The Mysterious Bell – Chapter 270
रामलाल चाचा आए। अपनी उसी खाकी हाफ़ पैंट में। कुर्सी पर बैठे, हाथ घुटनों पर रखे, आँखें उस टूटी घड़ी पर।
अजय नहीं आया।
मैंने दस मिनट इंतज़ार किया। पंद्रह। गली का शोर धीमा होने लगा, फिर वो वक़्त आया जब सिर्फ़ चूल्हे और टीवी की आवाज़ें बचती हैं।
“नहीं आएगा,” रामलाल ने कहा। “उसने कह दिया था।”
“क्या कहा था?”
“कि जब तक घड़ी की सुई नहीं घूमी, उसका गुस्सा भी नहीं घूमेगा।”
मैंने पानी का गिलास उनकी तरफ़ सरका दिया। उन्होंने नहीं उठाया।
“चाचा,” मैंने कहा, “एक बात पूछूँ?”
“पूछो।”
“अगर उस चिट्ठी पर दो हज़ार जमा की बात नहीं होती — तो आप उसे देते?”
रामलाल ने बहुत देर सोचा।
“नहीं,” उन्होंने कहा।
हवा रुक गई। मैं भी रुक गया।
“क्यों?”
“क्योंकि शहर में नौकरी जोड़ नहीं, तोड़ है,” उन्होंने कहा। “जो आदमी घर से निकलता है और लौटने का वक़्त नहीं तय करता, वो लौटता नहीं। मेरा बेटा लौटने वालों में से नहीं है। मुझे यह डर नहीं था कि वो भूखा रहेगा। मुझे यह डर था कि वो यहाँ से निकलेगा और यहाँ की हवा उसके कपड़ों से चली जाएगी।”
“तो आपने चिट्ठी छिपा दी।”
“मैंने चिट्ठी छिपाई,” रामलाल ने कहा। “और उसका दाम मैं रोज़ चुका रहा हूँ। तीन महीने से वो मेरी तरफ़ नहीं देखता। मैं गेट पर बैठा रहता हूँ और वो मेरे पास से ऐसे निकलता है जैसे मैं दीवार हो।”
उन्होंने घड़ी उठाई।
“यह अब मेरी नहीं रही,” उन्होंने कहा। “मैंने इस पर से हक़ छोड़ दिया जिस दिन उसने इसे मेरे मुँह पर दे मारा।”
मैं कुछ कहने ही वाला था कि दरवाज़े की तरफ़ परछाई पड़ी।
अजय खड़ा था। दरवाज़े के बाहर, अंधेरे में, आधा अंदर आया हुआ, आधा बाहर। उसकी आँखें पापा पर थीं और हाथ जेब में।
“अंदर आओ,” मैंने कहा।
“मैं तुम्हारी दुकान पर नहीं आया,” उसने कहा।
“तो?”
“मैं खड़ा हूँ, यह देखने,” उसने कहा। “बूढ़ा मेरे बारे में क्या-क्या बता रहा है।”
“सच बता रहा है,” मैंने कहा। “और सच कभी तेरे हक़ में नहीं होता। तेरे बाप के भी नहीं।”
अजय ने मुझे देखा। फिर घड़ी देखी।
“तुम उस घड़ी को ठीक कर सकते हो?” उसने पूछा।
“कोशिश कर सकता हूँ,” मैंने कहा।
“मत करना,” उसने कहा।
उसकी आवाज़ तेज़ हो गई, पर अंदर से डगमग।
“पहले मेरी नौकरी का सच निकाल,” उसने कहा। “मुझे जानना है कि मेरी चिट्ठी कहाँ गई, किसने देखी, और किसने तय किया कि मैं उसका हक़दार नहीं। उसके बाद घड़ी की सुई घुमाना। सुई तो हर कोई घुमा देता है — पर जो आदमी बंद दरवाज़े के बाहर खड़ा रह गया, उसका वक़्त कोई नहीं घुमाता।”
मैंने घड़ी उठाई।
अजय ने मुँह फेरा और अंधेरे में चला गया।
रामलाल ने अपनी आँखें मसलीं, धीरे से, जैसे बिना नज़र आए रोने के लिए उन्हें मरोड़ना पड़ता हो। फिर वो उठे, कुर्सी खिसकी, और उस आवाज़ में बोले, “मैं कल गेट पर गुंडी पाँच बजे खोलूँगा।”
वो चले गए।
मेरी हथेली में वो घड़ी अब और ठंडी लग रही थी।
मैंने जेब से घंटी निकाली और हिलाया। एक आवाज़ आई — बहुत पतली, दूर की, जैसे कोई गिलास पालथी कमरे के दूसरे कोने में रख दे।
“सुन रही है?” मैंने जेब की तरफ़ देखते हुए पूछा।
टिंकू सामने की कुर्सी पर बैठ गया और साँस रोके मेरी तरफ़ देखने लगा।
आवाज़ नहीं आई। फिर आई, इस बार शब्दों में।
“घड़ी बंद नहीं है,” घंटी ने कहा। “सुई रुकी है।”
“फ़र्क़ क्या है?” मैंने पूछा।
“बंद वो होती है,” घंटी ने कहा, “जिसे कोई घुमाने वाला ही न हो।”
टिंकू ने धीरे से पूछा, “अब?”
