The Mysterious Bell – Chapter 268
“क्यों?”
“क्योंकि इसमें एक नाम गायब है,” सानिया ने कहा।
मैं झुककर बैठ गया।
टुकड़े जुड़ रहे थे। नाम उभर रहे थे। बीस-पच्चीस बच्चों के नाम। कुछ पूरे, कुछ आधे कटे।
और सबसे नीचे, दूसरी पंक्ति में, एक नाम ऐसा था जो फटा हुआ था और जिसका सिर्फ़ पहला अक्षर बचा था।
“यह किसका है?” मैंने पूछा।
“यही तो,” सानिया ने कहा। “यह नाम उस लड़के का है जो अभी स्कूल में बैठा था। चौकीदार का बेटा। मैंने पूछा तो मास्टर जी ने बताया — उसका दाख़िला भी उसी सूची से कटा था।”
मेरे मुँह से कोई आवाज़ नहीं निकली।
“भैया,” टिंकू ने कहा, “इसका मतलब क्या है?”
“इसका मतलब यह है,” मैंने कहा, “कि उस औरत की बात सही है। काग़ज़ सबको एक-दूसरे के खिलाफ़ खड़ा कर देता है। बच्चों के नाम तक।”
मैंने घंटी फिर जेब में डाली, उठा और शटर के नीचे से बाहर देखा।
गली के मोड़ पर एक औरत खड़ी थी। सरोज। वो वापस आई थी। हाथ में बस्ता, आँखें सीधी मेरी दुकान पर।
वो मेरे पास आई, तीन कदम दूर रुकी और बोली।
“अंकुश, तुमने सुबह कहा था कि माफ़ी चिल्लाने से नहीं आती।”
“हाँ।”
“तो सुनो,” उसने कहा। “मैं आज शाम सभा में आऊँगी। और मैं वो काग़ज़ लाऊँगी जो मेरी बहन ने पाँच साल से संभालकर रखा है। पर मैं एक शर्त पर आऊँगी — अगर तुम उस लड़की से यह कह सको कि वो मेरे और मेरी बहन के बीच खड़ी होकर, बिना किसी काग़ज़ के, सिर्फ़ अपनी ज़ुबान से बोले।”
“मैं कोशिश करूँगा,” मैंने कहा।
“कोशिश नहीं,” सरोज ने कहा, और इस बार उसकी आवाज़ में वो मिठास नहीं थी जो माफ़ी की बातों में होती है। सिर्फ़ साफ़ हिसाब था। “क्योंकि अगर यह लड़की आज शाम भी चुप रही, तो कल सुबह सात बजे जो मशीन चलेगी, उसके सामने मेरी बहन के घर की कोई कीमत नहीं रहेगी। मैं सच छाप दूँगी। और उस सच में यह भी होगा कि पाँच साल पहले उसने पैसे लेकर अपनी खबर की आधी लाइन काटी थी।”
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
“आप यह झूठ बोल रही हैं,” मैंने कहा।
“हो सकता है,” सरोज ने कहा। “पर मैं इसे इतनी बार बोल दूँगी कि सच लगने लगे। इस शहर में सच और झूठ का फ़र्क़ सिर्फ़ आवाज़ की ऊँचाई का है, अंकुश। और मेरी आवाज़ आज तेज़ है।”
वो पलटी और चली गई।
मैं वहीं खड़ा रहा।
“भैया,” टिंकू ने पीछे से कहा, “घंटी?”
“चुप है,” मैंने कहा।
“क्यों?”
“क्योंकि आज जो जुड़ना है,” मैंने कहा, “वो किसी घंटी से नहीं, किसी औरत की ज़ुबान से जुड़ेगा। और उसके लिए उसे खुद आना पड़ेगा।”
मैंने आसमान देखा। सूरज अभी ऊपर आया था और पूरा दिन पड़ा था। शाम की सभा, सात बजे की मशीन, चार बजे का पीला लिफ़ाफ़ा, घर का बंद दरवाज़ा, रुकी हुई घड़ी, और बीच में एक लड़की जो अपनी ही आवाज़ से डर रही थी।
मैंने मन में गिना — आज के दिन में तीन चीज़ें एक साथ करनी हैं।
और तीनों में एक ही आदमी का अंगूठा नहीं, सिर्फ़ एक ही आदमी की ज़ुबान चाहिए।
मेरी।
॥
सरोज चली गई, और मैं वहीं खड़ा रहा। धूप अब ऊपर आ गई थी और गली के पत्थर गरम होने लगे थे। दुकान के टिन के नीचे बैठना भी मुश्किल हो रहा था, जैसे कोई तवा गरम होकर सिर पर रख दिया हो।
टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा।
“भैया, अब?”
“अब स्कूल,” मैंने कहा। “यह लड़का जो घड़ी लेकर आया था, वो कहीं गया तो नहीं। उसकी आँखों में जो था, वो भूख जैसा था। भूखा आदमी रात नहीं काटता, टिंकू। वो सिर्फ़ सुबह का इंतज़ार करता है।”
हम निकले। गली में उस वक़्त सन्नाटा था — दोपहर का सन्नाटा, जिसमें सिर्फ़ पंखे और चूड़ियों की आवाज़ बचती है। शबनम आपा की गुमटी पर कोई नहीं बैठा था। उन्होंने हमें देखा, चिमटी नीचे रखी और आवाज़ दी।
“खाना खाया?”
