The Mysterious Bell – Chapter 261
मैंने चारों तरफ़ देखा। गली खाली थी। धूप पत्थर के पुल पर आ गई थी। दूर कहीं शबनम आपा की गुमटी से चाय की केतली की आवाज़ आ रही थी।
“मीरा,” मैंने कहा, “अगर मैं नहीं गया, तो वो जो दूसरा काग़ज़ है — माँ का — वो मेरे हाथ में कैसे आएगा?”
वो एक पल रुकी।
“मुझे नहीं पता,” उसने कहा। “पर मैं इतना जानती हूँ — जो चीज़ सौदे से मिलती है, वो कभी मरम्मत नहीं होती। वो सिर्फ़ हाथ बदलती है।”
मेरी जेब में घंटी थी। मैंने उसे निकाला और हथेली पर रखा। वो ठंडी थी, और उस पर धूल की एक पतली परत जमी थी।
मैंने उसे हल्का बजाया।
आवाज़ आई — छोटी, रूखी, बिना जल्दबाज़ी के।
“सौदा सच को नहीं जोड़ता। सौदा सच को बेचता है।”
मैंने घंटी को जेब में रखा।
“तू ठीक कह रही है,” मैंने कहा। “मैं चार बजे अकेला नहीं जाऊँगा।”
मीरा ने राहत की साँस ली।
“पर मैं जाऊँगा,” मैंने कहा।
उसका चेहरा बदला।
“अंकुश…”
“सुन,” मैंने कहा, “मैं वहाँ काग़ज़ लेने नहीं जा रहा। मैं वहाँ यह देखने जा रहा हूँ कि वो जो दो काग़ज़ तैयार कर रहे हैं, उन पर कौन-कौन के नाम हैं। क्योंकि अगर मेरी दुकान का काग़ज़ तैयार है, तो उस पर सिर्फ़ मेरा नाम नहीं होगा। उस पर तेरा नाम भी होगा — तेरे चैनल का। और भोला भाई की दुकान का। और स्कूल का। और अस्पताल का। वो एक सूची है, मीरा। और वो सूची जितनी बड़ी होगी, उतने लोगों को वो अलग-अलग डरा सकेंगे।”
वो चुप खड़ी रही।
“तू मेरे साथ चलेगी?” मैंने पूछा।
“अंकुश, यह मामला मेरी मरम्मत के बाहर है,” उसने कहा, और उसकी आवाज़ में वो थकान लौट आई जो पत्थर पर बैठने से पहले थी। “मैं पाँच साल से खुद को ठीक करने की कोशिश में लगी हूँ। मैं इस वक़्त तेरी गली की मरम्मत में नहीं पड़ सकती। मुझे माफ़ कर दे।”
“मैं तुझे माफ़ करने को नहीं कह रहा,” मैंने कहा। “मैं तुझे साथ चलने को कह रहा हूँ।”
“यही तो फ़र्क़ है, अंकुश,” उसने कहा। “तू हर चीज़ को जोड़ने की बात करता है। मुझे पाँच साल से यह समझ आया है कि कुछ चीज़ें जुड़ती नहीं, बस बंद हो जाती हैं। और अगर तुझे अपनी गली बचानी है, तो उसे मेरे बिना बचा।”
मैंने उसकी आँखों में देखा।
वो सच कह रही थी, और यही सबसे मुश्किल बात थी। वो सच कह रही थी, पर उस सच में एक पुरानी चोट थी जिसे मैं अपने हाथ से नहीं छू सकता था।
“ठीक है,” मैंने कहा। “मैं तेरे बिना जाऊँगा।”
वो चौंकी।
“पर एक बात सुन,” मैंने कहा। “जिस दिन तू तैयार हो, उस दिन मुझे बताना। बिना सवाल के। चाहे वो रात के दो बजे हो। मैं आ जाऊँगा।”
उसने कुछ नहीं कहा।
मैं पत्थर के पुल से उतरा और दस कदम चला।
और फिर उसने मुझे रोका।
“अंकुश।”
मैं रुका।
“मैंने कल रात देखा,” उसने कहा, धीरे से। “वो सफ़ेद गाड़ी वाला — रणवीर — भारद्वाज भवन से निकलकर सीधा बिजलीघर की तरफ़ गया। वहाँ वो आधा घंटा रहा। मैं दूर से देख रही थी, और उसके जाने के बाद बिजलीघर के दरवाज़े से एक आदमी निकला — अधेड़, पुराने सिले हुए जूते। वो उसी तरह चल रहा था जैसे कोई नींद में चलता है।”
मेरा पूरा शरीर ठंडा हो गया।
“वो आदमी जो रोज़ सुबह आठ बजे बिजलीघर के दरवाज़े पर दो बार खटखटाता है,” मैंने कहा।
“हाँ,” मीरा ने कहा। “वही।”
वो दो कदम आगे आई और उसने मेरी तरफ़ वो मुड़ा हुआ पन्ना फिर बढ़ाया।
“यह अब मेरे पास नहीं रहेगा,” उसने कहा। “मैं इसे तेरे पास छोड़ रही हूँ। और अब सुन आख़िरी बात।”
उसने मेरी आँखों में देखा।
“चार बजे भारद्वाज भवन मत जाना,” उसने कहा, और उसकी आवाज़ में अब कोई नरमी नहीं थी, सिर्फ़ एक ठंडी सी चेतावनी थी। “क्योंकि वहाँ जो मिलेगा वो जोड़ नहीं है, अंकुश। वहाँ जो मिलेगा वो सौदा है। और तेरी घंटी सौदे नहीं जोड़ती।”
