The Mysterious Bell – Chapter 253
“प्रिंसिपल साहब! कहाँ हैं? अंदर आ रहा हूँ!”
बबलू पांडे।
वो आँगन में घुसा। इस बार सिर्फ़ दो आदमी साथ थे, पर वो खुद इस क़दर चौड़ा चल रहा था, जैसे उसकी चौड़ाई से गली की रफ़्तार कम हो गई हो। एक हाथ में पीली फ़ाइल, दूसरे में पानदान। पान चबाते हुए उसने चारों तरफ़ देखा।
“अरे वाह,” उसने कहा। “स्कूल में सभा! क्या बात है, प्रिंसिपल जी? मुझे बुलाया नहीं, और इतने लोग इकट्ठे?”
प्रिंसिपल आगे आए। उनके हाथ पीछे बँधे थे, पर आवाज़ साफ़ थी।
“बबलू भाई, यह सभा नहीं है। यह स्कूल है।”
“अभी है।”
बबलू हँसा। उसकी हँसी किसी रिक्शे के पहिये की तरह चरचराती थी।
“प्रिंसिपल जी, छत का काम कल सुबह सात बजे शुरू होगा। मशीन आ रही है। आप बस एक काग़ज़ पर हस्ताक्षर कर दीजिए, बाकी सब मैं देख लूँगा।”
उसने फ़ाइल खोली। उसमें से एक और काग़ज़ निकाला।
“देखिए, यह क्या है।” उसने प्रिंसिपल के सामने काग़ज़ लहराया। “नगर निगम का काग़ज़ है। कहता है — स्कूल की इमारत जर्जर है, छत कमज़ोर है, बच्चों की सुरक्षा खतरे में है। इसलिए — यह ज़मीन भारद्वाज कंस्ट्रक्शन को साफ़ करने के लिए दी जाती है। प्रिंसिपल जी, आप बस इसमें हाँ कह दीजिए।”
प्रिंसिपल ने काग़ज़ पढ़ने की कोशिश की, पर बबलू ने वापस खींच लिया।
“पढ़ने की ज़रूरत नहीं। जो पढ़ते हैं, वो सिर्फ़ शक करते हैं। और शक करने वाले प्रिंसिपल इस शहर में पैंतीस साल नहीं टिकते।”
मैंने एक कदम आगे रखा।
“बबलू भाई।”
“क्या?”
“यह काग़ज़ मुझे एक बार दिखा दीजिए।”
उसने मेरी तरफ़ देखा। उसके होठों पर पान का लाल रंग था, और उसकी आँखों में कुछ ऐसा जो दिन के उजाले में भी रात जैसा लगता है।
“तू कौन है बीच में?”
“मैं दुकान वाला हूँ। साइकिल ठीक करता हूँ। पर इस स्कूल की दीवार मेरी दुकान के सामने है। और जो चीज़ मेरी गली से दिखती है, वो मेरी भी है।”
बबलू ने मुझे घूरा। फिर वो अपने आदमियों की तरफ़ मुड़ा, और जैसे कोई अपनी ही बात का मज़ा ले रहा हो, बोला।
“सुनो इसे। साइकिल वाला। गली वाला। अरे भाई, बड़े साहब ने तुझे पच्चीस हज़ार महीने का दिया, फ्लैट दिया, इलाज दिया — तूने ठुकरा दिया। अब बात यहाँ तक आ गई है कि तू हमारे काग़ज़ों में उँगली डाल रहा है।”
“उँगली काग़ज़ में नहीं, बबलू भाई,” मैंने धीरे से कहा। “मैं खाली जगह देख रहा हूँ। जहाँ अंगूठा लगना है, वहाँ कोई मुहर नहीं। जहाँ गवाह होना चाहिए, वहाँ खाली लाइन। जहाँ तारीख़ होनी चाहिए, वहाँ धुँधला निशान।”
बबलू का चेहरा ज़रा सा बदला।
“तू पढ़ना जानता है?”
“साइकिल ठीक करने के लिए पढ़ना ज़रूरी है। पर लोगों के काग़ज़ पढ़ने के लिए सिर्फ़ आँख नहीं, थोड़ा सब्र चाहिए। और यहाँ — ”
मैंने प्रिंसिपल की तरफ़ देखा।
“सर, यह काग़ज़ आपको दिखाता हूँ?”
प्रिंसिपल ने हाथ आगे बढ़ाया। बबलू ने काग़ज़ खींच लिया।
“नहीं। यह काग़ज़ साहब का है। आपको दिखाने की ज़रूरत नहीं।”
“तो फिर,” मैंने कहा, “इस काग़ज़ पर दस बजे चबूतरी पर बात होगी। जब गली देखेगी। जब मीरा का कैमरा चलेगा। तब जो काग़ज़ आप इतना छिपा रहे हैं, वो अपने आप खुल जाएगा।”
बबलू ने मुझे देखा। बहुत देर तक। फिर उसने पानदान खोला, पान निकाला, मुँह में डाला, चबाया — और मुस्कुराया।
“ठीक है,” उसने कहा। “दस बजे।”
वो घूमा, अपने दोनों आदमियों को इशारा किया, और स्कूल के गेट की तरफ़ चला। जाते-जाते रुका, और बिना मुड़े बोला।
“अंकुश यादव, एक बात याद रखना। साहब तुझसे सिर्फ़ एक चीज़ माँग रहे हैं — घंटी। तू वो दे दे। सब ठीक हो जाएगा। माँ की दवा, अस्पताल, गली, स्कूल, सब।”
“बबलू भाई,” मैंने कहा, “घंटी मेरी नहीं। घंटी गली की है।”
वो हँसा। और चला गया। गेट पर उसके स्कूटर की आवाज़ आई, फिर दूर होती गई।
मैं साँस लेने के लिए रुका। हथेली पर पसीना था।
और तभी मेरी जेब में घंटी बजी।
नहीं, बजी नहीं। गूँजी। जैसे कोई किसी दूर की कमरे में हल्का सा तार छेड़ रहा हो।
“बोल,” मैंने धीरे से कहा।
आवाज़ आई — साफ़, ठंडी, पर इस बार थोड़ी देर टिकी।
“मेज़ के नीचे जो मिला, वो तीन नहीं थे। चार थे।”
मेरा हाथ रुक गया।
“चार?”
