The Mysterious Bell – Chapter 255
मैंने लिफ़ाफ़े को उलटा-पलटा। फोटो में कोई चेहरा नहीं था, सिर्फ़ उँगली की काली अंगूठी। और नीचे नीली स्याही की वो एक लाइन।
चार बजे। तेरे पास एक घंटी है। मेरे पास तेरी माँ का इलाज। देखते हैं, तू क्या चुनता है।
मैंने फोटो को मेज़ पर रखा और देर तक उसे घूरता रहा। दुकान के पीछे वाले कमरे से पानी की टप-टप आ रही थी। पत्थर का टैंक फिर से रिस रहा था, मैं रोज़ सोचता हूँ कि कल ठीक करूँगा, और रोज़ कल आ जाता है।
तुम सोच रहे होगे कि चार बजे की चिट्ठी मिलने के बाद भी अनकुश यही सोच रहा है? हाँ भाई। मैं वही सोच रहा था। क्योंकि अगर मैं यह सोचना बंद कर देता कि टैंक रिस रहा है, तो मैं उस लिफ़ाफ़े वाले आदमी जैसा हो जाता — जिसके पास पूरा शहर है, पर एक टपकती नली भरने का वक़्त नहीं।
मैंने फोटो को जेब में रखा और लिफ़ाफ़े को तिजोरी की तरफ़ नहीं, अपने औज़ारों के ट्रंक के नीचे रख दिया। जहाँ मेरे पापा का कोई औज़ार होता है, वहाँ कोई चिट्ठी नहीं पहुँचती। यह मेरा अपना नियम है।
बाहर टिंकू की आवाज़ आई।
“उस्ताद! उस्ताद, आप सो गए क्या? दस बजने वाले हैं!”
मैंने शटर उठाया। सुबह की धूप गली में ऐसे गिर रही थी जैसे किसी ने पीली चादर बिछा दी हो। टिंकू के हाथ में एक बैग था, जिसके कोने से उसकी माँ का सिला हुआ रूमाल झाँक रहा था।
“चल,” मैंने कहा। “पहले स्कूल।”
“पर सभा तो चबूतरी पर है, दस बजे!”
“तो चबूतरी पर भी जाएँगे। पहले स्कूल से आते हैं।”
टिंकू ने मुझे ऐसे देखा जैसे कोई गणित का सवाल बिना हल किए पूछ रहा हो। पर वो चुपचाप साथ चल पड़ा।
मैं रास्ते में सोच रहा था — अगर आज चार बजे मुझे घंटी और माँ के इलाज में से एक चुनना पड़े, तो मैं क्या चुनूँगा? घंटी तो मेरे पास रोज़ है। माँ अस्पताल में हैं। और अगर मैं घंटी दे दूँ, तो गली को कौन बचाएगा? और अगर मैं माँ को चुनूँ, तो स्कूल, अस्पताल, दुकान — सब बिक जाएगा।
यह सवाल मेरे अंदर एक कोने में बैठ गया। और मुझे पता था कि यह सवाल आज किसी जवाब के बिना ही शाम हो जाएगा।
स्कूल के गेट पर पहुँचते ही माहौल अजीब था। बच्चे आँगन में खड़े थे, पर कोई हँस नहीं रहा था। पीपल के नीचे रमा मैडम बैठी थीं और उनके हाथ में एक काग़ज़ था, जिसे वो बार-बार पलटकर देख रही थीं।
“क्या हुआ, मैडम?” मैंने पूछा।
“अंकुश,” उन्होंने कहा, “आज सुबह से स्टाफ के कमरे में वेद सर और शालिनी मैडम बोल नहीं रहे। और अभी प्रिंसिपल साहब ने बुलाया है — कह रहे हैं, बोर्ड की नई परीक्षा के काग़ज़ गायब हैं।”
मेरे पैर वहीं रुक गए।
“गायब?”
“पूरी बंडल। कल शाम तक स्टोर की अलमारी में थी। आज सुबह ताले खुले मिले।”
मैंने रमा मैडम की तरफ़ देखा। उनकी आँखों में वो डर था जो हम सब छुपाते हैं — कि हमने जो कल जोड़ा था, कहीं वो आज फिर टूट न जाए।
“मैडम,” मैंने कहा, “वेद सर और शालिनी मैडम अभी कहाँ हैं?”
“स्टाफ वाले कमरे में। एक-दूसरे से बोल नहीं रहे। पर दोनों के हाथ काँप रहे हैं।”
मैं सीधा स्टाफ के कमरे की तरफ़ बढ़ा। टिंकू पीछे-पीछे आ रहा था। रास्ते में उसने धीरे से कहा, “उस्ताद, कल तो दोनों ने हाथ मिलाया था।”
“हाथ मिलाना आसान है, टिंकू,” मैंने कहा। “उसे पकड़कर रखना मुश्किल है।”
कमरे का दरवाज़ा खुला था। वेद सर एक कोने में खड़े थे, हाथ जेब में। शालिनी मैडम दूसरे कोने में, बैग सीने से लगाए। दोनों के बीच मेज़ पर काग़ज़ों का ढेर और एक खुली अलमारी थी।
“क्या बात है, सर?” मैंने सीधे पूछा।
वेद सर ने नज़र नहीं मिलाई। “कुछ नहीं। जाओ, अंकुश। यह स्कूल का मामला है।”
“स्कूल का मामला मेरे मोहल्ले में है, सर। और मेरे मोहल्ले का मामला मेरा है।”
शालिनी मैडम ने मुँह फेर लिया। “तुम्हें किसने बुलाया?”
