The Mysterious Bell – Chapter 254
“वेद सर,” मैंने कहा, “मैं आपसे कहूँगा कि सच बोलने से नौकरी जाने का डर — यह डर असली नहीं है। असली डर यह है कि आप बीस साल पढ़ाते रहे और कोई बच्चा यह नहीं कह सका कि मेरे वेद सर ने मेरी ज़िंदगी बदली। उस डर से बचिए।”
वेद सर की आँखें भर आईं। उन्होंने चश्मा उतारा और रूमाल से पोंछा।
“ठीक है,” उन्होंने कहा। “मैं बोलूँगा।”
मैं स्कूल के गेट से बाहर निकला। टिंकू मेरे साथ आया। गलियारे में हवा चल रही थी, और शाम की धूप स्कूल की दीवारों पर पीली पड़ रही थी।
और तभी मेरी नज़र गेट के बाहर, सड़क के दूसरे कोने पर खड़ी एक लड़की पर पड़ी — मीरा।
वो बाहर निकल गई थी, जबकि सभा अभी शुरू भी नहीं हुई थी।
“मीरा!” मैंने आवाज़ दी।
वो रुकी। पलटी। उसका चेहरा — पहले जैसा नहीं था। जैसे कुछ अंदर ही अंदर हिल गया हो।
“मैं यहाँ — ” मैंने कहा।
“मुझे पता है, अंकुश,” उसने कहा। “तू क्या कहेगा, मुझे पता है। तू कहेगा कि आज सच बोलो, गली सुन रही है, सब ठीक होगा।”
“मैं तो यही कहने वाला था।”
“मुझे पता है।”
“तो फिर —”
“तो फिर यह जान ले,” मीरा ने कहा। उसकी आवाज़ कड़क थी, पर अंदर से काँप रही थी। “रमा मैडम के सामने मैं खड़ी हो सकती हूँ। सच बोल सकती हूँ। पर मैं गली के सामने उस लड़की के रूप में नहीं बोल सकती, जिसने पाँच साल पहले आधी खबर छापी थी। मुझे लगता है कि जब मैं बोलूँगी, तो सबसे पहले मुझे खुद पाँच साल पीछे लौटना पड़ेगा। और वो जगह अँधेरी है।”
मैंने उसकी तरफ़ कदम बढ़ाया।
“मीरा, यही तो सबसे ज़रूरी है। आज तुझे पाँच साल पीछे लौटना पड़ेगा। पर सिर्फ़ लौटकर आगे आने के लिए। और मैं तुझसे वादा करता हूँ कि जब तू लौटेगी, तब गली तेरे पीछे खड़ी होगी। सब नहीं, कुछ — पर जो खड़े होंगे, वो शक नहीं करेंगे।”
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। फिर उसने अपना बैग कंधे पर ठीक किया।
“मुझे सोचने दो,” उसने कहा, और चल दी।
मैंने उसे जाते हुए देखा।
टिंकू मेरे बगल में आकर खड़ा हो गया। उसने कुछ कहने से पहले ऊपर देखा।
“उस्ताद,” उसने धीरे से कहा, “मीरा दीदी क्यों चली गई? वो तो सच बोलने तैयार थी।”
“वो तैयार थी, टिंकू,” मैंने कहा। “पर तैयार होना और खुद को उस कमरे में बंद करना — दोनों अलग बातें हैं। सच सबसे भारी चीज़ है। और जिसने पाँच साल से सच के सामने आँख नहीं मिलाई हो, उसे सच के सामने खड़े होने में पहले खुद से मिलना पड़ता है।”
टिंकू ने सिर हिलाया।
“और अगर वो नहीं आई?” उसने पूछा।
“तो मैं जाऊँगा। जब तक वो न आए, मैं पीछा नहीं छोड़ूँगा।”
हम दुकान की तरफ़ चले। रास्ते में सानिया, रफ़ीक़, गुड्डू और चिंटू दौड़कर आए — सब के सब कुछ ढो रहे थे, जैसे कोई पुराना खज़ाना मिल गया हो।
“उस्ताद!” सानिया ने कहा। “हमने और ढूँढा!”
“क्या ढूँढा?”
“स्टोर में। जूट के बंडल के नीचे। और भी काग़ज़ थे।”
उसने अपनी कॉपी खोली। उसमें एक पुराना अख़बार का कतरन था — बड़ा, फटा हुआ, पीला पड़ा। उस पर मीरा की तस्वीर थी, दस साल पहले की, और साथ में एक टीचर के घर के बिखरने की खबर थी।
“यह कहाँ से?”
