामलाल ने अपनी आँखों को छुआ।
“चल रही है,” रामलाल ने कहा, और उसकी आवाज़ बच्चे जैसी हो गई।
“क्यों चल रही है?” मैंने पूछा।
“पता नहीं,” उन्होंने कहा।
“अजय,” मैंने कहा।
उसने अपना सिर हिलाया, “पता नहीं।”
मैंने जेब से घंटी निकाली और हल्की सी हिलाई। कुछ नहीं बजा ऐसा, जैसे कोई चीज़ दबे पाँव कमरे में आ रही हो। और फिर आवाज़ आई, इतनी साफ़ जैसे मेरे ही कान के अंदर बोली जा रही हो।
“पंद्रह,” घंटी ने कहा। “पंद्रह जुड़े। दो सौ तिरसठ।”
मैं साँस रोककर बैठ गया। पंद्रह। इतने कम में?
“एक रिश्ते के लिए ये कम नहीं,” घंटी ने कहा, जैसे मेरा सवाल सुन लिया हो। “घड़ी की सुई तीन आदमियों ने नहीं घुमाई। एक बेटे ने अपने बाप की दवा पूछी, बाप ने अपने बेटे के जूते पूछे। तू बीच में खड़ा था। तीन जीवों का एक लम्हा, अंकुश। ये पंद्रह ही ठीक है।”
“आवाज़ साफ़ है,” मैंने धीरे से कहा।
“हाँ,” घंटी ने कहा। “अब तक जो सुनना था, सुन लिया है। जो सुनाना है, वो साफ़ आएगा।”
रामलाल मेरे सामने कुर्सी पर बैठ गए। उन्होंने घड़ी की तरफ़ देखा, फिर अजय की तरफ़। अजय ने अपने पापा के कंधे पर हाथ रख दिया, दोनों ही थोड़ा-थोड़ा अटपटा महसूस कर रहे थे — पच्चीस साल की दूरी एक दिन में खत्म नहीं होती, ये मुझे मालूम था। पर शुरुआत हो चुकी थी।
मैं उठा।
“मुझे सात बजे से पहले मीरा को ढूँढना है,” मैंने कहा।
“मीरा आएगी?” अजय ने पूछा।
“मुझे उम्मीद है,” मैंने कहा।
“पर वो सरोज की बात नहीं मानेगी,” रामलाल ने धीरे से कहा।
“क्या बात?”
“सरोज स्कूल की गली में खड़ी है न, कुछ देर से,” रामलाल ने कहा, “दो बजे से। वो कोठरी के पीछे वाले मोड़ पर बैठी है, पत्थर पर। मैंने उसे पानी दिया। उसने नहीं पिया। वो कहती है… कोई उससे बात करने आएगा।”
मेरे पेट में एक ठंडी सी लहर आई।
“कोई?” मैंने पूछा।
“उसने नाम नहीं लिया,” रामलाल ने कहा। “उसने कहा, जो अपने ही घर का सच खोलने निकला है, वो तो दिन में भी रात जैसा लगता है, घड़ी की सुई की तरह।”
मैंने कोठरी का दरवाज़ा खोला। बाहर गली में धूप अब पूरी तरह पीली हो चुकी थी और पीपल की जड़ें ज़मीन पर लंबी परछाइयों जैसी फैली थीं। मैंने घंटी को जेब में रखा और मुड़कर देखा। अजय मेरी तरफ़ देख रहा था।
“अपने पापा की घड़ी की खबर रखना,” मैंने कहा। “सात बजे, चबूतरी। तुम दोनों वहाँ रहना।”
“हम क्या कहेंगे?” अजय ने पूछा।
“जो अभी कहा — वही। कि बेटे ने बाप की दवा पूछी थी, और बाप ने बेटे के जूते।”
मैं गली की तरफ़ बढ़ा। टिंकू गुमटी के बाहर बेंच पर बैठा था और उसने मुझे देखकर हाथ उठाया।
“उस्ताद,” वो बोला, “कुछ हुआ?”
मैंने आसमान देखा। “हुआ क्या, ये तो सात बजे पता चलेगा।”
मैं स्कूल की पिछली गली की तरफ़ मुड़ा, जहाँ पीपल का पुराना पेड़ स्कूल की दीवार से टकराता है, और जहाँ गली की मिट्टी में पानी की एक पुरानी नाली सूखी पड़ी है। तभी घंटी फिर बोली — और इस बार उसकी आवाज़ बहुत पास लगी।
“अब सुन,” घंटी ने कहा। “मीरा के पीछे वाली औरत स्कूल के पीछे तेरा इंतज़ार कर रही है। और वो अपनी बात किसी और से नहीं, तुझसे कहेगी।”
मैं रुका।
“कौन?” मैंने पूछा।
“जा,” घंटी ने कहा। “तू जानता है।”
मैंने साँस ली और स्कूल की दीवार के पीछे की तरफ़ क़दम बढ़ा दिए। पीछे गुमटी पर चाय की केतली किसी को आवाज़ दे रही थी। आगे अंधेरा लंबे-लंबे क़दमों से गली की तरफ़ बढ़ रहा था। और मैं जानता था — वो औरत सरोज है, जिसके हाथ में रमा मैडम का पाँच साल पुराना काग़ज़ है और जिसके सीने में एक ऐसी बात है जो सिर्फ़ उसी से मेरे मुँह तक आएगी।
॥
सूखी नाली के किनारे-किनारे चलते हुए मैं स्कूल की पिछली दीवार तक पहुँचा। दीवार पर काई जमी थी, और नीचे की तरफ़ ईंटें थोड़ी-थोड़ी निकली हुई थीं, जैसे कोई बच्चा नाखून से खुरच-खुरचकर पढ़ाई करता हो। दीवार के पीछे वाले मोड़ पर एक पत्थर पड़ा था और उस पर एक औरत बैठी थी।
सरोज।
उसने साड़ी का पल्लू सिर पर ठीक किया हुआ था, पर मुँह ढका नहीं था। हाथ में कपड़े का एक थैला था, जिसे वो घुटनों पर रखे बैठी थी, दोनों हाथों से ऊपर से दबाए हुए, जैसे कोई चिड़िया पकड़ी हो और उड़ जाने से डर हो।
मैं दस कदम दूर रुक गया।
“आप सरोज दीदी हैं?”
“तू अंकुश है,” उसने कहा, सवाल नहीं, पहचान। “सुन रखा है तेरे बारे में। बहुत सुन रखा है, इन दो दिनों में ख़ासकर।”
“अच्छा सुना है या बुरा?”
“जो सुना है, वो मैं अपने कानों से सुनूँगी,” उसने कहा और पत्थर पर थोड़ी जगह छोड़ दी। “बैठ। खड़े-खड़े बात करने में आदमी जल्दी में लगता है। और मैं किसी को जल्दी में नहीं सुनती।”
मैं बैठ गया। पत्थर गरम था, दिन भर की धूप उसमें भरी हुई थी।
“मीरा आएगी सात बजे,” मैंने कहा। “मैंने उससे कह दिया है।”
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