The Mysterious Bell265 / 1504

The Mysterious Bell – Chapter 265

7 min read November 5, 2026

गली के मोड़ पर पीपल दिखा। उसके नीचे चबूतरी खाली थी, पर धूल में किसी के बैठने का निशान बना हुआ था, और पान का सूखा दाग अभी भी वहीं था।

मैंने कदम तेज़ किए।

मुझे उस बंद दरवाज़े तक पहुँचना था, उस लड़के की घड़ी चलानी थी, और सात बजे से पहले उस आदमी को यह बताना था कि इस गली में काग़ज़ नहीं, लोग गिने जाते हैं।

तभी मेरी जेब में घंटी फिर बजी।

“एक बात कहूँ?” उसने कहा।

“कह।”

“आज तक तूने जो भी जोड़ा, वो दो लोगों के बीच था। आज पहली बार तुझे अपने घर के अंदर दो लोगों को जोड़ना है। और घर के अंदर का जोड़ सबसे मुश्किल होता है, क्योंकि वहाँ आदमी को माफ़ी नहीं माँगनी पड़ती — वहाँ उसे पहले यह मानना पड़ता है कि वो भी किसी का माफ़ी माँगने वाला है।”

मैं रुक गया।

“तू क्या कह रही है?” मैंने पूछा। “घर में किसको किससे जोड़ना है?”

घंटी एक पल चुप रही। फिर बोली, बहुत धीरे से —

“जिसने पच्चीस साल पहले एक दुकान गिरवी रखी, और जिसने आज तक उस दुकान को अपना बताकर भी अपना नहीं कहा।”

मैंने उस्ताद की तरफ़ देखा। वो चल रहे थे, आँखें सड़क पर, हाथ पीछे। जैसे सुन ही नहीं रहे हों।

पर उनके कदम ज़रा धीमे हो गए थे।

और मैं समझ गया कि आज घर में सिर्फ़ पापा और मैं नहीं बैठेंगे।

तीसरी कुर्सी भी खींचनी पड़ेगी।

॥

पीपल के नीचे पहुँचते-पहुँचते शाम ढल चुकी थी।

चबूतरी खाली थी, पर बच्चे वहीं बैठे थे। टिंकू सबसे आगे, हाथ में कोई पुरानी चाबी घुमाते हुए। सानिया की गोद में लाल कवर वाली कॉपी, गुड्डू के हाथ में पतंग की लपेटी हुई डोर, रफ़ीक़ के हाथ में माचिस की खाली डिब्बी और चिंटू के घुटने पर नई पट्टी, जो उसने खुद बाँधी थी और जो टेढ़ी हो गई थी।

टिंकू मुझे देखकर उछल पड़ा।

“उस्ताद! उस्ताद, सुबह सात बजे वाली बात सच्ची है क्या? मशीन आ रही है?”

“पहले साँस ले,” मैंने कहा। “मशीन आए या न आए, तू सात बजे से पहले स्कूल की छत पर नहीं चढ़ेगा। यह पहली बात।”

“दूसरी?”

“दूसरी यह कि तूने मेरे मोज़े में चाबी रखी है, वो मुझे पता है। उसे संभालकर रख। वो आज रात काम आएगी।”

टिंकू की आँखें चमक गईं। बच्चों ने एक साथ साँस छोड़ी, जैसे किसी क्रिकेट मैच में आख़िरी ओवर शुरू हुआ हो।

उस्ताद अली बक्श अपनी दुकान की तरफ़ बढ़ रहे थे। उनकी चाल में वो धीमापन था जो आज सुबह भवन की सीढ़ी चढ़ने के बाद आया था। मैंने उन्हें आवाज़ दी।

“उस्ताद, रुकिए।”

वो रुके, पर पलटे नहीं।

“घर का दरवाज़ा,” मैंने कहा। “आज रात या कल सुबह?”

“आज रात नहीं,” उन्होंने कहा।

“क्यों?”

“क्योंकि आज रात तेरे घर में जो बैठेगा, वो सिर्फ़ तीन आदमी नहीं होंगे। चौथा भी होगा — पच्चीस साल पुराना डर। और डर के सामने दरवाज़ा खोलना ठीक नहीं। पहले उस डर का नाम पता करना पड़ेगा।”

“नाम किसका?”

“उस लड़के का,” उस्ताद ने कहा, और अब वो पलटे। उनके चश्मे पर गली की धूल जमी थी। “चौकीदार का बेटा, जो आज भवन के पीछे से आया था। उसके हाथ में रुकी घड़ी थी। उसने कहा था — नाम बाद में बताऊँगा। मैं उसका नाम जानता हूँ। पर वो खुद बोले, तभी काम का है। कल सुबह स्कूल के गेट पर मिलेगा। उसके बाप की नौकरी का काग़ज़ वहीं है।”

“और घंटी क्या कहती है?”

