The Mysterious Bell – Chapter 257
कमरे में सन्नाटा छा गया।
मैंने बबलू की तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो ठंडक थी जो पहले नहीं थी। पहले वो डराता था, अब वो… जानता था। जैसे उसे पता हो कि आज कुछ होने वाला है।
“बबलू भाई,” मैंने कहा, “आपने अभी कहा कि साहब ने फोन पर कहा। फोन कहाँ है? रिकॉर्ड है?”
वो मुड़ा। “अंकुश भाई, आप बीच में मत आओ। यह आपका मामला नहीं है।”
“छत के नीचे मेरे मोहल्ले के बच्चे पढ़ते हैं। यह मेरा मामला है।”
“तो सुनो,” बबलू ने कहा। “काग़ज़ आपके सामने है। जो पढ़ सकता है, पढ़ ले।”
मैंने काग़ज़ उठाया। पढ़ा। प्रिंसिपल साहब काँप रहे थे, पर उनकी आँखों में एक चीज़ थी जो आज सुबह नहीं थी। साफ़ नज़र।
“यह काग़ज़,” प्रिंसिपल ने धीरे से कहा, “मैं आज नहीं मानूँगा।”
“क्या?” बबलू का पान चबाना रुक गया।
“यह काग़ज़ नगर निगम का नहीं है,” प्रिंसिपल ने कहा। “इस पर नगर निगम की मुहर नहीं है। सिर्फ़ एक वकील का नाम है। मेरी इमारत मैं किसी वकील के काग़ज़ पर नहीं छोड़ूँगा। दस बजे चबूतरी पर सबके सामने रखूँगा।”
बबलू का चेहरा बदला। एक पल के लिए उसका पानदान जैसे भारी हो गया।
“सर जी,” उसने धीरे, बहुत धीरे कहा, “साहब आपकी बेटी का नाम जानते हैं।”
“जानते हैं,” प्रिंसिपल ने कहा, आवाज़ में अब कंपन नहीं था। “और मैं भी जानता हूँ कि अगर मैं आज झुक गया, तो कल मेरी बेटी उसी स्कूल में पढ़ेगी जिसका नाम साहब का होगा। तब वो मुझे क्या कहेगी?”
बबलू ने उनकी तरफ़ देखा। फिर मेरी तरफ़। फिर रमा मैडम की तरफ़।
“दस बजे, चबूतरी,” उसने कहा, काग़ज़ उठाकर जेब में रखते हुए। “देखते हैं, कौन किसके साथ खड़ा रहता है।”
वो निकल गया। बाहर जाकर उसने स्कूटर स्टार्ट की और गली की तरफ़ चला गया।
कमरे में सन्नाटा था।
प्रिंसिपल ने धीरे से कहा, “अंकुश, तुम्हारे पास कुछ है? कुछ ऐसा जो दस बजे मैं इन बच्चों के सामने रख सकूँ?”
“हाँ, सर,” मैंने कहा। “पर एक शर्त पर।”
“क्या?”
“जब रखें, तो अकेले न रखें। रमा मैडम, वेद सर, शालिनी मैडम, और बच्चे — सब साथ हों। ऐसा सच अकेले रखा जाए तो अधूरा लगता है। साथ रखा जाए तो शस्त्र बन जाता है।”
प्रिंसिपल ने मेरी तरफ़ देखा। फिर रमा मैडम की तरफ़। उन्होंने सिर हिलाया।
“ठीक है,” उन्होंने कहा। “साथ रखेंगे।”
मैं बाहर आया। आँगन में पतंग अब ऊँची उड़ रही थी। सानिया डोर खींच रही थी, गुड्डू चिल्ला रहा था, रफ़ीक़ और चिंटू ने मिलकर पूँछ पकड़ रखी थी।
पर जैसे ही मैं आँगन के बीच पहुँचा, सानिया ने डोर गुड्डू को पकड़ाई और मेरी तरफ़ भागी।
“उस्ताद,” उसने कहा, साँस फूल रही थी, “गुड्डू ने स्टोर से एक और काग़ज़ निकाला है। यह वो बंडल नहीं है जो हम कल लाए थे। यह… यह किसी और बंडल से है।”
उसने अपनी जेब से एक मुड़ा हुआ अख़बार का कतरन निकाला, जो पीला पड़ गया था, किनारों से फटा हुआ।
“कहाँ मिला?” मैंने पूछा।
“जूट की रस्सी वाले बंडल के नीचे। दबा हुआ था।”
मैंने वो कतरन खोला।
उस पर एक तस्वीर थी। सफ़ेद-काली। पुरानी।
तस्वीर में मीरा खड़ी थी — बहुत छोटी, शायद पाँच साल पहले की। उसके हाथ में माइक था, चेहरे पर वो जल्दबाज़ी जो अब भी है।
और तस्वीर के नीचे हेडलाइन छपी थी, मोटे अक्षरों में — “शिक्षिका के घर की नींव हिली — खबर ने सामने लाई पुरानी चुप्पी।”
और हेडलाइन के नीचे छोटी लाइन — “आरोप अब तक साबित नहीं।”
मैंने कतरन ध्यान से देखा। तस्वीर में मीरा के पीछे, बहुत पीछे, एक आदमी खड़ा था — सिर्फ़ आधा कटा हुआ। उसके हाथ में एक पीली फ़ाइल थी। और उसकी उँगली में — काली अंगूठी।
मेरी साँस रुक गई।
“सानिया,” मैंने कहा, “यह कतरन कितना पुराना है?”