“किसी ने नहीं,” मैंने कहा। “मैं खुद आया हूँ। पर मैं तब तक नहीं जाऊँगा जब तक आप दोनों मेरी आँखों में देखकर एक-एक बात नहीं कहते।”
दोनों चुप रहे। टिंकू ने मेरी कमीज़ खींची। मैंने उसे इशारा किया कि चुप रहे।
फिर वेद सर बोले — धीरे, जैसे किसी पुराने ज़ख्म को छू रहे हों।
“कल रात… मैं देर तक स्कूल में रुका था। स्टोर में रजिस्टर रखे थे, मैं उन्हें ठीक कर रहा था। जब मैं निकला, स्टोर की अलमारी का ताला खुला था। मैंने सोचा… शायद मैंने ही ठीक से नहीं बंद किया।”
“और सुबह?” मैंने पूछा।
“सुबह शालिनी मैडम सबसे पहले आई थीं,” वेद सर ने कहा। “स्टोर खुला था, काग़ज़ गायब थे।”
शालिनी मैडम ने आँखें बंद कर लीं। “मैं सुबह सात बजे आई थी। बेटी की दवा लेने अस्पताल नहीं जा सकी, तो स्कूल जल्दी आ गई। स्टोर खुला देखा। अंदर काग़ज़ नहीं थे।”
“और तुमने सीधा वेद सर पर शक किया?” मैंने पूछा।
“किस पर करती?” उनकी आवाज़ काँपी। “कल जिस आदमी के बैग में मेरी लिखाई वाला काग़ज़ मिला था, आज स्टोर में उसी के हाथ का… वो रजिस्टर…”
मैंने उनकी तरफ़ देखा। “मैडम, कल हमने यही तो तय किया था कि अब हम एक-दूसरे पर शक नहीं करेंगे।”
“शक करना आसान है, अंकुश,” उन्होंने कहा। “भरोसा करना सीखना पड़ता है। और मैं अभी भी सीख रही हूँ।”
कमरे में चुप्पी छा गई। बाहर बच्चों की फुसफुसाहट आ रही थी। मैंने एक लंबी साँस ली और मेज़ के पास रखी कुर्सी खींची।
“बैठिए, दोनों,” मैंने कहा। “एक-दूसरे के सामने। आमने-सामने।”
दोनों ने झिझकते हुए कुर्सी खींची। और बैठ गए। टिंकू दरवाज़े के पास खड़ा था, आँखें बड़ी किए।
“अब सुनिए,” मैंने कहा। “मैं आपसे काग़ज़ कहाँ हैं, यह नहीं पूछूँगा। मैं यह पूछूँगा कि कल रात से अब तक, आपने एक-दूसरे के बारे में क्या सोचा।”
दोनों ने एक साथ मुँह खोला, फिर बंद कर दिया।
“वेद सर, आप पहले,” मैंने कहा।
वेद सर ने चश्मा उतारा, उसे पोंछा, और फिर धीरे से बोले, “मैंने सोचा… यह वही कर रही है जो पाँच साल पहले करती थी। मीरा वाली खबर में भी… उसका हाथ था ना। मैंने सोचा, काग़ज़ गायब करके मुझे फँसाएगी, और खुद साफ़ बच जाएगी।”
शालिनी मैडम ने उनकी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में पानी था, पर गुस्सा नहीं।
“और मैंने सोचा,” उन्होंने कहा, “कि आपने काग़ज़ इसलिए छिपाए ताकि मेरी जगह आपका प्रमोशन हो जाए। जैसे कल वाले काग़ज़ के बहाने आपने खुद को बचाया था।”
दोनों चुप हो गए।
फिर वेद सर ने कहा, “पर अब सोचता हूँ… अगर आपने काग़ज़ छिपाए होते, तो मुझे स्टोर में देर तक रुकने की ज़रूरत ही क्या थी? मैं वहाँ अपनी मर्ज़ी से रुका था। मैंने ही ताला खुला छोड़ा। और फिर… शालिनी मैडम पर शक किया।”
शालिनी मैडम ने सिर झुकाया। “और मैंने स्टोर खुला देखकर फौरन आपका नाम सोचा। मैंने सुबह सात बजे यह नहीं सोचा कि पहले आपको पूछूँ। मैंने सीधा… शक किया।”
“तो शक किसने फैलाया?” मैंने पूछा।
दोनों ठिठके।
“कल रात स्टोर के पास कौन था?” मैंने पूछा।
“कोई नहीं,” वेद सर ने कहा। “सिर्फ़ मैं था। और एक… एक आदमी गेट पर खड़ा था। बाहर। मैंने सोचा चौकीदार होगा।”
“कैसा दिखता था?”
“अंधेरा था। पर… उसके जूते चमक रहे थे। इस अंधेरे में भी।”
मेरी रीढ़ ठंडी हो गई।
“सफ़ेद कुर्ता?”
“पता नहीं। पर जब वो जा रहा था, तो… वो हाथ उठाकर कुछ कह रहा था जैसे किसी को फोन पर। और उसके हाथ में… रुमाल था, जिससे वो अपने जूते पोंछ रहा था।”
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