The Mysterious Bell – Chapter 260
“क्योंकि जो काग़ज़ पर लिखा हुआ हो, उसे ज़ुबान से बोलने के लिए पहले उस काग़ज़ से माफ़ी माँगनी पड़ती है,” उस्ताद ने कहा। “और माफ़ी अपनी जगह से माँगी जाती है, भीड़ से नहीं। तू जा। और सुन — अकेले मत जाना, पर भीड़ भी मत ले जाना।”
वो मुस्कुराए और दुकान की तरफ़ चले गए।
मैंने टिंकू को देखा।
“बच्चों को लेकर दुकान पर जाओ,” मैंने कहा। “सानिया के पास जो काग़ज़ के टुकड़े हैं, उन्हें किसी किताब के बीच दबाकर रखना। और उस्ताद से कहना कि दस मिनट में दुकान पर आएँ, मुझे एक बात पूछनी है।”
“और आप?”
“मैं मीरा दीदी के पास जा रहा हूँ।”
टिंकू ने कुछ पूछा नहीं। वो बस एक पल मेरे चेहरे को देखता रहा, फिर सिर हिलाकर भाग गया।
मैं चबूतरी से नीचे उतरा और गली के मोड़ की तरफ़ चला।
पापा ने पीछे से कुछ कहा — सिर्फ़ इतना कि “ज़्यादा देर मत करना, दस बजे के बाद धूप चढ़ जाती है।”
मुझे हँसी आई। पापा के पास हर बात के लिए एक वजह होती है, और वजह कभी बात नहीं होती।
मीरा गली के उस पत्थर के पुल के पास रुकी थी, जहाँ नाली पर पत्थर की दो पुरानी पट्टियाँ पड़ी हैं। वो पट्टियों पर खड़ी थी, एक हाथ पत्थर पर, दूसरे हाथ में मुड़ा हुआ वो पन्ना। और वो पन्ना उसके हाथ में इस तरह काँप रहा था जैसे कोई पुराना बुखार लौट आया हो।
“मीरा।”
वो मुड़ी नहीं।
“मीरा, मैं जानता हूँ तू सुन रही है।”
“अंकुश,” उसने कहा, और उसकी आवाज़ सपाट थी, जैसे किसी ने उसका सारा सुर निकाल दिया हो। “मत आना।”
मैं फिर भी आया।
मैं उसके पास पत्थर की पट्टी पर खड़ा हो गया। दोनों के बीच एक हाथ का फ़ासला था। उसने मेरी तरफ़ नहीं देखा।
“तू सभा में आई थी,” मैंने कहा। “फिर चली गई। रमा मैडम ने तुझे बुलाया। उन्होंने ‘बेटा’ कहा। तूने सुना?”
“सुना।”
“तो फिर?”
“फिर क्या?” उसने कहा, और पहली बार मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखें सूखी थीं, और यही सबसे बुरा था। सूखी आँखें बताती हैं कि आदमी ने रोना ख़त्म कर दिया है, अंदर से। “अंकुश, तेरी घंटी क्या कहती है? हर बार कुछ जोड़ता है। दो लोग, एक सच्ची बात, एक माफ़ी। टूटा जुड़ जाता है। सुंदर। बहुत सुंदर।”
“मीरा…”
“पर मेरा टूटना वैसा नहीं है,” उसने कहा, और आवाज़ थोड़ी तेज़ हुई। “मेरे टूटने में कोई दूसरा आदमी नहीं है जिसे मैं माफ़ कर दूँ। मेरे टूटने में एक लड़की है जो पाँच साल से आईने में नहीं देखती। और वो लड़की मैं हूँ। मुझे कौन माफ़ करेगा? तेरी घंटी? तेरी घंटी के पास एक ही जोड़ है — दो लोग। और मेरे अंदर सिर्फ़ एक है।”
मैं चुप खड़ा रहा।
क्योंकि वो सही कह रही थी। मेरे पास इसका जवाब नहीं था।
“अंकुश, तूने मेरे बारे में सोचा है कि मैं तुझसे क्यों छुपाती रही?” उसने पूछा। “मैं तुझे ठग समझती थी, फिर पागल समझा, फिर दोस्त। और अब मैं तुझसे यह नहीं कह सकती कि मैं क्या हूँ, क्योंकि जब मैं खुद को देखती हूँ तो मुझे वो खबर दिखती है जिस पर मेरा नाम लिखा है।”
“तो नाम मिटा दें,” मैंने कहा।
“कैसे? तू काग़ज़ मिटाता है… यह मैं हूँ, अंकुश। यह मेरे ऊपर छपी हुई है। पाँच साल हो गए, और मैं हर जगह अपने पीछे वो पन्ना लेकर चलती हूँ। मैं स्कूल में आज भी उसी फाटक पर रुकती हूँ। मैं चबूतरी पर आज भी उसी कोने में खड़ी होती हूँ। और आज जब रमा मैडम ने ‘बेटा’ कहा, मुझे लगा कि मैं वहीं मर जाऊँगी।”
वो पत्थर पर बैठ गई। पन्ना उसके हाथ से फिसलकर पट्टी पर गिरा।
और मैंने देखा कि पन्ने पर मीरा की तस्वीर के साथ वो पंक्ति थी — आरोप अब तक साबित नहीं। इस बार मुझे वो पंक्ति पहले से ज़्यादा शर्मनाक लगी। क्योंकि “साबित नहीं” का मतलब यह नहीं होता कि आदमी बेकसूर है। इसका मतलब यह होता है कि मामला बंद हो गया, और सब अपने घर चले गए।
“मैं एक बात कहूँ?” मैंने धीरे से पूछा। “थोड़ी बेवकूफ़ बात है।”
“तू बोल ही रहा है।”
“मेरी दुकान पर एक टूटा रिम है,” मैंने कहा। “पुराना, मुड़ा हुआ, लोहे का। अगर हम उसे सीधा करने की कोशिश करते हैं — हथौड़े से, पूरी ताक़त से — तो वो टूट जाता है। अगर उसे गर्म करके धीरे-धीरे मोड़ते हैं, तो सीधा हो जाता है। पर अगर उसमें कोई चीज़ एक बार फँस जाए, तो वो फिर कभी सीधा नहीं होता। हम उस जगह को ‘टेढ़ी याद’ कहते हैं। उसको छेड़ते नहीं। उसके चारों तरफ़ काम करते हैं।”
उसने मेरी तरफ़ देखा।
“तू यह क्यों बता रहा है?”
