The Mysterious Bell – Chapter 263
लिफ़्ट के अंदर शीशा था। मैंने खुद को देखा — फटी जीन्स, ग्रीस के निशान, बेतरतीब बाल। और उस्ताद, सफ़ेद दाढ़ी, मोटा चश्मा, कान पर पेंसिल। हम दोनों उस सफ़ेद लिफ़्ट में ऐसे लग रहे थे जैसे किसी और ही दुनिया से आए हों।
दूसरी मंज़िल पर सीढ़ी के पास, दीवार पर, काँच के नीचे एक पुराना काग़ज़ टँगा था, काला फ़्रेम लगा हुआ। फीका पीला काग़ज़, नीली स्याही। और उस पर एक घंटी बनी हुई थी।
उस्ताद रुक गए।
उन्होंने फ़्रेम की तरफ़ देखा, फिर मेरी तरफ़। उनके चेहरे पर कोई भाव नहीं था, पर उनका हाथ मेरी कलाई पर इतना कसकर आया कि मुझे दर्द हुआ।
“यह…” उन्होंने धीरे से कहा।
“क्या है, उस्ताद?”
“वही काग़ज़ है,” उन्होंने कहा। “जो पचास साल पहले मेरे हाथ में था। इसी पर घंटी का चित्र है। इसी पर मेरा और इलियास का हाथ है।”
मैंने ध्यान से देखा। काग़ज़ के नीचे की तरफ़ कुछ लिखा था, पर काँच और धूल की वजह से पढ़ा नहीं जा सका।
“उस्ताद, यह यहाँ कैसे?”
“जब किसी चीज़ को अपना बनाना हो,” उस्ताद ने कहा, “तो पहले उसे दीवार पर टाँग दो। लोग देखेंगे और मान लेंगे कि जिसकी दीवार है, वो उसी का है।”
तभी दरवाज़ा खुला।
कमरा बड़ा था, फ़र्श सफ़ेद, और बीच में एक बड़ी सी मेज़। मेज़ के पीछे सफ़ेद कुर्सी पर रणवीर भारद्वाज बैठा था। सफ़ेद कुर्ता, साफ़ कटा बाल, और वही मुस्कान — वो मुस्कान जो पहले पहली बार देखने पर अच्छी लगती है और दूसरी बार देखने पर आदमी को अपनी जेब टटोलने पर मजबूर कर देती है।
“अंकुश!” वो उठा, जैसे मुझे देखकर सच में खुश हुआ हो। “आ जाओ, आ जाओ। कुर्सी खींचो। बैठो।”
मैं बैठा नहीं।
“और ये?” उसने उस्ताद की तरफ़ देखा। उसकी मुस्कान एक इंच भी नहीं हिली। “उस्ताद जी। नमस्कार। आपकी दुकान पीछे वाली गली में है ना? पचास साल से? मैं सुनता हूँ आपकी मशीन का कोई जवाब नहीं।”
“मशीन जवाब नहीं देती, साहब,” उस्ताद ने कहा। “मशीन सीती है। जवाब आदमी देता है।”
रणवीर हँसा। वो हँसी जो खुली हुई थी, बड़ी थी, कमरे में फैल गई।
“बैठिए, उस्ताद जी। भरी धूप से आए हैं। रामू!” उसने दरवाज़े की तरफ़ आवाज़ दी। “दो गिलास नींबू की चाय। ठंडी चाय, पानी नहीं।”
वो फिर बैठा। उसने अपनी जेब से एक डिब्बा निकाला, चमकीली सफ़ेद पन्नी चढ़ी हुई, और खोलकर मेरी तरफ़ बढ़ाया।
“केसर और इलायची वाली टॉफ़ी,” उसने कहा। “बच्चों को देता हूँ। तुम लो।”
“मुझे मीठा नहीं खाता,” मैंने कहा।
“नहीं खाता या नहीं लेता?”
मैंने उसकी आँखों में देखा। वो अपनी बात पर मुस्कुरा रहा था, और उस मुस्कान में जो चीज़ थी, वो धमकी नहीं थी। वो सिर्फ़ यह एहसास था कि उसके पास बैठने की जगह है और मेरे पास खड़े रहने की।
“दोनों,” मैंने कहा।
उसने हल्का सा सिर हिलाया, जैसे किसी छोटे बच्चे ने शरारत की हो और बड़ा आदमी माफ़ कर देता है। फिर उसने मेज़ पर एक फ़ाइल रखी।
पीली फ़ाइल। ऊपर मेरी माँ का नाम। उसने हाथ से इशारा किया, जैसे कहे — खोलो।
“मैं जानता हूँ आप क्या चाहते हैं,” मैंने कहा। “पर मैं उसे खुद सुनना चाहता हूँ।”
“बिल्कुल,” उसने कहा, और फ़ाइल खुद खोली। “फार्मेसी आज सुबह से परेशान है। तुम्हारी माँ की दवा तीन दिन से चल रही है। अगली खेप आ गई है, पर खेप देने से पहले खेप की ज़िम्मेदारी लेनी पड़ती है। ज़िम्मेदारी यानी अंगूठा। और उस काग़ज़ पर तुम्हारा नाम है, इसलिए तुम्हारा अंगूठा।”
“किस काग़ज़ पर?”
“वही जो हमारे बीच इस बात का हिसाब है,” उसने कहा। “तुम्हारी माँ का इलाज, दवा, जाँचें, और…” वो रुका, “…और जगह।”
“कौन सी जगह?”
