The Mysterious Bell – Chapter 259
“और मैंने उसी जलन का फ़ायदा उठाया,” शालिनी मैडम ने कहा, आगे आकर। “मैंने उस खबर का काग़ज़ अपने पास रखा, प्रमोशन के वक़्त उसे दिखाया, और बाद में उसे स्टोर में छिपा दिया। आज सुबह वो पन्ना मेरे ही हाथ का लिखा हुआ निकला — क्योंकि पीछे मैंने ख़ुद ‘शालिनी दीदी’ लिखा था। मैंने पाँच साल तक खुद को यह कहकर बचाया कि मैंने कुछ नहीं किया। सच यह है कि मैंने सब कुछ किया।”
चबूतरी पर सन्नाटा था।
और उस सन्नाटे में प्रिंसिपल ने जेब से एक पीला काग़ज़ निकाला।
“यह मेरे दराज़ में गड़ा हुआ है,” उन्होंने कहा। “यह स्कूल बंद होने का नोटिस है। छत कमज़ोर बताई गई है। सच यह है कि छत कमज़ोर नहीं है। दो महीने पहले मैं खुद भारद्वाज के दफ़्तर में गया था, स्कूल का नक़्शा लेकर, यह सोचकर कि नई इमारत के लिए हम कुछ मदद माँगेंगे। वहाँ मुझे यह नोटिस पकड़ा दिया गया और कहा गया कि अगर मैंने किसी को बताया, तो मेरी बेटी का नाम इसी स्कूल की सूची से कट जाएगा।”
उन्होंने पीला काग़ज़ चबूतरी पर रख दिया।
“आज इस गली में मेरी बेटी भी बैठी है, आख़िरी कतार में,” उन्होंने कहा। “और वो मुझे देख रही है। मैं आज इस काग़ज़ को मानने से इंकार करता हूँ। यह नोटिस नहीं, यह धमकी है। और मैं इसे अपने दराज़ में नहीं, इस चबूतरी पर रखने आया हूँ।”
गली में पहली बार तालियाँ नहीं बजीं।
क्योंकि ताली तब बजती है जब बात ख़त्म हो। और यह बात ख़त्म नहीं हुई थी।
क्योंकि उसी वक़्त गली के मुँह से स्कूटर की आवाज़ आई।
बबलू पांडे आया। उसके पीछे स्कूटर पर दो आदमी — एक हाथ में मोटी लाठी, दूसरा हाथ में काला बैग।
बबलू ने स्कूटर से उतरते ही पान थूका, फिर सीधा चबूतरी तक आया। उसका पेट आगे, चेन गले पर, और चाल में वो झूला जो सिर्फ़ उसी आदमी के पास होता है जिसे यक़ीन हो कि कोई उसे रोक नहीं सकता।
“बहुत बढ़िया,” उसने कहा। “बहुत बढ़िया सभा। चाय नहीं मिली किसी को? शबनम आपा, आपने आज कुछ खिलाया नहीं क्या इनको?”
शबनम आपा ने उसकी तरफ़ देखा भी नहीं।
“तो चलिए, मैं भी अपना काग़ज़ दिखा दूँ,” बबलू ने कहा, और काला बैग उठाने वाले आदमी से बैग लेकर उसमें से एक मोटी तह की हुई शीट निकाली। “नगर निगम की सूची। स्कूल की छत और पिछली ज़मीन। सुरक्षा रिपोर्ट। और तारीख़। प्रिंसिपल साहब, आपने कल ही कहा था कि शाम तक सोचेंगे। शाम हो गई कल। आज सुबह हो गई। तो?”
प्रिंसिपल ने उस शीट को देखा।
फिर उन्होंने उसे उठाया, उलटा किया, और सबको दिखाकर बोले।
“इस पर मोहर एक ही है,” उन्होंने कहा। “भारद्वाज कंस्ट्रक्शन की। नगर निगम की मुहर नहीं। गवाह की जगह खाली। और नीचे तारीख़ के आगे लिखा है — विचाराधीन। कोई सरकारी काग़ज़ विचाराधीन नहीं होता। यह सूची नहीं है। यह एक डर है, जिसे सूची की शक्ल में छाप दिया गया है।”
बबलू का चेहरा एक पल के लिए बदला। फिर वो हँसा।
“प्रिंसिपल साहब,” उसने कहा, “आप पढ़े-लिखे आदमी हैं। मैं पढ़ा-लिखा नहीं हूँ, पर मुझे यह पता है कि काग़ज़ किसी की मर्ज़ी से सच नहीं बनता, वक़्त से बनता है। और वक़्त आपके हाथ में नहीं है। आपके हाथ में सिर्फ़ एक अंगूठा है।”
“तो अंगूठा नहीं लगेगा,” प्रिंसिपल ने कहा।
चबूतरी पर पहली बार आवाज़ गूँजी।
बबलू ने एक कदम आगे बढ़ाया।
“ठीक है,” उसने कहा, और उसकी आवाज़ अब मीठी नहीं थी। “ठीक है। तो आप सुन लीजिए। सातवें नंबर पर इस गली की दुकान है। चौदहवें पर अस्पताल की ज़मीन। उन्नीसवें पर यह पीपल और यह चबूतरी। सूची ख़त्म नहीं होती, प्रिंसिपल साहब। सूची में हर आदमी का नाम आता है, एक-एक करके। आज आपका, कल उनका।”
वो रुका और मेरी तरफ़ देखा।
“और तुम्हारा,” उसने कहा। “तुम्हारा नाम सातवें नंबर पर है, अंकुश। दुकान। जिसमें तुम रोज़ सुबह शटर उठाते हो।”
मैंने गले से पुरानी चाबी उँगली पर घुमाई। मेरी आदत है — जब अंदर से गुस्सा आता है, तो हाथ कुछ पकड़ना चाहता है। चाबी सबसे सस्ती चीज़ होती है पकड़ने के लिए।
“बबलू भाई,” मैंने कहा, “तुम अभी सूची गिना रहे थे। एक बात पूछूँ?”
