The Mysterious Bell – Chapter 264
“ठीक है,” उसने कहा। “मैं किसी को मजबूर नहीं करता। मेरा दरवाज़ा सात बजे तक खुला है। चार बजे बंद क्यों हो गया, पूछो मत। नींबू की चाय खत्म हो जाती है। लेकिन अगर तुम्हें लगता है कि यह मौका है, तो सात बजे तक आ जाओ।”
“और सात बजे के बाद?” मैंने पूछा।
“सात बजे के बाद?” उसने कंधे उठाए। “सात बजे के बाद काग़ज़ वापस नहीं आते, अंकुश। काग़ज़ भी आदमी की तरह होते हैं। वक़्त पर काम आ जाएँ तो अच्छे, वरना फ्रीज़।”
मैं उठा। उस्ताद भी उठे।
दरवाज़े तक पहुँचकर मैंने पलटकर देखा। मुझे कुछ पूछना था। घंटी ने कहा था — वो सवाल जो चुभता है। मैंने पूछा।
“साहब, आपके पास इतनी बड़ी इमारत है, इतनी बड़ी गाड़ियाँ, इतना बड़ा नाम। फिर भी आपकी नज़र मेरी छोटी सी दुकान पर क्यों है? उस दुकान से आपको क्या चाहिए?”
वो चुप रहा।
और मैंने अपने जीवन में पहली बार देखा कि एक आदमी जो हर सवाल का जवाब मुस्कुराकर देता है, एक सवाल ऐसा भी होता है जिसका जवाब वह नहीं देता।
उसने चाय का गिलास उठाया और खिड़की की तरफ़ मुड़ गया।
“चलो, उस्ताद,” मैंने कहा।
लिफ़्ट से उतरते वक़्त मेरी जेब में घंटी बजी। एक छोटी सी आवाज़, इतनी धीमी कि जैसे किसी ने साँस छोड़ी हो।
“क्या कहा?” मैंने धीरे से पूछा।
“सच्चा सवाल बंद दरवाज़ा खोल देता है,” घंटी ने कहा। “पर इस आदमी ने अपने दरवाज़े नहीं बंद किए। यह इमारत ऐसी है जिसमें हर दरवाज़े के पीछे एक और दरवाज़ा है।”
बाहर निकलते ही धूप आँखों में भर गई। उस्ताद ने अपना चश्मा पोंछा और सड़क के किनारे खड़े हो गए।
“मैंने कहा था ना,” उन्होंने कहा। “यह आदमी दरवाज़ा बंद नहीं करता। यह दरवाज़े के पीछे खड़ा रहता है। तू जब जाता है तो यह खुद आगे आकर दरवाज़ा खोलता है, मुस्कुराता है, चाय देता है। और तेरे जाने के बाद यह अपने काग़ज़ वापस नहीं रखता। यह उन्हें किसी और के मेज़ पर रख देता है।”
“उस्ताद, वो काग़ज़ जो दीवार पर टँगा था…”
उस्ताद ने मेरी बात काटी।
“मैंने देख लिया,” उन्होंने कहा। “वो मेरा काग़ज़ है। और मैं अब जान गया कि इलियास की घंटी रात में क्यों बजती है। इलियास उस काग़ज़ को ढूँढ रहा है, पचास साल से। और इलियास का काग़ज़ इन लोगों की दीवार पर टँगा है।”
“तो छीन लें?”
“छीन नहीं सकते,” उस्ताद ने कहा। “जो चीज़ किसी की दीवार पर टँगी हो, उसे छीनने से एक और झगड़ा बनता है। उसे तोड़ना पड़ता है — पर तोड़ेगा कौन? वो काग़ज़ तभी उतरेगा जब वो दीवार खुद किसी के सामने झुके, किसी की बात सुने।”
उन्होंने घड़ी देखी।
“अभी चार बजकर पच्चीस हुए हैं,” उन्होंने कहा। “घर चल। सात बजे से पहले एक चीज़ तय करनी है।”
हम मुड़ ही रहे थे कि भवन के पीछे की तरफ़ से एक लड़का हमारी तरफ़ आता दिखा।
वो पतला था, उम्र बीस के आसपास, हाथ-पैर लंबे, शर्ट के पीछे धूल के निशान। उसके हाथ में एक पुरानी घड़ी थी, चमड़े का पट्टा टूटा हुआ। वो हमारे सामने आकर रुका, पर उसकी आँखों में वो चीज़ थी जो अभी-अभी किसी से झगड़कर आए आदमी की होती है।
“तुम अंकुश हो,” उसने कहा। “घंटी वाले।”
मैंने उस्ताद की तरफ़ देखा। उन्होंने आँखों से इशारा किया — रुक जा, सुन।
“पहचाना कैसे?” मैंने पूछा।
“इस भवन में तुम्हारी पहचान बाहर तक है,” उसने कहा, आवाज़ में ज़हर सा चढ़ा हुआ। “साहब आज किसी को बुलाया है, सबको पता है। बड़े आदमी के दरवाज़े पर होने वाली बात सबसे पहले चौकीदार को पता चलती है। और मैं तुम्हें बताने आया हूँ कि तुम्हारे आने से पहले यहाँ एक काग़ज़ आ चुका है — जिस पर दो नाम हैं। एक तुम्हारी माँ का, एक तुम्हारा।”
