The Mysterious Bell – Chapter 256
मैंने आँखें बंद कीं। सफ़ेद कुर्ता, चमकते जूते, काली अंगूठी — सब एक ही आदमी की तस्वीर बन रही थी।
“तो काग़ज़ किसने लिए?” शालिनी मैडम ने पूछा।
मैंने मेज़ पर रखी अलमारी की तरफ़ देखा। ताले के नीचे लकड़ी में एक पतला सा निशान था — जैसे कोई चाकू या पतली छड़ी से खुरचा गया हो।
“काग़ज़ किसी ने लिए हैं,” मैंने कहा। “पर सिर्फ़ लेने के लिए नहीं। लेने की वजह यह थी कि आप दोनों फिर एक-दूसरे पर शक करें।”
“क्यों?” दोनों ने लगभग एक साथ कहा।
“क्योंकि कल आप दोनों ने मिलकर सच बोला था,” मैंने कहा। “और जिस शहर में लोग मिलकर सच बोलने लगें, वहाँ कुछ लोगों का धंधा बंद हो जाता है।”
शालिनी मैडम ने मेरी तरफ़ देखा। उनके चेहरे पर वो भाव आया जो मैंने किसी में कम देखा था — शर्म, जो गुस्से में बदलने से पहले रुक गई।
“तो अब क्या करें?” वेद सर ने कहा। “काग़ज़ गए। कल परीक्षा है। बच्चे बैठेंगे किस काग़ज़ पर?”
“काग़ज़ का इंतज़ाम हो जाएगा,” मैंने कहा। “पहले एक चीज़ का इंतज़ाम करो।”
“क्या?”
“अपने बीच का शक। वरना काग़ज़ आज मिल भी गए, तो कल कोई और काग़ज़ गायब होगा — और हर बार आप एक-दूसरे को देखोगे।”
दोनों चुप रहे।
फिर शालिनी मैडम ने हाथ बढ़ाया। “वेद सर… मैंने सबसे पहले आपको नहीं, खुद को देखा होता, तो यह न होता। मुझे माफ़ कर दीजिए।”
वेद सर ने उनका हाथ पकड़ा। “माफ़ी उस चीज़ की नहीं, शालिनी जी। माफ़ी… उस आदत की है जो हम दोनों में पुरानी है। कल भी हम यही कर रहे थे — एक-दूसरे को नहीं, अपने डर को देख रहे थे।”
दोनों ने एक-दूसरे को देखा। इस बार नज़र झुकी नहीं।
इस बार कुछ और हुआ।
मेरी जेब में घंटी बजी — एक बार, धीमी, पर साफ़। जैसे किसी ने दूर से चम्मच कटोरी पर मारा हो।
और फिर आवाज़ आई — पहले से कुछ ज़्यादा साफ़, जैसे कोई करीब आकर बोल रहा हो।
“बीस।”
मैंने आँखें झपकाईं।
“बीस क्या?” मैंने धीरे से पूछा।
“जुड़ाई के बीस अंक। कुल दो सौ अड़तालीस।”
मैं मन ही मन गिनने लगा। दो सौ अट्ठाईस थे। बीस और — हाँ, दो सौ अड़तालीस।
“और एक बात,” घंटी ने कहा। “अब सुनने में फ़र्क़ है ना?”
मैंने सुना। सच में फ़र्क़ था। पहले घंटी की आवाज़ किसी कुएँ के तले से आती थी। अब कुआँ भर गया था, आवाज़ ऊपर तक आ रही थी।
“क्यों?” मैंने पूछा।
“जितना बड़ा रिश्ता जुड़ता है, उतनी साफ़ आवाज़,” घंटी ने कहा। “और जितनी साफ़ आवाज़, उतना कम भरोसा मुझ पर, उतना ज़्यादा लोगों पर।”
“यह तो तूने पहले क्यों नहीं बताया?”
“क्योंकि पहले तेरे पास सुनने के लिए कान नहीं थे।”
मैं हँसा। टिंकू ने मुझे देखा।
“उस्ताद, आप हँस क्यों रहे हैं?”
“कुछ नहीं,” मैंने कहा। “घंटी ने आज मुझे बताया कि मैं बूढ़ा हो रहा हूँ।”
टिंकू ने सिर खुजाया।
उसी वक़्त दरवाज़े पर footsteps आए। रमा मैडम अंदर आईं। उनकी आँखें लाल थीं।
“अंकुश,” उन्होंने कहा, “मीरा आई है। गेट पर।”
मैं उठा। “कहाँ?”
“अभी।”
मैं बाहर निकला। स्कूल के गेट पर मीरा खड़ी थी। आज उसके हाथ में कैमरा नहीं था। सिर्फ़ एक कपड़े का थैला था, कंधे पर। और वो किसी को ढूँढ रही थी — शायद मुझे।
पर जैसे ही उसकी नज़र रमा मैडम पर पड़ी, जो मेरे पीछे-पीछे बाहर आ रही थीं, उसकी आँखें ठिठक गईं।
मैंने देखा — एक पल पहले वो कुछ कहने आई थी। अगले पल, जैसे किसी ने उसकी ज़ुबान पर ताला लगा दिया।
“मीरा?” मैंने कहा। “तू आई? अंदर चल।”
“नहीं,” उसने जल्दी से कहा। “मैं… मैं बस… कुछ सोच रही थी… छोड़, बाद में।”
“मीरा, रुक —”
पर वो रुकी नहीं। उसने एक पल रमा मैडम की तरफ़ देखा — बस एक पल — और फिर मुड़कर तेज़ कदमों से गली की तरफ़ चल पड़ी।
मैंने पुकारा। वो नहीं रुकी।
मैंने रमा मैडम की तरफ़ देखा। वो गेट की सलाखें पकड़े खड़ी थीं, चेहरा पीला।
“मैडम,” मैंने कहा, “वो कल भी आई थी, और कल भी चली गई थी। मुझे लगा था सच बोलने के बाद वो ठीक हो जाएगी। पर…”
रमा मैडम ने मेरी तरफ़ देखा। “अंकुश, माफ़ी माँगने के बाद भी कुछ चीज़ें ऐसी होती हैं जो हमें खुद से बोलनी पड़ती हैं। मीरा ने मुझसे माफ़ी माँगी, पर खुद से नहीं माँगी। वो जब तक खुद को माफ़ नहीं करेगी, वो मेरी आँखों में नहीं देख पाएगी।”
“तो क्या करें?”