“आपा, बाद में,” मैंने कहा।
“बाद में आदमी मर जाता है,” उन्होंने कहा और दो प्लेटें आगे बढ़ा दीं। “खा लो। शाम तक तुम्हारी ज़ुबान को काम करना है, पेट को नहीं तो कम से कम ज़ुबान को सहारा चाहिए।”
हमने वहीं खड़े-खड़े खाया। समोसा गरम था और चाय में अदरक तेज़। टिंकू ने दो लिए और तीसरा माँगने से पहले मेरी तरफ़ देखा, जैसे इजाज़त चाहिए हो।
“तीसरा भी ले ले,” मैंने कहा। “पर शाम तक तेरे मोज़े की चाबी तेरे पैर में ही रहनी चाहिए। समझा?”
“समझा,” उसने कहा, और मुँह भरकर बोला, “पर भैया, उस्ताद ने कहा था कि घर का दरवाज़ा आज रात खुलेगा।”
“उस्ताद ने यह भी कहा था कि पहले चौकीदार का नाम सामने आना है।”
हम स्कूल की तरफ़ बढ़े। पत्थर का पुल पार किया, नाली में पानी कम बह रहा था। स्कूल का लोहे का गेट खुला था और उसकी कुंडी हवा में हल्की-हल्की आवाज़ कर रही थी, जैसे कोई बूढ़ा सोते-सोते खाँसे।
गेट के अंदर, दीवार के साए में, दो आदमी खड़े थे। एक बूढ़ा, खाकी हाफ़ पैंट, कमर पर पट्टा, गले में सीटी, कमर झुकी हुई। दूसरा लड़का, उन्नीस-बीस का, पतला, हड्डियों में गुस्सा भरा हुआ, हाथ में एक काग़ज़ पकड़े हुए।
बूढ़ा वही था — रामलाल चौकीदार। बेटा अजय।
मैं दूर रुक गया। टिंकू ने भी कदम धीमा कर दिया।
अजय की आवाज़ दीवार से टकराकर लौट रही थी।
“आपने मुझसे कहा था कि चिट्ठी नहीं आई,” वो बोला। “आपने कहा था कि शहर से कोई जवाब नहीं आया। और यह क्या है? यह क्या है, बोलिए?”
रामलाल चुप खड़े रहे।
“यह इस साल की तीसरी तारीख़ की चिट्ठी है,” अजय ने काग़ज़ हिलाया। “मेरे नाम। मेरे पते पर। स्कूल के गेट पर आई थी, आपकी ही कुर्सी के पीछे गिरी थी। आपने इसे उठाकर संदूक में क्यों रखा?”
“बेटा, धीरे,” रामलाल ने कहा। आवाज़ ऐसी जैसे कंठ में रेत भर गई हो।
“धीरे नहीं!” अजय चिल्लाया। “मैं पाँच महीने से उस चिट्ठी का इंतज़ार कर रहा था। पाँच महीने! और आपने इसे छिपा दिया। क्यों? ताकि मैं यहीं पचास रुपये की टेम्पोरी नौकरी करता रहूँ? ताकि मैं आपकी जगह यही कुर्सी पकड़ूँ? आपको क्या लगा — मैं शहर जाकर आपको भूल जाऊँगा?”
रामलाल का हाथ हवा में उठा और फिर गिर गया। वो कुछ नहीं बोले।
मैं आगे बढ़ गया।
“रामलाल चाचा,” मैंने कहा। “दोपहर की धूप में गेट पर खड़े होकर लड़ना ठीक नहीं। छाया में चलिए। गुमटी पर चाय मेरी तरफ़ से।”
अजय ने पलटकर मुझे देखा। उसकी आँखें लाल थीं, पर रो नहीं रहा था। गुस्सा उस आदमी का था जिसके पास रोने का वक़्त नहीं।
“तुम कौन हो?” उसने पूछा।
“मैं उसी गली का हूँ,” मैंने कहा। “जहाँ तुम्हारे पापा तीस साल से सुबह पाँच बजे कुंडी खोलते हैं। मेरा नाम अंकुश है।”
“अंकुश यादव,” उसने कहा, और मुँह टेढ़ा कर दिया। “वही जो काग़ज़ों के खिलाफ़ खड़ा होता है। सुना है। पर मेरे पापा के पास कोई काग़ज़ नहीं, सिर्फ़ एक संदूक है, और उसी संदूक में मेरी ज़िंदगी बंद है।”
“अजय,” रामलाल ने धीमे से कहा। “स्कूल जल्दी बंद होने वाला है।”
“तो?” अजय ने कहा। “मेरी नौकरी से क्या लेना-देना है?”
“तो यह मत कर,” रामलाल ने कहा, और उनकी आवाज़ टूट गई। “यह ज़मीन जाती है तो मेरे साथ मेरे तीस साल भी जाएँगे। तेरे हाथ में सिर्फ़ नाम बचेगा — जिस स्कूल का चौकीदार मैं था, उसका। किसी शहर वाले को क्या बताएगा?”
अजय ने उनकी तरफ़ देखा।
“आप मेरी नौकरी नहीं, अपनी उम्र बचा रहे हैं,” उसने कहा।
मैंने बीच में हाथ डाला।
“रुको,” मैंने कहा। “अभी तुमने एक बात कही — कि चिट्ठी आई थी और छिपा दी गई। यह तुमने देखी या सोची?”
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