मैंने कुछ नहीं कहा।
“जानते हो यह कौन है?” उसने घड़ी ऊपर उठाई। “यह मेरे पापा की घड़ी है। स्कूल का चौकीदार, जो सुबह पाँच बजे गेट की कुंडी खोलता है, जिसकी खाँसी स्कूल की पहली घंटी से पहले बजती है। पिछले महीने उसको हटाने का काग़ज़ आ गया। तीस साल की नौकरी, एक काग़ज़ में खत्म। और उसी दिन यह घड़ी भी रुक गई। ऐसे रुकी जैसे जानबूझकर रुक गई हो।”
वो एक कदम आगे आया।
“तुम्हारी दुकान सातवें नंबर पर है, पता है मुझे,” उसने कहा। “मेरे पापा का नाम चौदहवें काग़ज़ में था। जिसने मेरे पापा का नाम काटा, उसी ने तुम्हारी दुकान का नंबर लिखा। मैं तुमसे यह नहीं कहने आया कि मेरी मदद करो। मैं तुमसे यह कहने आया हूँ कि मैं देख रहा हूँ कि तुम क्या करते हो। मैं रोज़ सुनता हूँ — अंकुश ने यह जोड़ दिया, अंकुश ने वो जोड़ दिया। मेरे पापा के कान सब सुनते हैं, और वो सब मुझे सुनाते हैं।”
उसकी आवाज़ काँपी, पर वो रुका नहीं।
“मेरी नौकरी और यह घड़ी, दोनों एक ही दिन टूटे थे,” उसने कहा, और घड़ी मेरी तरफ़ बढ़ा दी। “अब तुम दोनों जोड़कर दिखाओ।”
मैंने घड़ी देखी। पुरानी, घिसी, काँटे रुके हुए — दस बजकर कुछ मिनट। काँच पर एक पतली दरार थी जो नीचे तक जाती थी।
मेरी जेब में घंटी बजी।
“अब यह बात घड़ी की नहीं है,” घंटी ने कहा। “यह बात दो लोगों के बीच की है जो एक ही छत के नीचे रहते हैं और एक-दूसरे से कुछ नहीं कहते।”
मैंने घड़ी अपने हाथ में ली। उसका पट्टा मेरी हथेली पर ठंडा लगा।
“तुम्हारा नाम क्या है?” मैंने पूछा।
वो एक पल रुका, जैसे सोच रहा हो कि नाम बताना चाहिए या नहीं।
“फिर बताऊँगा,” उसने कहा। “पहले यह घड़ी चलाओ। और सुन — मेरे पापा से कुछ मत पूछना। वो तीस साल से चुप रहकर नौकरी कर रहे हैं। उन्हें बोलना नहीं आता, अब उन्हें सिर्फ़ खाँसना आता है।”
वो पलटा और चला गया, भवन के पीछे की तरफ़, वहाँ जहाँ ट्रकों की मिट्टी सूख रही थी।
मैंने घड़ी उस्ताद की तरफ़ बढ़ाई।
“देखिए, उस्ताद। चल सकती है?”
उन्होंने चश्मा नीचे किया, काँच के पास घड़ी लाई और एक लंबी साँस ली।
“चल सकती है,” उन्होंने कहा। “पर यह तभी चलेगी जब दो आदमी आमने-सामने बैठेंगे। एक जिसने नाम कटवाया, और एक जिसने काग़ज़ पर अंगूठा लगाया।”
“कौन?”
“अभी नहीं,” उस्ताद ने कहा, और घड़ी मेरे हाथ में वापस रख दी। “पहले घर चल। घर का सबसे पुराना दरवाज़ा आज खुलना है। घड़ी बाद में।”
हम सड़क पार करने लगे। पीछे मुड़कर मैंने एक बार भवन देखा। दूसरी मंज़िल की खिड़की पर कोई खड़ा था — पर धूप की वजह से चेहरा दिखा नहीं। सिर्फ़ एक सफ़ेद कुर्ते की बाँह दिखी, और एक उँगली जो दीवार से टिकी थी।
और उस उँगली में एक काली अंगूठी थी।
मैंने नज़र फेर ली।
“उस्ताद,” मैंने धीरे कहा, “आज घर का दरवाज़ा खुलेगा, तो उसमें क्या मिलेगा?”
“जो मिलेगा, वो तेरा है,” उन्होंने कहा। “पर अंकुश, एक बात याद रख। दरवाज़ा खोलने से पहले आदमी को यह तय करना पड़ता है कि वो अंदर जो देखेगा, उसे सँभाल सकेगा या नहीं। क्योंकि जो सच एक बार देख लिया, उसे वापस अंधेरे में नहीं रखा जा सकता।”
मैंने जेब में हाथ डाला। घंटी ठंडी थी।
“और एक बात,” उस्ताद ने कहा, जब हम अपनी गली की तरफ़ मुड़े। “उस लड़के की घड़ी मत भूलना। आज के काग़ज़ों में सबसे पहला नाम उसी का है। जो सबसे पहले टूटता है, वही सबसे पहले जुड़ता है।”
मैंने घड़ी अपनी जेब में घंटी के पास रखी। दोनों ठंडी थीं, पर दोनों में फ़र्क़ था — घंटी में एक हल्की सी गुनगुनाहट थी, और घड़ी में सिर्फ़ ख़ामोशी।
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