The Mysterious Bell – Chapter 271
“जवाब नहीं चाहिए,” मैंने कहा। “मुझे सिर्फ़ एक बात बताइए। उस दिन जब आपने लिफ़ाफ़ा खोला और पढ़वाया, उस वक़्त आपके पेट में क्या था — ख़ुशी कि बेटे को नौकरी मिली, या डर कि बेटा जाएगा?”
रामलाल ने मेरी तरफ़ देखा।
दस सेकंड तक वो मुझे देखते रहे, और उनकी आँखों में जो चीज़ बैठी थी, वो गुस्सा नहीं थी। वो शरम थी।
“डर,” उन्होंने कहा। और वो शब्द मुँह से निकलते ही उनका चेहरा टूट गया, जैसे किसी पुरानी दीवार से प्लास्टर एक झटके में गिर जाता है।
“डर,” उन्होंने फिर कहा, इस बार आवाज़ नरम थी। “बहुत डर, बेटा। इतना डर कि मैं उस लिफ़ाफ़े को जलाने की सोचने लगा था।”
“क्यों?”
“क्यों?” उन्होंने हाथ की हथेली पर माथा टिका दिया। “क्योंकि उसके पीछे लिखा था — शहर। और शहर का मतलब मेरे लिए यही था कि वो चला जाएगा। मैं सोलह साल पहले उसकी माँ को खो चुका हूँ। तुम सोचते हो, उसके बाद मुझे किस चीज़ ने ज़िंदा रखा? इसी लड़के ने। ये मेरे पास सोता था, मेरे पास खाता था, मेरे पास बैठता था। अगर ये भी चला जाता, तो मैं इस कोठरी में…”
वो रुक गए। गला भर आया।
“आपने प्रिंसिपल से कुछ कहा था?” मैंने पूछा।
रामलाल ने सिर उठाया, और उनकी आँखों में एक पल के लिए चौंक गई — कि मुझे कैसे पता।
“हाँ,” उन्होंने कहा। “मैंने स्कूल के साहब से कहा था — अजय को टेम्पोरी रख लीजिए। दो हज़ार की बात मत बताइए, बस रोक लीजिए। मैंने कहा, वो मेरा इकलौता है, अगर ये भी चला गया तो मेरी चारपाई की दूसरी तरफ़ कोई नहीं होगा।”
“और साहब ने मान लिया?”
“उन्होंने कहा, रामलाल, तुम पच्चीस साल यहाँ हो। तुम्हारा लड़का यहीं रहेगा, अच्छा ही है।”
“आपने उन्हें ये नहीं बताया कि चिट्ठी में क्या लिखा था?”
“नहीं,” उन्होंने कहा। “मुझे डर था कि साहब भी कहेंगे — अरे वाह, दो हज़ार जमा करो और लड़के को भेज दो। मैं ये नहीं चाहता था। मैं चाहता था कि सब यहीं रहे। सब वैसा ही रहे जैसा है। बस।”
“और सब वैसा ही रहे इसके लिए आपने डेढ़ महीने बेटे को अपनी चिट्ठी से दूर रखा?”
“हाँ,” उन्होंने कहा, और इस बार आवाज़ में कोई बहाना नहीं था।
वो उठे, बाल्टी के पास गए, आधा गिलास पानी पिया और घूसकर हज़म नहीं कर पाए। मैंने उनका गिलास उठाकर रख दिया।
“मैंने कुछ साल पहले यही गलती की थी,” मैंने धीरे से कहा।
“क्या?”
“मैंने सोचा था, घर को बचाने के लिए अकेले लड़ना पड़ेगा। माँ को अकेले पहुँचाया, पापा से अकेले झगड़ा किया, कारोबार को अकेले सँभाला। और नतीजा यह निकला कि जिस घर को बचाने की ज़िद में मैं निकला था, उसी घर में मैं दीवारों से बात करने लगा।”
“तुमने मुझे ये क्यों बताया?” रामलाल ने पूछा।
“क्योंकि मुझे भी किसी ने बताया था,” मैंने कहा। “और उस वक़्त बताने वाले पर मैं गुस्सा हुआ था। इसलिए अगर आप भी गुस्सा हो रहे हैं, हो जाइए। पर बात सुनना मत छोड़िएगा।”
वो मेरी तरफ़ देखकर हँसे। एक छोटी, टूटी हुई हँसी। फिर उनका चेहरा फिर से गंभीर हो गया।
“अंकुश,” उन्होंने कहा, “तुम सोचते हो, मैंने सिर्फ़ उसकी नौकरी नहीं होने दी। मैंने ये नहीं देखा कि मैं उसे क्या दे रहा हूँ। मैंने सिर्फ़ ये देखा कि मैं क्या बचा रहा हूँ।”
वो कुर्सी पर फिर बैठ गए, और उनके हाथ मेज़ की टूटी धार को पकड़कर सिकुड़ने लगे। मैंने कुछ नहीं कहा। कभी-कभी किसान की बात सुनते वक़्त आपको खेत में भी चुप रहना पड़ता है, वरना फ़सल कट के बाहर बिखर जाती है।
तभी मुझे दरवाज़े की तरफ़ सरसराहट सुनाई दी।
अजय खड़ा था। कोठरी के दरवाज़े की बाहरी सीढ़ी पर था — नीचे से आकर, जैसे नींव से कोई आवाज़ आती है, और आधा शरीर उस लोहे के दरवाज़े से आगे आ चुका था।
वो फिर आया था। जिस आदमी ने कहा, मैं तेरी दुकान पर नहीं आया, वो इस कोठरी तक आ गया था।
“कब से खड़ा है?” मैंने पूछा।
“जब से बूढ़ा अपना पेट फाड़कर दिखा रहा है,” उसने कहा।
“मत बोल ऐसे,” मैंने कहा। “अपने बाप के लिए मत बोल ऐसे।”
“कैसा बाप?” अजय की आवाज़ ऊपर उठी। वो कोठरी के भीतर आया और मेज़ के ऊपर मुक्का नहीं मारा, बस हाथ मेज़ पर टिका दिया। “कैसा बाप जिसने मेरी चिट्ठी मुझसे छिपाकर रखी और मुझे पूरी गली के सामने बेकार बना दिया? दुबे अंकल, फ़ार्मेसी वाला, गली की वो बुढ़िया — सब बोलते हैं, अजय कुछ नहीं करता। पढ़ लिखकर बाप का गेट खोल रहा है।”
“वो सब बोलेंगे,” मैंने कहा।
“मैं सबके मुँह थोड़े ही बंद करवाऊँगा।”
“फिर तू क्या करना चाहता है?” मैंने पूछा।
“मुझे जानना है,” उसने कहा, “कि मेरी चिट्ठी किसने गेट तक भेजी? किसने तय किया कि मैं उसका हक़दार नहीं? जिसने भी ये किया, उसे मेरे सामने बोलना पड़ेगा।”
रामलाल उठे।
“मैंने भेजी थी,” उन्होंने कहा।
कमरे में हवा रुक गई।
“क्या?”