“घंटी आज रात चुप रहेगी,” उस्ताद ने कहा। “क्योंकि घंटी सिर्फ़ तब बोलती है जब दो आदमी बात करने को तैयार हों। आज रात तेरे घर में कोई बात करने को तैयार नहीं है। सब बस बैठे हुए हैं।”

यह बात उन्होंने इतनी आसानी से कही, जैसे कोई कहे कि आज बारिश नहीं होगी। और मुझे लगा कि वो सही कह रहे हैं।

मैं घर पहुँचा।

पापा चारपाई के किनारे बैठे थे और सामने फ़र्श पर पुराना पंखा खुला पड़ा था। वही पंखा, जिसका तार महीनों से टूटा था और जिसे वो हर हफ़्ते ठीक करने का बहाना बनाकर खोलते और फिर वैसे ही छोड़ देते।

“कुछ मिला?” मैंने पूछा।

“नहीं,” उन्होंने कहा।

“पापा, आप इसे तीन महीने से खोल रहे हैं।”

“तार अंदर से जला है। बाहर से नहीं दिखता।”

मैं उनके पास बैठ गया। जेब से घड़ी निकाली और सामने रख दी। घड़ी दस बजकर कुछ मिनट पर रुकी हुई थी। काँच पर बारीक दरार थी, जो बाल जितनी पतली थी।

पापा ने घड़ी देखी। फिर देर तक देखी।

“यह चौकीदार की है,” उन्होंने कहा।

मैं चौंका। “आपको कैसे पता?”

“यह घड़ी मैंने पहले देखी है,” पापा ने कहा। “पाँच साल पहले। उसी दिन। उसी दफ़्तर में।”

मेरे हाथ ठंडे हो गए।

“वो दफ़्तर में थे?”

“वो बाहर थे,” पापा ने कहा। “दरवाज़े के पास, कुर्सी पर। काग़ज़ों का बंडल उनके घुटनों पर था। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा भी नहीं। बस यह घड़ी देखते रहे, जैसे उन्हें उसी से कोई जवाब मिलेगा।”

“और अंदर कौन था?”

पापा चुप रहे। उन्होंने पंखे का तार उँगली में लपेटा और फिर खोल दिया।

“अंदर वो मेज़ थी,” वो बोले। “जिस पर मैंने अंगूठा लगाया। उस मेज़ पर उस दिन काग़ज़ों का ढेर था। और उस ढेर में सबसे ऊपर वाला काग़ज़ मेरा नहीं था, अंकुश। वो चौकीदार का था।”

कमरे में बल्ब की गुनगुनाहट तेज़ लगने लगी।

“मतलब वही मेज़,” मैंने कहा। “जिस पर मेरे और आपके दोनों नाम हैं?”

“वही मेज़,” पापा ने कहा। “उस दिन वहाँ से जो भी निकला, सब उसी मेज़ से निकला। तेरा दुकान का काग़ज़, मेरा अंगूठा, उस चौकीदार की नौकरी, रमा मैडम के पति की फोटो। सब एक ही मेज़ से।”

मैंने घड़ी उठाई। वो ठंडी थी।

“उस्ताद कहते हैं यह तभी चलेगी जब नाम कटवाने वाला और अंगूठा लगाने वाला आमने-सामने बैठेंगे।”

“तो उस्ताद सही कहते हैं,” पापा ने कहा। और फिर, बहुत धीरे से, जैसे खुद से बोल रहे हों — “पर उस मेज़ पर बैठने के लिए हिम्मत चाहिए। मेरे पास आज भी नहीं है।”

“आपके पास है,” मैंने कहा। “बस आपने कभी इस्तेमाल नहीं की।”

पापा ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में कुछ ऐसा था जो मैंने पहले नहीं देखा — न शर्म, न डर, बस थकान। बहुत पुरानी थकान।

“अंकुश,” उन्होंने कहा, “कल सुबह स्कूल जा। पहले उस लड़के से बात कर। घर का दरवाज़ा कल रात खुलेगा। आज रात मुझे कुछ सोचना है।”

“क्या सोचना है?”

“यह कि उस मेज़ पर बैठकर मैं क्या बोलूँगा। क्योंकि जब मैं बोलूँगा, तो सिर्फ़ अपने लिए नहीं बोलूँगा।”

वो उठे और पंखा समेटकर दीवार के पास रख दिया। फिर बिना कुछ और कहे बाहर चले गए।

रात मैंने चारपाई पर लेटकर घंटी हथेली में रखी। वो चुप थी। न हल्की गुनगुनाहट, न कोई फुसफुसाहट। बिल्कुल चुप।

मैंने घंटी को हिलाया। कुछ नहीं हुआ।

“अच्छा,” मैंने कहा। “तू भी सो जा।”

पर नींद मुझे भी नहीं आई। मैं देर तक छत देखता रहा और सोचता रहा कि एक मेज़ पर बैठे हुए एक आदमी का अंगूठा, दूसरे आदमी की नौकरी और तीसरे आदमी का घर — तीनों एक साथ कैसे टूट सकते हैं।

सुबह मैं स्कूल के गेट पर पहुँचा तो सवा आठ बज रहे थे।

स्कूल का पुराना लोहे का गेट खुला था, पर बच्चे आज अंदर कम जा रहे थे और बाहर ज़्यादा खड़े थे। किसी को कुछ पता नहीं था, पर सबको कुछ पता होने का डर था। यही डर होता है, जो सबसे तेज़ फैलता है।

मैं गेट के पास खड़ा था कि सामने से मीरा आती दिखी।

आज वो कैमरा लेकर नहीं आई थी। हाथ में सिर्फ़ वही कपड़े का थैला था, जो पाँच साल से उसके कंधे पर लटक रहा था और जिसमें रमा मैडम के नाम लिखा बंद लिफ़ाफ़ा था। उसने सफ़ेद कुर्ता पहना था और बाल आज बाँधे हुए थे। बाँधे हुए बाल मतलब — आज वो कुछ करने आई है, दिखाने नहीं।

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