“उस्ताद, तारीख़ नहीं दिख रही। पर काग़ज़ पीला है, स्याही फीकी। शायद पाँच साल।”
पाँच साल।
मीरा की खबर पाँच साल पुरानी थी। और उस खबर के पीछे, बैकग्राउंड में, काली अंगूठी वाला आदमी खड़ा था।
मैंने कतरन को पलटा।
पीछे, पेंसिल से, किसी ने कुछ लिखा था — बहुत छोटे, बहुत हल्के अक्षरों में।
“यह खबर सिर्फ़ मीरा की नहीं थी। पूछो — पीछे कौन खड़ा था।”
मैंने टिंकू की तरफ़ देखा। उसने मेरी तरफ़ देखा। हम दोनों को पता था — अब सिर्फ़ मीरा का सच नहीं, पूरी खबर का सच खुलने वाला था।
और उस सच की एक कड़ी, उसी आदमी से जुड़ी थी जिसने मेरी मेज़ पर पीला लिफ़ाफ़ा रखा था।
और उस आदमी से मिलने का वक़्त था — आज शाम।
मैंने कतरन को जेब में रखा और घंटी छुई।
“सुन,” मैंने धीरे से कहा। “यह आदमी — यह वो ही है जो चार बजे बुला रहा है?”
घंटी एक पल चुप रही।
फिर आवाज़ आई — साफ़, ठंडी, और थोड़ी थकी हुई।
“यह आदमी नहीं, यह साया है। असली आदमी वो है जिसके सामने तू खड़ा है, पर तू उसे देख नहीं रहा।”
मैंने चारों तरफ़ देखा। आँगन में बच्चे, पतंग, दीवार पर कीचड़ के छींटे, और प्रिंसिपल के दफ़्तर की खिड़की पर रखा एक काला फ़्रेम।
“कौन?” मैंने पूछा।
“वो जो तेरे सामने खड़ा है, तेरे जैसा ही, पर तेरे जैसा नहीं,” घंटी ने कहा। “वो जो खुद को तेरा हितैषी कहता है, और जिसकी जेब में हर वक़्त एक काग़ज़ होता है।”
मैं वहीं जम गया।
घंटी ने एक और बात कही — बहुत धीरे, जैसे कोई सिर्फ़ मेरे लिए कह रहा हो।
“आज चार बजे, जब तू भारद्वाज भवन जाए, तो अकेले मत जाना। पर भीड़ भी मत लाना। दो लोग ले जाना — एक जिसे दुख है, एक जिसे सब पता है।”
“कौन?”
“खुद सोच। मैं तेरी आँखें नहीं बन सकता।”
मैंने आँखें बंद कीं।
जिसे दुख है — वो मीरा है।
जिसे सब पता है — वो उस्ताद हैं।
मैंने आँखें खोलीं। और मैंने पाया कि मैं जिस सवाल से सुबह डर रहा था — घंटी या माँ का इलाज — वो असली सवाल नहीं था।
असली सवाल यह था — मैं अकेले क्यों चल रहा हूँ, जब गली में इतने लोग खड़े हैं?
मैंने टिंकू की तरफ़ देखा। “टिंकू, चबूतरी पर सभा के बाद, तू सीधा उस्ताद की दुकान पर जाना। उनसे कहना — चार बजे वाला न्योता अकेले का नहीं, तीन का है।”
“तीन का?”
“हाँ,” मैंने कहा। “मैं, तू, और उस्ताद।”
“और मीरा दीदी?”
मैं एक पल रुका।
“उसे मैं खुद बुलाऊँगा,” मैंने कहा। “चबूतरी पर। सबके सामने। अगर वो आई, तो उसका रास्ता खुलेगा। अगर नहीं आई…”
मैंने कतरन को जेब में दबाया।
“…तो मैं उसके घर तक जाऊँगा। और इस बार बिना किसी सवाल के। सिर्फ़ इस कतरन के साथ।”
टिंकू ने मेरी आँखों में देखा। “उस्ताद, अगर वो फिर चुप हो गई, तो?”
“तो मैं उसकी चुप्पी में बैठूँगा,” मैंने कहा। “जब तक वो खुद न बोले।”
आँगन में पतंग की डोर खिंची। पतंग ऊपर उड़ रही थी, नीले आसमान में एक छोटी सी बिंदी की तरह।
और मैं नीचे खड़ा सोच रहा था — पाँच साल पहले इसी स्कूल से, इसी आँगन से, एक खबर निकली थी। और वो खबर किसी की ज़ुबान से नहीं, किसी की उँगली के इशारे से निकली थी।
और आज मुझे वो उँगली ढूँढनी थी — उसके नाखून के नीचे की काली स्याही समेत।
घंटी ने मेरी जेब में एक बार फिर बजकर कहा — “दो सौ अड़तालीस। सम्भाल कर रखना। आज शाम सब खर्च हो सकता है।”
मैंने मुस्कुराकर कहा, “तो कल फिर जोड़ लेंगे।”
घंटी चुप हो गई।
और मैंने स्कूल के गेट की तरफ़ कदम बढ़ाया — चबूतरी की तरफ़, दस बजे की सभा की तरफ़, और उस शाम की तरफ़ जो मुझे बता देगी कि मेरे हाथ में सच है या सिर्फ़ एक और काग़ज़।
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