“क्योंकि तुझे भी कोई सीधा नहीं होने दे रहा, मीरा। तू पाँच साल से हथौड़े से सीधी होने की कोशिश कर रही है। मार रही है खुद को।”
उसने कुछ कहने के लिए मुँह खोला, फिर बंद कर दिया।
फिर वो उठी, पन्ना उठाया, दोनों हाथों से सीधा किया और मेरी तरफ़ बढ़ा दिया।
“यह तेरा है,” उसने कहा। “तू इसे सभा में रख चुका। अब तेरे पास रहे।”
“मैं इसे नहीं लूँगा। यह तेरा है। तूने लिखा…”
“मैंने नहीं लिखा,” उसने कहा, और उसकी आवाज़ में अचानक कुछ सख़्त आया, जैसे कोई पुरानी दीवार अंदर से मज़बूत हो उठी हो। “मैंने सिर्फ़ हाँ कहा था। ड्राफ़्ट एडिटर ने लिखा था। मैं उस वक़्त बाईस साल की थी और मुझे लगा था कि अगर मैं ऐसी खबर उठा लाई तो मुझे नौकरी मिल जाएगी। मुझे मिल गई। और उस नौकरी की पहली तनख्वाह से मैंने अपने लिए एक कैमरा खरीदा था। वही कैमरा जो आज भी मेरे पास है। वो कैमरा मेरी कमाई नहीं है, अंकुश। वो मेरा हिसाब है।”
और फिर अचानक उसने विषय बदला, इतनी जल्दी कि मैं सँभल नहीं पाया।
“तू आज चार बजे भारद्वाज भवन जा रहा है।”
मैं रुक गया। “तुझे कैसे पता?”
“क्योंकि सफ़ेद कार्ड वाला लिफ़ाफ़ा सिर्फ़ तेरी दुकान पर नहीं आया था,” उसने कहा। “कल शाम मुझे भी एक आया था। उसी सफ़ेद काग़ज़ पर, उसी लिखाई में। और मेरे वाले में सिर्फ़ एक लाइन थी — तेरे पास जो काग़ज़ है, वो नहीं चाहिए। तू नहीं चाहिए। बस तेरा चैनल नहीं चाहिए।”
मैंने वो सुना और मेरे हाथ ठंडे हो गए।
“तूने मुझे बताया क्यों नहीं?”
“क्योंकि मैं उस वक़्त तुझसे बात नहीं कर रही थी, अंकुश। मैं खुद से भी नहीं कर रही थी।”
वो दो कदम आगे आई और उसका हाथ मेरी कलाई पर आया। उसकी पकड़ ठंडी थी, पर कसी हुई।
“अब ध्यान से सुन,” उसने कहा, और उसकी आवाज़ वो आवाज़ थी जो पत्रकार की होती है जब वो कहानी नहीं, हक़ीक़त बता रही हो। “मैंने कल रात भारद्वाज भवन के बाहर दो घंटे खड़ी रहकर देखा। तीन गाड़ियाँ आईं। दो लोग अंदर गए। एक आदमी बाहर आकर फोन पर बोला — ‘दोनों काग़ज़ तैयार हैं, अब बस घंटी वाले का अंगूठा चाहिए’।”
मेरी साँस रुक गई।
“दोनों काग़ज़?”
“हाँ,” उसने कहा। “एक तेरी दुकान का। और दूसरा — तेरी माँ के इलाज का।”
मैं चुप खड़ा रहा।
“अंकुश, वहाँ चार बजे तुझे कोई हिसाब नहीं दिया जाएगा,” उसने कहा। “वहाँ तुझे सौदा दिया जाएगा। तेरी दुकान काग़ज़ पर उनकी हो जाएगी, और बदले में तेरी माँ का इलाज उनके पैसे से चलेगा, और तेरा नाम उस काग़ज़ पर लिखा जाएगा जिसे तू खुद नहीं पढ़ पाएगा। फिर तेरी घंटी तेरे हाथ में रहेगी — पर तेरी गली तेरे हाथ में नहीं रहेगी। और जिस दिन वो घंटी किसी और के नाम पर बजेगी, तुझे भी नहीं पता चलेगा।”
उसने मेरी कलाई छोड़ दी।
“मैं तुझे यह नहीं कह रही कि तू बहादुरी दिखा,” उसने कहा। “मैं तुझे यह कह रही हूँ — चार बजे भारद्वाज भवन मत जाना।”
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