“तू नहीं,” उन्होंने कहा। “वो खुद करेगी। तेरा काम सिर्फ़ वो है कि तू वहाँ खड़ा रहे जब वो लौटे।”
मैंने सिर हिलाया। फिर मेरी नज़र घंटी की तरफ़ गई। यह वो बात थी जो घंटी ने कल कही थी — जब रमा खुद दरवाज़ा खोलेगी, तब। शायद वो वक़्त अभी आया नहीं था।
मैं स्कूल के आँगन में लौटा। बच्चे अब भी वहीं खड़े थे, पर अब पतंग लेकर। सानिया के हाथ में एक लंबी पतंग थी, जिसके पीछे रंग-बिरंगी पूँछ लगी थी।
“उस्ताद,” उसने कहा, “हमने कल वाली काग़ज़ वाली बात सोची। स्टोर में कोई चीज़ हो सकती है। पर पहले… हमें पतंग उड़ानी है।”
“अच्छा,” मैंने कहा। “उड़ा दो।”
“पर उस्ताद,” चिंटू ने कहा, “बबलू ने कहा था कि छत से पतंग उड़ाओ तो स्कूल फँसेगा।”
“अब वो छत पर नहीं चढ़ेगा,” मैंने कहा। “मैंने उसका ताला जोड़ दिया है।”
“फिर उड़ाएँ?” रफ़ीक़ ने पूछा।
“आँगन में उड़ाओ,” मैंने कहा। “पतंग को छत चाहिए नहीं, उसे बस हवा चाहिए।”
चारों हँसे और भागकर आँगन के बीच पहुँचे।
मैं वहीं खड़ा देखता रहा। घंटी की आवाज़ साफ़ थी। दूर, आँगन के दूसरे कोने में, वेद सर और शालिनी मैडम साथ खड़े आँगन में फैले काग़ज़ों को उठा रहे थे। रमा मैडम उनके बीच आकर खड़ी हो गईं, और तीनों ने एक साथ प्रिंसिपल के दफ़्तर की तरफ़ चलना शुरू किया।
मैंने राहत की साँस ली।
और ठीक उसी वक़्त, गेट पर बबलू की स्कूटर की आवाज़ आई।
वो नहीं, दो और आए — दोनों के हाथ में काले बैग। और पीछे स्कूटर पर बबलू, गले में सोने की चेन, मुँह में पान।
“अंकुश भाई!” उसने दूर से ही चिल्लाया, जैसे कोई पुराना हितैषी हो। “अभी सभा है ना चबूतरी पर? पर उससे पहले, मेरी प्रिंसिपल साहब से दो मिनट की बात है। तुम बीच में मत आना। यह स्कूल की बात है।”
वो सीधा प्रिंसिपल के दफ़्तर की तरफ़ बढ़ा — जहाँ रमा मैडम, वेद सर और शालिनी मैडम खड़े थे।
मैं पीछे-पीछे चला।
अंदर पहुँचकर बबलू ने कोई फ़ाइल नहीं निकाली। उसने सीधे अपनी जेब से एक तह किया हुआ काग़ज़ निकाला और प्रिंसिपल की मेज़ पर रख दिया।
“यह क्या है?” प्रिंसिपल ने कहा, आवाज़ में थोड़ी कड़क।
“यह नगर निगम का काग़ज़ है, सर,” बबलू ने कहा, पान चबाते हुए। “ज़मीन का नक़्शा। इसमें यह हिस्सा — आपका स्कूल — ‘पुराना और जर्जर’ लिखा है। साथ में सुरक्षा रिपोर्ट भी है। छत खतरनाक। कल सुबह सात बजे से पहले उसे खाली करना है।”
“किसने कहा?”
“साहब ने कहा। लिखकर नहीं भेजा, फोन पर कहा। पर यह काग़ज़…” बबलू ने उँगली से मेज़ पर रखे काग़ज़ पर थपकी दी, “…यह लिखा हुआ है। और लिखा हुआ काग़ज़ किसी फोन से ज़्यादा भारी होता है। सर जी, आप पढ़े-लिखे आदमी हैं। आप जानते हैं।”
प्रिंसिपल ने काग़ज़ उठाया। उनके हाथ काँप रहे थे।
रमा मैडम ने आगे बढ़कर वही काग़ज़ देखा। “इसमें सिर्फ़ ज़मीन का ज़िक्र है,” उन्होंने कहा। “छत खाली करने का कोई हुक्म नहीं।”
“मैडम,” बबलू ने मुस्कुराकर कहा, “हुक्म ज़ुबानी होता है। काग़ज़ ज़मीन के लिए होता है। छत तो बस… इमारत का हिस्सा है। और इमारत जब गिरेगी, तो छत अपने आप खाली हो जाएगी।”
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