“वही जूट का बंडल। हमने सोचा, तूने बोला था कि जो काग़ज़ मिले, सब दिखाना।”
मैंने काग़ज़ लिया। हेडलाइन बड़ी थी — “स्कूल की टीचर पर आरोप, घर टूटा।”
और नीचे छोटे अक्षरों में — “आरोप अब तक साबित नहीं।”
मैंने उस काग़ज़ को दोनों हाथों से पकड़ा।
“यह पाँच साल पुराना है,” मैंने कहा।
“नहीं, उस्ताद,” सानिया ने कहा। “यह उसके एक साल बाद का है। यह टीचर के घर टूटने के एक साल बाद का अख़बार है। इसमें लिखा है कि उस टीचर के पति ने एक साल बाद भी माफ़ी नहीं माँगी, और उनका घर अभी भी बिखरा हुआ है।”
मैंने काग़ज़ फिर पढ़ा। इस बार ध्यान से।
कतरन के कोने में पेंसिल से किसी ने लिखा था — बिल्कुल छोटे अक्षरों में, जैसे कोई खुद से बात कर रहा हो — “रमा को पता नहीं, पर उसका घर एक खबर से नहीं, उसके पति की चुप्पी से टूटा।”
मैंने उस लाइन को तीन बार पढ़ा।
फिर मैंने सानिया की तरफ़ देखा।
“तुमने यह कहाँ से निकाला, यह ठीक से बताओ।”
“जूट के बंडल के नीचे, उस्ताद। जिस बंडल में वो पन्ना था, उसी के नीचे। यह उसके अंदर नहीं था — बाहर था, चिपका हुआ। जैसे किसी ने जल्दी में चिपकाया हो और भूल गया हो।”
मैंने काग़ज़ अपनी जेब में रखा।
“सानिया, तुमने बहुत अच्छा काम किया। तुम चारों ने। आज रात तुम्हें एक काम देना है — इस काग़ज़ का एक और हिस्सा ढूँढना। जो भी काग़ज़ स्टोर में उस बंडल के आस-पास हो, सब ले आना। कुछ भी न छोड़ना।”
चारों ने एक साथ सिर हिलाया। गुड्डू ने कहा, “उस्ताद, अगर उसमें कोई भूत निकला तो?”
“तो तुम उससे कहना कि हम साइकिल ठीक करने वाले लोग हैं, भूत नहीं ढूँढते।”
चारों हँसे।
पर मेरे अंदर वो हँसी नहीं थी।
मैं दुकान की तरफ़ चल पड़ा। रास्ते में मैंने अपनी जेब में हाथ डाला और घंटी को छुआ।
“सुन,” मैंने धीरे से कहा। “इस काग़ज़ पर जो लिखा है — रमा का घर एक खबर से नहीं, उसके पति की चुप्पी से टूटा — यह किसने लिखा?”
घंटी एक पल चुप रही।
फिर आवाज़ आई।
“जिसने यह लिखा, वो आज चबूतरी पर नहीं आएगा। पर उसका साया आएगा।”
“कहाँ है वो?”
“जहाँ तेरा घर टूटा है।”
मैं रुक गया।
“मेरा घर कहाँ टूटा है?”
“तेरे सामने। तू रोज़ उससे गुज़रता है। और रोज़ उसे अनदेखा करता है।”
मैंने आँखें बंद कीं। मेरे सामने गली थी — पीपल, चबूतरी, उस्ताद की दुकान, शबनम आपा की गुमटी, और उसके आगे — मेरी दुकान।
और उसके भी आगे — घर।
और घर के अंदर, सबसे पुराना बंद दरवाज़ा।
वो दरवाज़ा जो मैंने आज तक नहीं खोला।
मैंने आँखें खोलीं।
“टिंकू,” मैंने कहा। “आज शाम, चार बजे के बाद, जब सभा खत्म हो जाए, तू मेरे साथ घर चलेगा।”
“क्यों, उस्ताद?”
“क्योंकि,” मैंने कहा, “आज मुझे अपना सबसे पुराना दरवाज़ा खोलना है। और उसे खोलने के लिए मुझे तेरी ज़रूरत पड़ेगी।”
टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा। और उसकी आँखों में डर था — पर उस डर के पीछे कुछ और भी था, जो मैंने पहले कभी नहीं देखा।
भरोसा।
“ठीक है, उस्ताद,” उसने कहा। “मैं चलूँगा। पर पहले आप मुझे बताइए — उस दरवाज़े के पीछे क्या है?”
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
“मुझे खुद नहीं पता, टिंकू,” मैंने सच बोल दिया। “पर घंटी कह रही है कि वहाँ वो आदमी है जिसने पापा को बचाया। और शायद वो आदमी मुझे यह भी बताएगा कि मेरा घर कब टूटा।”
मैंने दुकान की तरफ़ कदम बढ़ाया। पीछे कहीं दूर, स्कूल की छत पर कोई पतंग उड़ रही थी, और उसकी डोर किसी बच्चे के हाथ में थी, जो अभी भी किसी चीज़ से बेखबर था।
और मेरी जेब में घंटी चुप थी — पर उसकी चुप्पी में एक बात थी, जो मैं सुन रहा था।
“आज जो जुड़ेगा, वो कल के लिए ताक़त देगा। पर आज जो टूटेगा, उसका हिसाब भारी होगा।”
मैंने दुकान का शटर उठाया।
और सामने, मेज़ पर, एक पीला लिफ़ाफ़ा रखा था।
बिना नाम। बिना मोहर।
सिर्फ़ ऊपर एक लाइन — “आज चार बजे, अकेले।”
मैंने लिफ़ाफ़े को उलटा किया। पीछे कुछ नहीं।
मैंने उसे खोला।
अंदर — एक फोटो।
फोटो में मेरी दुकान, मेरी गली, और उसके सामने खड़ा एक आदमी, जिसका चेहरा नहीं दिख रहा था, पर उसकी उँगली में काली अंगूठी थी।
और फोटो के नीचे नीली स्याही में लिखा था —
“चार बजे। तेरे पास एक घंटी है। मेरे पास तेरी माँ का इलाज। देखते हैं, तू क्या चुनता है।”
॥
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