The Mysterious Bell – Chapter 267
“नहीं,” उसने कहा। “आज नहीं। मैं आज ऐसा नहीं बोल सकती जो माफ़ी जैसा लगे और माफ़ी न हो। जब बोलूँगी, तो पूरा बोलूँगी। और वो आज नहीं है।”
वो पलटकर चलने लगी।
सरोज ने उसे जाने दिया। फिर उसने अपना बस्ता उठाया, दुपट्टा ठीक किया और गेट की तरफ़ मुड़ी।
और रुककर बोली।
“सुन ले,” उसने मीरा की पीठ की तरफ़ कहा, और आवाज़ अब न चिल्ला रही थी, न धमका रही थी; वो बस ठंडी थी, जैसे कोई हिसाब लिख रहा हो। “आज शाम सभा में सबके सामने सच बोल। अपनी ज़ुबान से, अपने मुँह से, जैसा तुमने उस रात कलम से लिखा था। अगर नहीं बोली — तो मैं तेरे चैनल की सच्चाई छाप दूँगी। पूरी। यह भी कि वो चैनल किसके पैसे से चलता है, यह भी कि उसे बंद करने की धमकी किसने दी थी, और यह भी कि उसका मालिक इस शहर के सबसे बड़े ठेकेदार का एक फोन क्यों नहीं काट सका।”
मीरा के कदम रुक गए।
बिल्कुल रुक गए। जैसे किसी चलती साइकिल का पहिया अचानक जाम हो जाए।
वो पलटी।
उसका चेहरा पहले जैसा नहीं था। वो चेहरा सफ़ेद था, और आँखों में सिर्फ़ एक सवाल था — यह औरत कैसे जानती है?
“तुम्हें क्या लगा,” सरोज ने कहा, “सिर्फ़ तुम इस शहर में खबरें इकट्ठी करती हो? मैं स्कूल के गेट पर रोज़ खड़ी होती हूँ। यहाँ हर माँ पहले मुझसे बोलती है। मुझे वो दिन भी पता है जब तुम्हारे चैनल का ऑफ़िस बदला गया था और उसकी किराया-रसीद किस कंपनी के नाम पर कटी थी। मुझे वो भी पता है कि तुमने पाँच साल से किसी बड़ी खबर पर हस्ताक्षर क्यों नहीं किए। तुम हर बार लड़की बदलती हो, पर काग़ज़ वही रहता है।”
“आप यह सब कहाँ से लाईं?” मीरा ने पूछा, और उसकी आवाज़ में डर था — असली डर, वो डर जो किसी औरत के दुपट्टे से नहीं, किसी काग़ज़ से आता है।
“मेरे पास काग़ज़ नहीं है,” सरोज ने कहा। “जिसके पास काग़ज़ होता है, वो वकील होता है। मेरे पास सिर्फ़ बातें हैं और बहुत सारी औरतें हैं। तुम इस शहर में जितनी औरतों को जानती हो, मैं उनकी बहनों को जानती हूँ।”
फिर वो मेरी तरफ़ मुड़ी।
“तुम अंकुश हो न?”
“हाँ।”
“तुमने सुबह चबूतरी पर अच्छी बात कही थी,” उसने कहा। “कि काग़ज़ सबको एक-दूसरे के खिलाफ़ खड़ा कर देता है। मैं उस बात से सहमत हूँ। इसीलिए मैं आज ठीक इसके उलट कर रही हूँ। काग़ज़ नहीं, लोग।”
वो अंदर चली गई। गेट उसके पीछे बंद हो गया और वो आवाज़ आई जो स्कूल के गेट खुलने पर आती है — बूढ़े आदमी की खाँसी जैसी चरचराहट।
मीरा वहीं खड़ी रही।
“अंकुश,” उसने कहा, “मुझे उससे बात करनी है।”
“अभी?”
“अभी नहीं,” उसने कहा। “पहले मुझे यह पता करना है कि वो औरत सच में जानती कितना है। क्योंकि अगर उसे मेरे चैनल के काग़ज़ की गंध आ गई है, तो वो सिर्फ़ माफ़ी नहीं माँग रही। वो मुझे एक कोने में खड़ा कर रही है।”
“तो तुम उसे सच बता दो,” मैंने कहा।
“कौन सा सच?” मीरा ने पूछा, और मेरी तरफ़ देखा। “अंकुश, एक आदमी के पास एक सच होता है। मेरे पास तीन हैं। एक — मैंने आधी खबर लिखी। दो — मुझे धमकाया गया। तीन — मैंने धमकी को अपनी चुप्पी का बहाना बनाया, क्योंकि चुप रहना आसान था। तीनों सच हैं। आज शाम मैं कौन सा बोलूँगी?”
“तीनों,” मैंने कहा।
“तीनों बोलने के लिए ज़ुबान चाहिए,” उसने कहा। “और मेरी ज़ुबान आज सूख रही है।”
वो पलटकर चली गई। इस बार न रुकी।
मैं गेट पर खड़ा रहा। सामने स्कूल का आँगन था, जहाँ बच्चे लाइन में खड़े थे, और एक बेंच के कोने पर एक पतला लड़का बैठा था जिसकी जेब से एक रुकी हुई घड़ी की चेन झाँक रही थी।
मैं उसकी तरफ़ बढ़ा।
वो उठ खड़ा हुआ, जैसे मेरा इंतज़ार कर रहा था।
“तुमने अपना नाम नहीं बताया,” मैंने कहा।
“अभी नहीं,” उसने कहा।
“क्यों?”