वो मुड़ी और चली गई।
मैं वहीं खड़ा रहा, पन्ना हाथ में, और गली की धूप मेरे चेहरे पर पड़ रही थी।
मेरी जेब में घंटी थी। मैंने उसे नहीं छुआ।
क्योंकि इस बार मुझे पता था कि घंटी क्या कहेगी। और मैं उसे सुनना नहीं चाहता था। क्योंकि घंटी हमेशा सच कहती है, और सच कभी-कभी बहुत थका देता है।
पर घंटी ने खुद ही बजकर कहा, बहुत छोटा सा, बहुत धीरे से —
“दो लोग। एक जिसे दुख है, एक जिसे सब पता है।”
“उसने मना कर दिया,” मैंने कहा।
“मैंने यह नहीं कहा कि वो चलेगी,” घंटी ने कहा। “मैंने सिर्फ़ बताया कि वो दुख वाली है। मना करने से दुख कम नहीं होता, अंकुश। दुख सिर्फ़ भारी होता जाता है।”
मैंने पन्ना जेब में रखा और दुकान की तरफ़ मुड़ा।
वो पाँच साल पुराना अख़बार का पन्ना जेब में मेरी जाँघ से चिपका हुआ था, जैसे कोई ठंडा सिक्का।
मुझे उस्ताद से एक बात पूछनी थी।
मुझे पता था कि वो बात वो नहीं होगी जो मैं पूछना चाहता हूँ। मुझे पता था कि उस्ताद वही बताएँगे जो मुझे सुनना चाहिए, न कि जो सुनना है।
और ठीक दुकान के मोड़ पर मुझे अपना फ़ोन काँपता हुआ महसूस हुआ।
स्क्रीन पर काजल का नाम।
मैंने फोन उठाया और उसकी आवाज़ सुनते ही पैर रुक गए।
“अंकुश,” काजल ने कहा, और उसकी आवाज़ में वो काँप था जो डर का नहीं, हड़बड़ी का था। “फार्मेसी वालों ने कहा कि माँ की नई खेप आ गई है। पर देने से पहले वो एक काग़ज़ पर अंगूठा माँग रहे हैं। और वो काग़ज़ आज सुबह दफ़्तर से ख़ुद आया है।”
“किसका दफ़्तर?”
काजल एक पल चुप रही।
“उसी का,” उसने कहा। “भारद्वाज कंस्ट्रक्शन का। और अंकुश, उस काग़ज़ पर माँ के नाम के साथ एक और नाम लिखा है।”
“किसका?”
“तेरा,” उसने कहा, और फिर वो रो पड़ी। “तेरा नाम अंकुश। और उसके आगे लिखा है — जोड़ने वाले का हस्ताक्षर।”
मैंने फोन कान से हटाया और एक पल आकाश देखा।
सुबह के दस बजे आसमान साफ़ नीला था, कहीं कोई बादल नहीं। फिर भी मुझे लगा कि पूरी गली के ऊपर कोई छाया खिंच गई है, जिसे सिर्फ़ मैं देख सकता हूँ।
मैंने फोन फिर कान पर लगाया।
“काजल,” मैंने कहा, “उस काग़ज़ को मत छूना। माँ को भी मत छूने देना। और फार्मेसी वालों से कहना — जोड़ने वाला अभी रास्ते में है।”
वो रोती रही।
“और काजल,” मैंने कहा, “माँ से कहना कि आज शाम वो फिर से टिफ़िन बनाएँगी। मैं उन्हें उस काग़ज़ पर अंगूठा नहीं लगाने दूँगा। चाहे मुझे कुछ भी करना पड़े।”
फोन रखकर मैंने घंटी को जेब से निकाला और देखा। उसका रंग आज थोड़ा गहरा लग रहा था, जैसे हमारे बीच का हिसाब जानता हो।
“अब बोल,” मैंने कहा। “चार बजे। भारद्वाज भवन। दो लोग। कौन?”
घंटी ने एक पल सोचा, फिर कहा, बहुत सीधे से —
“जिसे सब पता है, वो उस्ताद है। और जिसे दुख है, वो अभी भी तेरी गली के मोड़ पर खड़ी है।”
मैं पलटा।
दूर, पत्थर के पुल के पास, धूप में, एक पतला सा साया अभी भी खड़ा था। मीरा कहीं नहीं गई थी। वो सिर्फ़ मुड़कर छुप गई थी — उसी तरह जैसे हम सब छुपते हैं जब अपनी ही बात मान लेने से डरते हैं।
मैंने घंटी जेब में रखी और उसकी तरफ़ चलना शुरू किया।
अब मुझे उस्ताद के पास नहीं, पहले उसके पास जाना था।
क्योंकि घंटी ने यह नहीं कहा था कि मुझे दो लोग चाहिए।
घंटी ने यह कहा था कि उन दोनों को मेरे साथ चलना चाहिए।
और दुख वाले आदमी को साथ चलाना सबसे मुश्किल काम होता है — क्योंकि उसका बोझ उसके कंधों पर नहीं, उसकी चुप्पी में होता है।
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