“पूछो।”
“जब तुम्हारा नाम इस सूची में आएगा, तब तुम किस नंबर पर होगे?”
बबलू का पान का रंग उसके होठों पर फैल गया।
चबूतरी पर कोई हँसा नहीं। पर चारों जासूस एक साथ खाँसे, और वो खाँसी हँसी से कम नहीं थी।
“तुम बहुत बोलने लगे हो,” बबलू ने कहा। “कल सुबह सात बजे मशीन आ रही है। पीछे के प्लॉट पर। स्कूल की पिछली दीवार के पास। अगर छत खाली कर दी जाए तो ठीक है, वरना मशीन खुद खाली कर देगी।”
प्रिंसिपल ने कुछ कहना चाहा, पर बबलू ने हाथ उठाकर रोक दिया।
“और एक चीज़,” उसने कहा, और इस बार उसकी आवाज़ बहुत धीमी थी। “घंटी। वो घंटी आज फिर चबूतरी पर निकलेगी तो मैं उसे उठवा लूँगा। साहब को सिर्फ़ घंटी चाहिए। तुम्हें अपनी दुकान और अपनी बीमार माँ चाहिए। दोनों चीज़ें एक साथ इस गली में नहीं रह सकतीं।”
और उसने मेरी तरफ़ आख़िरी बार देखा।
उसकी आँखों में वो चीज़ नहीं थी जो धमकी देने वाले की आँखों में होती है। उसकी आँखों में डर था। डर का आदमी धमकी देता है, और धमकी का आदमी अपनी आवाज़ में नाम जोड़ता है।
उसने मेरी माँ का नाम नहीं लिया। उसने सिर्फ़ कहा — बीमार माँ।
मेरे हाथ की चाबी एक पल को रुकी।
और उसी पल, गली के मोड़ पर, मैंने उसे देखा।
मीरा।
वो मोड़ पर खड़ी थी। हाथ में वही पाँच साल पुराना अख़बार का पन्ना — मुड़ा हुआ, हल्का पीला, किनारे से फटा।
उसने आगे कदम नहीं बढ़ाया।
वो वहीं खड़ी रही, जैसे गली और चबूतरी के बीच कोई लकीर खिंची हो जिसे वो पार नहीं कर सकती।
रमा मैडम ने उसे देख लिया।
मैंने उनका चेहरा देखा। पहले एक पल उनकी आँखों में वो पुराना दर्द आया जो पाँच साल से बैठा हुआ था। फिर वो बदला। उन्होंने मीरा की तरफ़ देखा और धीरे से कहा, इतना धीरे कि सिर्फ़ पास बैठे लोगों ने सुना।
“आ जाओ, बेटा।”
मीरा नहीं आई।
मैंने उसे लगभग मना करते हुए देखा — उसके कदम पीछे हटे। उसने कातर होकर एक बार पूरी चबूतरी पर नज़र डाली — उस्ताद, पापा, दुबे अंकल, बच्चे, भोला भाई — और फिर मुड़कर चली गई।
दो कदम चली, फिर रुकी, और पीछे मुड़कर मुझे देखा।
उसकी आँखों में वो चीज़ थी जो गुस्से से भी बड़ी होती है — शर्म। और शर्म से बड़ी चीज़ सिर्फ़ एक होती है, और वो है पछतावा।
मेरी जेब में घंटी थी। मैंने उसे हल्का छुआ।
घंटी ने कुछ नहीं कहा। वो सिर्फ़ एक बार हल्की सी बजी — जैसे कोई गहरी साँस छोड़े।
बबलू ने स्कूटर स्टार्ट किया और अपने दोनों आदमियों के साथ निकल गया। जाते वक़्त उसने अपना गले का चौकोर लॉकेट पकड़ा और वो हल्का टिक-टिक किया। वो आवाज़ आज मुझे किसी घड़ी की तरह लगी, जो किसी के हिसाब से चल रही हो।
सभा टूट गई, पर धीरे-धीरे। कोई उठता, फिर बैठ जाता। किसी ने कुछ पूछना चाहा, फिर रुक गया। चबूतरी पर पान का गीला दाग था, जो धूप में सूख रहा था।
उस्ताद अली बक्श ने अपना चश्मा उतारा, कान पर टिकी पेंसिल उँगली से घुमाई, और मेरे पास आए।
“जा,” उन्होंने कहा। “यह सभा तेरे पीछे आएगी, तू मीरा के पीछे जा।”
“उस्ताद, सीधा क्यों नहीं बोल रही वो? सबके सामने क्यों नहीं…”
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