मैंने घड़ी मेज़ पर रखी और उसके चारों तरफ़ झुककर बैठ गया। बाहर गली में कोई चूल्हा जला रहा था, कोई खाँस रहा था। सात बजे सभा थी, और उससे पहले मुझे एक लड़के का बंद दरवाज़ा खोलना था।
“अब,” मैंने कहा, “हमें उस चिट्ठी की तलाश करनी है, टिंकू। उस संदूक से नहीं, उस संदूक तक पहुँचने वाले हाथ से।”
टिंकू ने कहा, “भैया, चिट्ठी तो पापा ने ही लीफ़ाफ़े में रखी थी।”
“लिफ़ाफ़ा लिफ़ाफ़े में रखा था,” मैंने कहा, “पर लिफ़ाफ़ा किसने गेट तक भेजा? और वो क्यों पापा की कुर्सी के पीछे गिरा, किसी और के हाथ में पहुँचने के बजाय?”
मैंने घंटी उठाई और उसे मेज़ पर रख दिया। बाहर अंधेरा घुलने लगा था। और उसी अंधेरे में एक शक ऐसा था जो चिट्ठी से भी ज़्यादा भारी था — यह कि चिट्ठी अजय के लिए आई ही नहीं थी। यह उसके पापा के लिए आई थी, एक चेतावनी की तरह। और उस चेतावनी ने अपना काम कर दिया था — बाप-बेटे के बीच दरार डालकर।
॥
टिंकू की कुर्सी खिसककर पीछे गई और उसने मेरी तरफ़ देखा, जैसे मैंने कोई नया सवाल खड़ा कर दिया हो।
“भैया,” उसने कहा, “तुम कह रहे हो कि चिट्ठी अजय भैया के लिए नहीं, उनके पापा को डराने के लिए आई थी?”
“मैं कह नहीं रहा,” मैंने कहा। “मैं सोच रहा हूँ। और सोचने में और कहने में फ़र्क़ होता है, टिंकू। सोचने पर पकड़ नहीं लगती, कहने पर लग जाती है।”
मैंने घड़ी उठाई। पुरानी घड़ी, चमड़े का पट्टा जगह-जगह से टूटा हुआ, काँटे वहीं अटके जहाँ तीस साल पहले किसी रात अटके थे। मैंने उसे कान के पास ले जाकर हिलाया। अंदर से बहुत धीमी, मरी हुई सी खड़खड़ाहट आई, जैसे किसी बंद कमरे में कोई बूढ़ा करवट बदल रहा हो।
“ये घड़ी चलेगी?” टिंकू ने पूछा।
“ये घड़ी चलेगी या नहीं, वो बाद की बात है,” मैंने कहा। “पहले ये देखना है कि इस घड़ी से जुड़ा आदमी चलना चाहता है या नहीं।”
मैं उठकर दुकान के पीछे वाले कमरे से बाहर आया। गली में शाम का रंग ऐसा था जैसे किसी ने आसमान से नारंगी रंग पोंछकर दीवारों पर मल दिया हो। पीपल के नीचे चबूतरी पर बंसी बाबा और रहमत बाबा की जगह आज सिर्फ़ दो बोरे पड़े थे, बोझ की तरह। उस्ताद की दुकान का शटर आधा गिरा था और अंदर सिलाई मशीन पर धूल थी। शबनम आपा की गुमटी से भाप उठ रही थी, पर चाय की ख़ुशबू आज किसी को खींच नहीं रही थी।
सात बजे की सभा सबके सीने पर पत्थर की तरह बैठी थी।
मैंने टिंकू को गुमटी पर बिठाया और कहा, “तू यहीं बैठ। मैं रामलाल चाचा से बात करके आया।”
“अकेले?”
“अकेले,” मैंने कहा।
“और अगर वो न मानें?”
“तो मैं बात करूँगा। कुश्ती नहीं करूँगा।”
रामलाल स्कूल के गेट के अंदर वाली छोटी कोठरी में बैठे थे। चौकीदार की कोठरी — एक तख़्त, एक टूटी मेज़, दीवार पर हेडमास्टर साहब की पुरानी तस्वीर, गमले में मुरझाई तुलसी और कोने में पीतल की बाल्टी। मैं अंदर गया तो लोहे का गेट वैसी ही आवाज़ करके बंद हुआ, जैसे बूढ़ा खाँस रहा हो।
रामलाल ने सिर उठाया। उनकी आँखें लाल थीं, पर आँसू सूख चुके थे — उस तरह के आँसू जो आँख के कोनों में रह जाते हैं और चेहरे पर नमक की पतली लकीर छोड़ जाते हैं।
“मैंने कह दिया न,” उन्होंने धीरे से कहा। “कल गेट पाँच बजे खोलूँगा। और क्या?”
“और कुछ नहीं,” मैंने कहा। “बस आज बैठिए।”
मैं उनके सामने वाली टूटी मेज़ पर बैठ गया, जो आधी झुकी हुई थी और जिसकी एक टाँग के नीचे पुराना अख़बार दबा था।
“आपने चिट्ठी क्यों छिपाई?” मैंने सीधे पूछा।
“अरे, तुम भी…” उन्होंने हाथ हिलाया। “अजय भी यही पूछ रहा है। सब यही पूछ रहे हैं। पचास साल का आदमी हूँ, मेरे पास हर सवाल का जवाब थोड़े ही है।”
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