“मैंने भेजी थी,” रामलाल ने दोहराया। “डाक से नहीं। मैंने उसे तेरे पढ़ाई के काग़ज़ों के बीच रख दिया था, यह सोचकर कि तू या तो उसे देखेगा ही नहीं, या देखकर मुझसे बोलेगा। पर तूने स्कूल जाने की जल्दी में कभी अपने बाप के हाथ से लिफ़ाफ़ा नहीं लिया। तू हर सुबह गेट से निकल जाता, कभी मेरी कुर्सी की तरफ़ नहीं देखता।”
“तो मैंने वो पढ़ाई के काग़ज़ों के बीच रख दिया…” वो रुक गए।
अजय ने देखा, जैसे कोई उसके सामने से ज़मीन खींच ले गया हो।
“इसलिए कल मुझे वो संदूक में मिली?” उसने धीरे से पूछा।
“हाँ,” रामलाल ने कहा। “मैं असल वजह बताता हूँ। मैंने सोचा था, तुझे पता चला तो तू चला जाएगा। और मैं ये नहीं देख पाऊँगा। इसलिए मैंने उसे तेरे सामने से हटा दिया, बिना तुझसे पूछे। और अब जब वो संदूक से निकल आई, तो मैंने सोचा कि शायद अब भी कुछ हो जाएगा। कोई और तारीख़ आ जाएगी। कोई और स्कूल। कोई और रास्ता। पर…”
“पर कुछ नहीं होगा,” अजय ने कहा।
“कुछ नहीं होगा,” रामलाल ने धीरे से कहा।
अजय दीवार के सहारे खिसक गया और ज़मीन पर गिरकर बैठ गया। उसके हाथ उठे और उसके चेहरे पर आ गए।
मैंने सोचा, अब मुझे बोलना चाहिए — कि बुज़ुर्गों की गलती उनके डर से बड़ी नहीं होती, कि बेटों की जल्दबाज़ी बापों की चुप्पी से कम नहीं होती। पर बोला तो कुछ भी नहीं गया। मेरे मुँह में सिर्फ़ एक ही बात पैदा हुई, जो मैंने बचपन में अपने पापा से सुनी थी — चुप रहना भी बोलने का एक तरीक़ा है।
और ठीक उसी चुप्पी में अजय ने मुँह खोला।
“पापा,” वो धीरे से बोला, और उसकी आवाज़ में पहला अक्षर ही ऐसे फँसा, जैसे किसी सूखी ज़मीन में कील ठोकी जा रही हो। “पापा, मैं तुमसे पूछता हूँ — तुम्हारी दवा महीने की कितने की है?”
रामलाल ने देखा।
“ये क्या…”
“बस बताओ,” अजय ने कहा। “मैंने पूरा गेट खोला, पूरी सड़क साफ़ की, पूरी उमर गेट के नाम कर दी। मैंने तुम्हारी दवा की कीमत कभी नहीं पूछी। मैंने तुम्हारी कुर्सी कब खिसकी, नहीं देखा। जिस दिन से माँ गई, मैंने एक बार नहीं सोचा कि तुम अकेले क्या करते हो। मैंने सिर्फ़ अपनी चिट्ठी देखी। अपना शहर देखा। अपनी नौकरी देखी। पूरे पच्चीस साल में मैंने तुमसे एक ही चीज़ पूछी — मेरा गमछा कहाँ है।”
रामलाल हिल गए।
“मैं चुप इसलिए रहा, क्योंकि मुझे कहना पड़ता,” अजय ने कहा, “कि मैं कुछ नहीं कर रहा हूँ। मैं तेरे लिए कुछ नहीं कर रहा हूँ। और ये कहना मुझे मंज़ूर नहीं था। इसलिए मैं चुप रहा और तेरी चुप्पी को तेरा गुस्सा समझता रहा।”
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno