The Mysterious Bell – Chapter 266
वो गेट के पास रुकी, अंदर झाँका और फिर पलट गई, जैसे हिम्मत करके आई हो और हिम्मत खत्म हो गई हो।
तभी गेट के अंदर से एक औरत निकली।
उम्र पैंतालीस के आसपास, हाथ में बच्चे का बस्ता, सिर पर दुपट्टा आधा सरका हुआ, आँखों में वो थकान जो स्कूल के गेट पर रोज़ खड़ी औरतों की आँखों में होती है।
उसने मीरा को देखा।
और रुक गई।
“तुम?” उसकी आवाज़ पहले धीमी थी, फिर अगले ही पल ऊँची हो गई, इतनी ऊँची कि गेट के पास खड़े बच्चे पलटकर देखने लगे। “तुम हो? तुम? तुम्हारी वो आधी खबर ने मेरी बहन का घर तोड़ा था!”
मीरा एक कदम पीछे हटी।
औरत ने बस्ता ज़मीन पर रख दिया, जैसे पहले हाथ खाली करना ज़रूरी हो।
“तुम्हें पहचाना नहीं? मैं सरोज हूँ। रमा की बहन। तुमने जो लिखा था, उसके बाद मेरी बहन के घर में जो हुआ, वो तुमने देखा? तुमने एक बार पूछा था कि आरोप साबित हुए या नहीं?”
गेट पर भीड़ जमा होने लगी। दो मास्टर साहब बाहर आए, पर किसी ने बीच में आने की हिम्मत नहीं की।
मैं आगे बढ़ा।
“आंटी,” मैंने कहा, “यहाँ बच्चे हैं।”
“बच्चे हैं, तो अच्छा है,” सरोज ने कहा और मेरी तरफ़ ऐसे देखा जैसे मैं भी उसी खबर का हिस्सा हूँ। “बच्चे सुन लें कि ऐसी खबरें लिखने वालों का क्या हश्र होता है। तुम कौन हो?”
“मैं अंकुश हूँ। इसी गली में साइकिल ठीक करता हूँ।”
“तो साइकिल ठीक करो। लोगों के घर मत ठीक करने चले आओ।”
मीरा ने कुछ कहना चाहा। मुँह खुला, पर आवाज़ नहीं निकली।
“आंटी,” मैंने फिर कहा, “आपकी बात सही हो सकती है। पर यह कोई जगह है इसके लिए?”
“जगह?” सरोज हँसी, वो हँसी जिसमें हँसी नहीं थी। “तुम्हें जगह की फ़िक्र है? जिस दिन मेरी बहन को उसके घर से रस्सी उतारनी पड़ी थी, उस दिन जगह कौन देख रहा था? तुम्हारी यह लड़की तब कहीं बैठी चाय पी रही थी।”
मीरा ने आँखें नीची कर लीं।
“आप गलत समझ रही हैं,” मैंने कहा।
“मैं कुछ गलत नहीं समझ रही,” सरोज ने मेरी बात काट दी। “मैंने वो अख़बार अपने हाथ से पढ़ा है। मेरी बहन ने वो कतरन जलाई नहीं, संभालकर रखी। पाँच साल में एक बार भी नहीं फाड़ी। तुम जानते हो क्यों? क्योंकि गुस्सा जलता है, पर सच नहीं जलता। और वो काग़ज़ उसके लिए सच्चा था।”
“तो सच क्या है?” मैंने पूछा।
सरोज ने मीरा की तरफ़ देखा।
“पूछो इसे,” उसने कहा। “पूछो कि उसने खबर क्यों नहीं पूरी लिखी। पूछो कि उसने आँखें कब बंद कर लीं।”
मैंने मीरा की तरफ़ देखा।
वो खड़ी थी, दोनों हाथ थैले की पट्टी पर जमे हुए।
“मीरा,” मैंने कहा। “तुम बोलो।”
“मैं,” मीरा ने कहा, और आवाज़ फँस गई। उसने गला साफ़ किया। “मैंने खबर लिखी थी। पूरी नहीं लिखी। मैंने सिर्फ़ एक हिस्सा लिखा और उसे दे दिया।”
“और बाक़ी?”
“बाक़ी मैंने देखा नहीं।”
“देखा नहीं मतलब?”
“देखा नहीं,” उसने दोहराया। फिर बहुत धीरे से — “उस रात मेरे पास एक आदमी का फोन आया था। उसने कहा कि अगर मैंने यह खबर पूरी की, तो दूसरी खबर मेरे बारे में छपेगी। मैं डर गई। मैंने आँखें बंद कर लीं।”
“आँखें बंद करने का मतलब यह नहीं होता कि सच भी बंद हो जाए,” सरोज ने कहा।
“मुझे पता है,” मीरा ने कहा।
“तुम्हें कुछ नहीं पता,” सरोज ने कहा। “तुम्हें इतना पता होता तो अंदर चली आती। तुम आज स्कूल के गेट पर खड़ी हो, अंदर नहीं आई। क्यों? क्योंकि तुम्हें पता है कि अंदर रमा है। और तुम उसके सामने खड़ी नहीं हो सकती।”
यह बात सीधी मार थी। और मीरा को लगी।
“मैंने रमा मैडम से बात की है,” मीरा ने कहा। “मैंने उनसे माफ़ी माँगी है।”
“माफ़ी!” सरोज ने कहा, और उसकी आवाज़ में पहली बार कुछ और आया — थोड़ा सा दर्द। “मेरी बहन ने तुम्हें माफ़ कर दिया। उसने मुझसे कहा कि बात खत्म करो, लड़की की ज़िंदगी है। पर मैं नहीं करूँगी। मैं रमा नहीं हूँ। मैंने वो रात देखी है। मैंने उसे चूल्हे के पास बैठकर बिना आग जलाए देखा है। माफ़ी वो कर सकती है जिसने दर्द सहा हो, और मैंने सहा है।”
गेट पर अब तीस-चालीस बच्चे खड़े थे। दो माताएँ, एक चौकीदार, एक खड़ी उम्र का मास्टर जो बार-बार घड़ी देख रहा था पर कुछ कह नहीं रहा था।
मैंने सरोज को हल्के से कुहनी से पकड़कर गेट से दूर, नीम के पेड़ के नीचे ले जाने की कोशिश की।
“देखिए,” मैंने कहा, “आपकी बात सही है। पर ज़रा सोचिए — यहाँ खड़े होकर चिल्लाने से रमा मैडम का घर वापस आ जाएगा?”
सरोज रुकी। मेरी तरफ़ देखा।
“तुम बड़ी आसानी से बातें करते हो,” उसने कहा।
“मैं रोज़ करता हूँ,” मैंने कहा। “और रोज़ फेल भी होता हूँ। पर एक बात सीखी है — जो चीज़ टूटी है, उसे चिल्लाने से नहीं जोड़ा जा सकता।”
“और तुम जोड़ सकते हो?”
“नहीं,” मैंने कहा। “पर कोशिश कर सकता हूँ। उसके लिए आपको भी बैठना पड़ेगा।”
सरोज ने मेरे चेहरे को देखा, जैसे तोल रही हो।
“मुझे किसी के साथ बैठने की ज़रूरत नहीं,” उसने कहा। “मुझे सिर्फ़ यह चाहिए कि यह लड़की सबके सामने खड़ी होकर बोले कि उसने क्या किया। अपने चैनल पर, अपने माइक पर, उसी आवाज़ में जिस आवाज़ में उसने मेरी बहन के बारे में लिखा था।”
“और अगर वो बोल दे?” मैंने पूछा।
“तो मैं आज के बाद उसका नाम नहीं लूँगी,” सरोज ने कहा। “मेरी बहन माफ़ कर चुकी है, मैं भी कर लूँगी। पर झूठी माफ़ी नहीं चाहिए। सच्ची चाहिए।”
यह सुनकर मेरे अंदर कुछ टिक गया। सरोज आज की कहानी में सबसे ईमानदार आदमी निकली। वो माफ़ी नहीं माँग रही थी, वो माफ़ी का सच्चा रास्ता माँग रही थी।
मैंने जेब में हाथ डाला और घंटी पकड़ी। उँगली से हल्का सा टोका।
चुप।
बिल्कुल चुप। जैसे पत्थर।
मैंने फिर टोका, ज़ोर से। कुछ नहीं। अब तक जब भी मैंने घंटी छुई थी, वो कुछ न कुछ कहती थी — कभी सवाल, कभी एक लाइन, कभी बस एक हल्की सी सरसराहट। आज कुछ नहीं।
और तभी मुझे समझ आया।
घंटी चुप नहीं है। घंटी के पास कहने को कुछ नहीं है।
क्योंकि घंटी जोड़ तोड़ती है, और यहाँ अभी कोई जोड़ है ही नहीं। यहाँ दो इंसानों के बीच सिर्फ़ आरोप खड़े हैं — एक तरफ़ सरोज का आरोप, दूसरी तरफ़ मीरा की चुप्पी, और बीच में रमा की माफ़ी जो दरवाज़े के अंदर बैठी है और बाहर नहीं आ रही। तीनों अलग-अलग कमरों में बंद हैं। जब तक कोई एक कमरे का दरवाज़ा खुद न खोले, कुछ नहीं जुड़ेगा।
मैंने हाथ जेब से बाहर निकाला।
“मीरा,” मैंने कहा। “अंदर चल।”
“नहीं।”
“मीरा —”
“नहीं, अंकुश,” उसने कहा, और पहली बार उसकी आवाज़ में वो कड़क थी जो मैं जानता था। “आज नहीं। मैं अंदर नहीं जाऊँगी।”
“क्यों?”
“क्योंकि वहाँ रमा मैडम हैं,” मीरा ने कहा। “और मैं उनके सामने खड़ी होकर यह नहीं कह सकती कि मैंने क्या किया। पाँच साल से मैंने खुद को यही समझाया है कि मैंने आधी खबर लिखी थी, बाक़ी एडिटर ने जोड़ी। पर सच यह है कि मैंने वो आधी खबर भी इसलिए लिखी थी क्योंकि मुझे उस रात डर लगा था। और डर से लिखी चीज़ आधी नहीं होती, अंकुश। वो पूरी होती है। बस उसका कुछ हिस्सा ज़ुबान से निकलता है और बाक़ी खुद आदमी के अंदर कटता रहता है।”
यह बात उसने आँखें मिलाकर कही, बिना एक बार भी नीचे देखे।
“तो अंदर चलकर यही बोल दे,” मैंने कहा।
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