“यही चार बजे की बात है, अंकुश,” उसने कहा। “सीधी बात। तुम्हारी दुकान जिस जगह पर है, वो जगह इस शहर के विकास की एक कड़ी है। तुम्हारी माँ की जगह, मेरी इमारत की कड़ी है। और मैं तुमसे कुछ छीनना नहीं चाहता। मैं तुम्हें कुछ देना चाहता हूँ। तुम लिखवा दो, मैं शुरू करवा दूँ। और बस — दवा, इलाज, सब चलता रहेगा।”
“और अगर मैं न लिखवाऊँ?”
वो पीछे झुक गया। सफ़ेद कुर्सी चरमराई।
“तो काग़ज़ फ्रीज़ हो जाएँगे,” उसने धीरे से कहा। “और फिर मैं कुछ नहीं कर सकता। फार्मेसी मेरी नहीं है, अंकुश। काग़ज़ का नियम है। काग़ज़ जब फ्रीज़ होते हैं, तो दवा नहीं मिलती। और जब दवा नहीं मिलती…” वो रुका, “फिर मैं क्या करूँ? इलाज मेरे हाथ में होता तो मैं आज ही कर देता। पर इलाज काग़ज़ के हाथ में है। और काग़ज़ तुम्हारे अंगूठे के हाथ में।”
कमरा चुप हो गया। बाहर किसी गाड़ी का हॉर्न बजा और दूर जाकर खत्म हो गया।
मुझे माँ की आवाज़ याद आई। सुबह पाँच बजे चूल्हे के पास उनकी बड़बड़ाहट — “मेरे यहाँ दाल में पानी नहीं मिलता, और बात में भी नहीं।” मुझे याद आया कि कैसे वो हिसाब की कॉपी पर रात में झुककर बैठती हैं और उनकी उँगली पर नीली स्याही लग जाती है।
और मुझे याद आया — उस लिफ़ाफ़े में सात सौ इकहत्तर रुपये थे। माँ ने पाँच साल से जोड़े थे। वकील के लिए। अंगूठा मिटाने के लिए। माँ पाँच साल से जानती थी कि उनका अंगूठा कहीं लगा हुआ है। वो खुद को भी माफ़ नहीं कर पाई थी।
“मैं नहीं लगाऊँगा,” मैंने कहा।
रामू चाय लेकर आया था। उसने गिलास मेज़ पर रखे और चुपचाप चला गया।
रणवीर ने चाय का गिलास उठाया, घूँट लिया और फिर मुझे देखा।
“तुम्हें पता है, मैं तुम्हारी तारीफ़ करता हूँ,” उसने कहा। “तुम जैसे तेज़ लड़के शहर में कम हैं। मैं ऐसे लड़कों को अपने साथ रखता हूँ। और मैंने तुम्हारे लिए सिर्फ़ अंगूठा नहीं माँगा। एक फ्लैट भी रखा हुआ है, भवन के पीछे। तुम्हारी माँ के लिए। तुम्हारी बहन की नौकरी के लिए भी एक लाइन लिखी है। तुम कलम उठाओ, बाकी सब मैं संभाल लूँगा।”
मैंने घंटी महसूस की। मेरी जेब में वो चुप थी। बिल्कुल चुप।
“आपने यह सब सोचा हुआ है,” मैंने कहा। “अच्छा सोचा है। पर एक चीज़ भूल गए।”
“क्या?”
“मेरे पास एक दुकान है,” मैंने कहा। “और उस दुकान पर एक लकड़ी का बोर्ड टेढ़ा टँगा है, जिस पर लिखा है — साइकिल मरम्मत। मैं किसी चीज़ पर अंगूठा लगाकर उस बोर्ड को नहीं बेच सकता। क्योंकि उस बोर्ड पर मेरा नाम नहीं है। उस पर मेरे पापा का नाम है। और उससे पहले मेरे दादा का।”
“भावुकता,” रणवीर ने कहा, और उसकी मुस्कान ज़रा पतली हो गई। “भावुकता से गाड़ी नहीं चलती, अंकुश।”
“गाड़ी से चलती है,” मैंने कहा। “पर गाड़ी आदमी को घर नहीं पहुँचाती। घर वहाँ होता है जहाँ दुकान होती है।”
कमरे में फिर चुप्पी आई।
तभी उस्ताद बोले। उनकी आवाज़ बहुत धीमी थी, इतनी धीमी कि रणवीर को सुनने के लिए आगे झुकना पड़ा।
“साहब,” उन्होंने कहा, “ये काग़ज़ आपने तैयार करवाया है?”
“मेरे दफ़्तर ने,” रणवीर ने कहा।
“मतलब आपने,” उस्ताद ने कहा।
रणवीर हँसा। “उस्ताद जी, आप पचास साल से सुई चलाते हैं। आपको काग़ज़ की बात क्या समझ आएगी?”
“मुझे काग़ज़ नहीं समझ आता,” उस्ताद ने कहा। “मुझे सुई समझ आती है। सुई से जो सीया जाए, वो टिकता है। और जो चिपकाया जाए, वो पहले ही धुलाई में खुल जाता है।”
रणवीर ने एक पल उनकी तरफ़ देखा। बस एक पल। पर उस पल में उसकी मुस्कान में जो चीज़ आई, वो मुस्कान नहीं थी। वो हिसाब था। जैसे कोई आदमी सोच रहा हो कि इस बूढ़े को भी सूची में लिखना पड़ेगा।
फिर उसने मुस्कान वापस पहन ली, जैसे कोई चश्मा उतारकर फिर पहन लेता है।
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