“क्योंकि जिस नाम की नौकरी पिता की वर्दी के साथ कट गई हो, वो नाम जल्दी बोलने से घिस जाता है,” उसने कहा। “मैंने आपको कल कहा था, बात करने के लिए। आज सुनो। जिसने मेरे पिता का नाम चौदहवें काग़ज़ से काटा, वो काग़ज़ गए रात भी साहब की मेज़ पर रखा था। मैंने देखा। और वो मेज़ उस कमरे में है जिसकी खिड़की भवन के पीछे खुलती है। वहाँ रात को एक आदमी आता है और सबसे ऊपर रखा काग़ज़ पढ़कर वापस अपनी जेब में रख लेता है।”
“कौन?”
“वही, जिसकी उँगली में काली अंगूठी है,” उसने कहा।
मैंने घड़ी उसकी तरफ़ बढ़ाई।
“यह चलेगी,” मैंने कहा। “पर इसके लिए तेरे बाप को आना पड़ेगा।”
“मेरे बाप नहीं आएँगे,” उसने कहा। “वो सिर्फ़ खाँसते हैं।”
“तो तू ले आएगा,” मैंने कहा। “आज शाम की सभा में।”
वो देर तक मेरी तरफ़ देखता रहा।
“मैं आऊँगा,” उसने कहा, “पर एक शर्त पर। आप मुझसे यह नहीं पूछेंगे कि मेरा नाम क्यों छिपाना है। जिस दिन आप मेरी घड़ी चला देंगे, उस दिन मैं खुद बताऊँगा।”
“और अगर घड़ी न चली?”
“तो नाम की क्या ज़रूरत,” उसने कहा। “जो टूटा है, वो बोलता नहीं।”
वो अंदर चला गया।
मैं वहीं खड़ा रहा, और मेरे अंदर एक अजीब सी बात घूम रही थी। सरोज की बात। मीरा की बात। घंटी की चुप्पी। और उस लड़के की शर्त।
मुझे लगा कि आज मैं जिस काम पर निकला था, वो काम नहीं हो रहा है। आज कोई चीज़ टूट नहीं रही, कोई चीज़ जुड़ भी नहीं रही। आज सब बस खुल रहा है, जैसे किसी पुराने कमरे की खिड़की खुले और अंदर से धूल ही धूल निकले।
मैंने जेब से घंटी निकालकर हथेली पर रखी।
“तू चुप है,” मैंने कहा।
कुछ नहीं।
“मैं जानता हूँ तू क्यों चुप है,” मैंने कहा। “क्योंकि यहाँ माफ़ी नहीं है, सिर्फ़ हिसाब है। और हिसाब से घंटी नहीं बजती।”
घंटी चुप रही।
पर उस चुप्पी में भी एक बात थी, और वो मुझे साफ़ सुनाई दी — जैसे किसी ने बहुत दूर से कहा हो कि यह मामला मेरा नहीं है। यह मामला उन दो औरतों का है। एक जो गेट के अंदर माफ़ी ढो रही है, और एक जो गेट के बाहर डर ढो रही है। और मैं जो बीच में खड़ा हूँ, मैं सिर्फ़ रास्ता दिखा सकता हूँ। चलना उन्हें ही पड़ेगा।
तभी पीछे से आवाज़ आई।
“अंकुश भैया?”
सानिया दौड़कर आई थी। हाथ में उसकी रतजगा वाली लाल कॉपी थी और आँखों में वो चिंगारी थी जो किसी भी मुसीबत से पहले ही जल जाती है।
“क्या हुआ?” मैंने पूछा।
“वो औरत,” उसने हाँफते हुए कहा, “सरोज आंटी — ये रमा मैडम की बहन हैं। ये स्कूल के सामने वाली गली में रहती हैं। इनके पति की छोटी सी दुकान है।”
“अच्छा।”
“और भैया,” सानिया ने कहा, और आवाज़ धीमी कर दी, “ये आंटी रोज़ सुबह गुमटी पर आती हैं। शबनम आपा के साथ दो कप चाय पीती हैं और चले जाती हैं। मैंने कभी इन्हें किसी से ऊँची आवाज़ में बात करते नहीं देखा। आज पहली बार देखा।”
मैंने सानिया की तरफ़ देखा।
“यह कब से हो रहा है?”
“आज ही,” सानिया ने कहा। “आज सुबह जब वो इनकी बहन के घर से आई हैं।”
मैंने पीपल की तरफ़ देखा। धूप चढ़ रही थी और चबूतरी पर आज कोई नहीं बैठा था। यह भी एक अजीब बात थी — आज सुबह चबूतरी सूनी थी। जैसे बुज़ुर्गों को भी पता चल गया हो कि आज कुछ बड़ा होने वाला है और इसलिए वो घरों में बैठ गए हों।
मैं दुकान लौटा तो टिंकू शटर के नीचे बैठा था, सामने पाँच टुकड़ों में फटा हुआ काग़ज़ रखा था और उसे जोड़ने की कोशिश कर रहा था। सानिया ने उसके साथ बैठकर टुकड़े मिलाने शुरू किए।
“यह क्या है?” मैंने पूछा।
“बबलू वाला फाड़ा काग़ज़,” टिंकू ने कहा। “जिस पर बच्चों के नाम थे। सानिया ने इसे सँभालकर रखा था। हम इसे जोड़ रहे हैं।”
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