The Mysterious Bell – Chapter 269
“मैंने संदूक खोला,” अजय ने कहा। “माँ की साड़ियों के नीचे। काग़ज़ पड़ा था। मुड़ा हुआ, पर खुला नहीं।”
“खुला नहीं?” मैंने पूछा। “मतलब पापा ने पढ़ा नहीं?”
“खोला भी नहीं,” अजय ने कहा, और उसकी आवाज़ में पहली बार हल्की हिचक आई। “मुड़ा हुआ जैसा आया था, वैसा ही पड़ा था।”
मैंने रामलाल की तरफ़ देखा।
“चाचा,” मैंने कहा, “क्या आपने वो चिट्ठी पढ़ी?”
रामलाल ने ज़मीन देखी।
“नहीं,” उन्होंने कहा।
“क्यों?”
वो चुप रहे। लंबी चुप्पी। इतनी लंबी कि गली में किसी ने साइकिल की घंटी बजा दी और मुझे लगा मेरी ही जेब से आवाज़ आई। पर मेरी घंटी चुप थी।
“क्योंकि उस पर लिखा था,” रामलाल ने धीरे से कहा, “कि ज्वाइन करने से पहले दो हज़ार जमा कराने होंगे।”
अजय रुक गया।
“क्या?” वो फुसफुसाया।
“मैंने चिट्ठी का लिफ़ाफ़ा खोला,” रामलाल ने कहा। “पर काग़ज़ नहीं खोला। लिफ़ाफ़े पर ही अंदर की तरफ़ से आधी लाइन बाहर झलक रही थी। मुझे पढ़ना नहीं आता, बेटा, यह तू जानता है। फिर सानिया की माँ को दिखाया। उसने पढ़कर बताया। दो हज़ार जमा, फिर नौकरी।”
हवा स्कूल के आँगन में रुक गई।
“दो हज़ार,” अजय ने दोहराया। “आपने मुझसे क्यों नहीं कहा?”
“कहता तो तू क्या करता?” रामलाल ने पूछा, और इस बार उनकी आवाज़ में गुस्सा नहीं, थकान थी। “तू माँ की पायल बेच देता। मैं जानता हूँ तू क्या करता। तू पहली चीज़ पकड़ता जो सोने की होती। और मैं यह नहीं चाहता था कि उस घर से आख़िरी चीज़ भी निकले और तेरे हाथ में सिर्फ़ एक काग़ज़ बचे।”
अजय का हाथ काँपने लगा। काग़ज़ उसकी उँगलियों में फड़फड़ाया।
“तो आपने चुप रहना चुना,” उसने कहा।
“मैंने चुप नहीं रहना चुना,” रामलाल ने कहा। “मैं डर गया। इसमें चुनने की बात नहीं थी।”
मैंने उन दोनों के बीच में देखा। सच का ऐसा रास्ता होता है, टिंकू — जब वो खुलता है तो दोनों तरफ़ गंदगी होती है। कोई साफ़ नहीं बचता। पिता झूठा नहीं था, बेटा गुस्से में अंधा नहीं था। दोनों एक ही दरवाज़े के दो तरफ़ खड़े थे और दोनों को लग रहा था कि दूसरा बंद है।
“अजय,” मैंने कहा। “तुम्हारे हाथ में जो काग़ज़ है, वो तुम दबा हुआ रखो। अभी हमें घड़ी चाहिए।”
उसने मुझे घूरा, फिर अपनी जेब से घड़ी निकाली — वही पुरानी, टूटे चमड़े की पट्टी वाली, दस बजकर कुछ मिनट पर रुकी हुई — और मेरी हथेली पर पटक दी।
“यह भी आपके पास ही रखिए,” उसने कहा। “मेरे पास कोई वक़्त नहीं है। मेरा वक़्त वहीं रुका है जहाँ यह सुई है।”
वो पलटा और गेट से बाहर चला गया। रामलाल उसे देखते रहे, फिर धीरे से मेरी तरफ़।
“दोपहर की रोटी रखी है,” उन्होंने कहा। “ठंडी हो जाएगी।”
और वो भी अंदर चले गए, अपनी कुर्सी की तरफ़, और उस पर बैठकर पंखा चलाने लगे, जैसे अभी कुछ हुआ ही न हो। आदमी की सबसे बड़ी ताक़त यही होती है, टिंकू — किसी चीज़ के टूटने के बाद भी पंखा चला देता है।
टिंकू ने घड़ी मेरी हथेली से उठाई, पलटी, सुनी, और हँस पड़ा।
“उस्ताद,” उसने कहा, “अब आप घड़ी भी ठीक करेंगे और नौकरी भी। आपका तो नया धंधा खुल गया — एक हाथ में पेचकस, दूसरे में नौकरी का काग़ज़।”
“हाँ,” मैंने कहा और हँसी में टाल दिया। “और तेरे हाथ में मोज़ा।”
पर हँसी मेरे मुँह तक ही रही। अंदर कुछ बैठ गया था, चुभता हुआ। अगर पापा ने चिट्ठी पढ़ी ही नहीं, सिर्फ़ लिफ़ाफ़े की झलक देखकर चुप हो गए, तो सवाल यह नहीं था कि उन्होंने क्या छिपाया। सवाल यह था कि उन्होंने क्यों सोचा कि चुप रहना बेटे को बचाने का सबसे सस्ता तरीक़ा है।
और सबसे डरावनी बात — मैं यह सवाल समझ रहा था। क्योंकि मेरे घर में बैठा एक आदमी भी ठीक इसी सोच के साथ पाँच साल से चुप था।
टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा।
“भैया, आप चुप क्यों हो गए?”