“चौथा तेरे पास है। तेरी जेब में। खोल।”
मैंने जेब में हाथ डाला। अभी-अभी जो मैंने लिफ़ाफ़ा रखा था — उसी के साथ, एक और छोटा काग़ज़ था। जो मैंने देखा नहीं था। जो शायद लिफ़ाफ़े के अंदर से ही निकला था, और मैंने उसे पकड़े बिना जेब में डाल दिया।
मैंने उसे निकाला। बहुत छोटा टुकड़ा। पेंसिल से लिखा। दो लाइनें।
ऊपर — “मीरा की खबर के बाद एक टीचर का घर बिखरा।”
नीचे — “चश्मे वाला आदमी ने कहा — नाम बदल दो, वरना अगली खबर तेरे घर की।”
मैंने काग़ज़ को दोनों हाथों से पकड़ा।
यह शालिनी मैडम की लिखाई नहीं थी। यह किसी और की लिखाई थी — खुरदुरी, झुकी हुई, जैसे किसी ने जल्दी में लिखा हो।
मैंने रमा मैडम की तरफ़ देखा। वो अभी भी अपने हाथ में वो फोटो थामे खड़ी थीं।
“मैडम,” मैंने धीरे से कहा, “यह काग़ज़ मैंने अभी देखा। यह आपके बारे में है।”
रमा मैडम ने पढ़ा। पढ़ते हुए उनका चेहरा कोई भी भाव नहीं बदला। जैसे वो पहले से जानती हों।
“यह मेरे पति की लिखाई है,” उन्होंने कहा।
मैं चुप हो गया।
“मेरे पति ने यह लिखा था। शायद उसी रात, जब वो घर से निकले थे।” रमा मैडम ने काग़ज़ पलटा। “वो मुझे कभी नहीं बताया। पर — यह मेरी नहीं, उनकी लिखाई है। जब वो तनाव में होते थे, तो उनकी लिखाई ऐसी ही हो जाती थी।”
“मैडम, इसका मतलब — आपके पति को किसी ने खबर छपने से पहले ही धमकाया था।”
रमा मैडम ने काग़ज़ मोड़ा। बहुत सावधानी से।
“अब सब जुड़ रहा है,” उन्होंने कहा। “मेरे पति उस दिन घर लौटकर बहुत चुप थे। मैंने पूछा तो बोले — कुछ नहीं, बस स्कूल का काम है। अगले दिन अख़बार आया, और फिर वो चले गए। मैंने हमेशा खुद को क़सूरवार माना — पाँच साल। पर आज पहली बार लग रहा है कि मुझे किसी और से भी पूछना चाहिए था।”
“किससे?”
“उस आदमी से, जिसके हाथ में पाँच साल पहले यह स्कूल था।”
रमा मैडम ने प्रिंसिपल की तरफ़ देखा।
प्रिंसिपल ने अपनी चश्मा उँगली से ऊपर किया। उनके चेहरे पर पसीना था।
“रमा जी,” उन्होंने धीरे से कहा, “मैं उस वक़्त बोर्ड का चेयरमैन था। पर मुझे यह नहीं पता था कि काग़ज़ कैसे बने। मैंने सिर्फ़ हाँ कह दी थी, क्योंकि — क्योंकि मुझे डर था कि स्कूल का नाम अख़बार में आएगा।”
“सर,” रमा मैडम ने कहा, “आपने हाँ कह दी। बिना पूछे। यह भी एक तरह का अंगूठा था।”
प्रिंसिपल ने कुछ नहीं कहा। फिर उन्होंने अपनी धोती की गाँठ खोली, दराज़ की चाबी निकाली, और वो पीला काग़ज़ बाहर लाए।
“यह नोटिस मैंने कल तक अपने पास रखा था,” उन्होंने कहा। “क्योंकि मैं डरता था। अब नहीं।”
“दस बजे, चबूतरी पर,” मैंने कहा। “आप दोनों वहाँ साथ बैठिए। और जो पाँच साल से अंदर दबा हुआ है, वो गली के सामने खोलिए।”
रमा मैडम ने सिर हिलाया। प्रिंसिपल ने भी।
मैं आँगन से बाहर निकला, टिंकू और चारों बच्चे मेरे पीछे। शालिनी मैडम और वेद सर भी सीढ़ी से उठकर आए।
“अंकुश,” वेद सर ने कहा, “मैंने भी आज चबूतरी पर सच बोलने का वादा किया है। पर — मैं डर रहा हूँ। मेरी नौकरी जाएगी।”
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