“कुछ नहीं,” मैंने कहा। “बस सोच रहा हूँ कि घड़ी कहाँ ठीक करवाऊँ।”
“उस्ताद के पास चलिए,” उसने कहा।
दोपहर ढल रही थी। हम उस्ताद की दुकान पर गए। सिलाई मशीन की टिक-टिक आज भी वहीं थी, पर धीमी, जैसे किसी बूढ़े की साँस। उस्ताद चश्मे के ऊपर से हमें देख रहे थे और उनके हाथ में कपड़ा था जिसमें कोई पुरानी सिलाई खुल रही थी।
मैंने घड़ी उनकी मेज़ पर रख दी।
उन्होंने उसे उठाया, कान से लगाया, और फिर बहुत देर तक देखते रहे।
“यह घड़ी अजय की नहीं है,” उन्होंने कहा।
“जी?”
“यह रामलाल की है,” उस्ताद ने कहा। “उसे स्कूल के पुराने हेडमास्टर ने दी थी, जब वो नौकरी पर लगा था। तीस साल पहले।”
“तो इसमें क्या बात है?”
उस्ताद ने घड़ी को सामने रखा और उसका पिछला ढक्कन नाखून से खोला। अंदर की गोल प्लेट पर एक तरफ़ छोटा-सा खुदा हुआ निशान था, जो ज़ंग में लगभग मिट गया था।
“यह घड़ी उस रात रुकी,” उस्ताद ने कहा, “जब स्कूल की ज़मीन का पहला काग़ज़ बना था। पुराने हेडमास्टर ने उस रात यह उतारकर रामलाल के हाथ में दी और कहा — संभाल, मेरे बाद तेरे पास यही रहेगी।”
“और सुई?” मैंने पूछा।
“सुई तब रुकी,” उस्ताद ने कहा, “जब सुबह होते-होते काग़ज़ पर अंगूठे पड़ गए। घड़ी वाले ने उसे चलाया नहीं, क्योंकि वक़्त तब भी चल नहीं रहा था।”
उन्होंने हमारी तरफ़ देखा।
“तुम सोच रहे हो कि मरम्मत से घड़ी चलेगी। चलेगी। पर सुई घूमेगी उस पल से आगे नहीं, जो उस रात रुका था। उसके लिए तुम्हें दो आदमी जोड़ने पड़ेंगे जो उस रात खड़े थे — और वो दोनों अभी एक ही घर में खाना खा रहे हैं, बिना एक-दूसरे की आँख में देखे।”
मैंने घड़ी उठाई। हथेली में ठंडी थी।
“उस्ताद,” मैंने कहा, “आपको कैसे पता कि इस घड़ी के पीछे कोई काग़ज़ है?”
उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया। सिर्फ़ सिलाई मशीन चला दी और कपड़े की तरफ़ झुक गए। जवाब देने का उनका यही ढंग था — चुप्पी को अच्छे कपड़े की तरह हल्के हाथ से मोड़कर रख देते थे।
मैं बाहर आया तो शाम के चार बज चुके थे।
मेरी छाती में एक और वक़्त टिक-टिक कर रहा था — वो वक़्त जिसमें मेरे पास सात बजे तक का सबकुछ तय करना था। स्कूल की छत, मीरा की ज़ुबान, सरोज का काग़ज़, और घर का बंद दरवाज़ा।
मैं मीरा के घर गया। दरवाज़ा आधा खुला था। वो अंदर बैठी कैमरा साफ़ कर रही थी। उसके बगल में मेज़ पर काग़ज़ों का ढेर था, और उसके ऊपर वही कपड़े का थैला पड़ा था जिसमें रमा मैडम के नाम का पाँच साल पुराना लिफ़ाफ़ा था।
“आ रही हो?” मैंने पूछा।
“सात बजे सभा है,” उसने कहा। “आ जाऊँगी।”
“मीरा, तुम जानती हो मैं इसका सवाल नहीं कर रहा।”
उसने कैमरा रखा और मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों के नीचे कालापन था।
“मैं सात बजे आऊँगी,” उसने कहा। “पर एक बात साफ़ कर लो — मैं अपनी ज़ुबान से बोलूँगी या नहीं, यह सिर्फ़ मेरा फ़ैसला है। तुम मेरे लिए सच मत तैयार करो। मेरे पास सच ढेर सारा है, अंकुश। बोलने की हिम्मत का सवाल है।”
“और हिम्मत?”
“वो सात बजे पता चलेगी,” उसने कहा, और फिर मुस्कुराकर जोड़ा, “या सात बजकर एक मिनट पर।”
मैं हँसा। पर अंदर कुछ ऐसा था जो हँसी नहीं रहा था।
शाम छह बजे मैंने टिंकू को भेजकर रामलाल चाचा और अजय, दोनों को दुकान पर बुलवाया। मेरे पास एक ही योजना थी — दो कुर्सियाँ, दो गिलास पानी, एक टूटी घड़ी बीच की मेज़ पर, और बीच में कोई तीसरा नहीं। कभी-कभी तीसरी कुर्सी खींचनी पड़ती है, पर कभी-कभी तीसरी कुर्सी का होना ही दोनों को चुप करा देता है।
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